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‘ना कानून बना है, ना कभी बनेगा’, संघ प्रमुख की UGC रेगुलेशन पर दो टूक, जैन मुनि से मुलाकात में बोले- समाज को तोड़ने नहीं देंगे

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने UGC के विवादास्पद रेगुलेशन पर स्टैंड क्लियर कर दिया है. उन्होंने दो टूक कह दिया है कि ये कानून ना बना है और ना ही बनेगा. उन्होंने आगे कहा कि समाज में इनसानों को इनसानों से टूटने नहीं देंगे.

Mohan Bhagwat meeting Jain Muni Pulak Sagar/ VIDEOGRAB: IANS
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यूजीसी के विवादास्पद प्रस्तावित नियमों को लेकर देशभर में मचे बवाल के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत का सख्त रुख सामने आया है. उन्होंने इस संबंध में दो टूक कह दिया है कि 'ये प्रस्ताव है, कानून नहीं बना है और ना ही कभी बनेगा.' 

UGC के प्रस्तावित नियम पर संघ प्रमुख की दो टूक

जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज ने ये जानकारी संघ प्रमुख के साथ करीब 40 मिनट हुई चर्चा के बाद दी है. उन्होंने कहा कि उनकी संघ के सरसंघचालक के साथ UGC ड्राफ्ट सहित देश और समाज के विभिन्न मुद्दों पर बात हुई, जहां उन्होंने ये आश्वासन दिया.

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आपको बता दें कि बीते दिनों राजस्थान के भीलवाड़ा में संघ प्रमुख मोहन भागवत और जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज के बीच मुलाकात हुई, जिसका वीडियो भी सामने आया है. संघ प्रमुख और जैन मुनि के बीच यूजीसी के प्रस्तावित नियमों के साथ-साथ सामाजिक समरसता और जातिवाद जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई. मालूम हो कि यूजीसी ड्राफ्ट को लेकर राजस्थान समेत पूरे देश में बवाल मचा हुआ है और सवर्ण समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है. इसको लेकर बिहार, राजस्थान सहित पूरे देश में बीते दिनों प्रदर्शन भी हुए थे.

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‘न कानून बना है, न ही बनेगा’

जानकारी के मुताबिक संघ प्रमुख के साथ मुलाकात के दौरान आचार्य पुलकसागर महाराज ने हिंदू समाज में पैदा किए जा रहे विभेद, आपसी लड़ाई, जातिगत तनाव की कथित साज़िशों सहित यूजीसी के प्रस्तावित नियमों का भी मुद्दा उठाया. इस पर मोहन भागवत ने कहा कि अभी केवल प्रस्ताव आया है, पास नहीं हुआ. ना यह कानून बना है और ना बनेगा. जैन मुनि ने मीडिया से बात करते हुए ये दावा किया है. आचार्य का वीडियो बयान भी सामने आया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने UGC के इक्विटी रेगुलेशन पर लगा रखी है रोक

इस प्रस्तावित रेगुलेशन को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई. कोर्ट ने नियमों के कुछ हिस्सों को पहली नजर में अस्पष्ट माना और फिलहाल इनके लागू होने पर रोक लगा दी. हालांकि इसके बाद केंद्र सरकार ने भी इन नियमों पर दोबारा विचार करने की बात कही थी, लेकिन कुछ दिन पहले ऐसा दावा किया गया कि मोदी सरकार कोर्ट के फैसले के खिलाफ फिर से पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकती है. SC में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायतों की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे. 

UGC के सेक्रेटर पर इसी नियम के बाद हुआ था एक्शन!

इससे पहले अप्रैल में इसी यूजीसी रेगुलेशन विवाद के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सचिव प्रो. मनीष आर. जोशी को कार्यमुक्त कर दिया गया था. उनके स्थान पर अब अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) की सदस्य सचिव प्रो. श्यामा रथ को यह अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था.  

मनीष जोशी की विदाई ऐसे समय में हुई है जब देश में उच्च शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर यूजीसी की नीतियों और नियमों को लेकर व्यापक बहस हुई. प्रो. मनीष जोशी के कार्यकाल के दौरान यूजीसी की कथित विश्वविद्यालयों में समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रयास को लेकर जारी यूजीसी के नए नियमों ने देशभर में विवाद खड़ा कर दिया

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क्या है UGC का विवादित रेगुलेशन?

जनवरी 2026 में यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा के नाम पर नए नियम लागू किए थे. इन नियमों के तहत सभी संस्थानों में 'इक्विटी कमेटी' बनाने और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने का प्रावधान किया गया. लेकिन इन नियमों को लेकर कई पक्षों ने आपत्ति जताई. कुछ याचिकाओं में कहा गया कि नियमों की परिभाषाएं अस्पष्ट हैं और ये सभी वर्गों के लिए समान रूप से लागू नहीं होते. यही नहीं छात्रों समेत समाज के कई वर्गों का मानना था कि इन नियमों से उल्टा भेदभाव की स्थिति पैदा हो सकती है.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या बोलकर इस प्रस्ताव पर लगाई थी रोक?

इस विवाद ने कानूनी रूप ले लिया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी. कोर्ट में प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा गया कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसके बाद फिलहाल पुराने 2012 के नियमों को फिलहाल लागू रखने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा गया कि ऐसे नियम समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं और इनके संवैधानिक पहलुओं की गहराई से जांच आवश्यक है.

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इसके अलावा, यह मामला 2019 से जुड़ी याचिकाओं से उत्पन्न हुआ था, जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों में कथित भेदभाव के मामलों को लेकर सख्त नियमों की मांग की गई थी. वर्तमान में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और इसकी अगली सुनवाई के आधार पर इन नियमों का भविष्य तय होगा. इस बीच, देशभर में छात्र संगठनों, शिक्षकों और सामाजिक समूहों के बीच इस मुद्दे पर लगातार बहस जारी है.

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