अब ट्रंप को लगेगा तगड़ा झटका, भारत सरकार का बड़ा संकेत, सरकारी प्रोजेक्ट्स में चीनी कंपनियों पर ढील देने की तैयारी
भारत-चीन संबंधों में नरमी के बीच भारत सरकार सरकारी ठेकों में शामिल चीनी कंपनियों पर लगी पाबंदियों को हटाने पर विचार कर रही है. सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय उस सुरक्षा जांच और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को खत्म करने की तैयारी में है, जिसका अंतिम फैसला पीएमओ करेगा.
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भारत और चीन के रिश्तों में दूरियां लगातार कम हो जा रही हैं. इसी का नतीजा है कि भारत सरकार उन चीनी कंपनियों पर लगी पाबंदियों को हटाने की दिशा में गंभीरता से विचार कर रही है, जो सरकारी ठेकों के लिए बोली लगाती हैं. सूत्रों के मुताबिक, वित्त मंत्रालय उन नियमों को खत्म करने की तैयारी में है, जिनके तहत चीनी कंपनियों को भारत में किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में हिस्सा लेने से पहले कड़ी सुरक्षा जांच और विशेष रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था. माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ स्तर पर लिया जाएगा.
दरअसल, भारत सरकार द्वारा अब तक लगाई गई पाबंदियों का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई बड़े सरकारी प्रोजेक्ट भी प्रभावित हुए. रिपोर्ट के अनुसार, पाबंदियां लगने के बाद चीन की कंपनी सीआरआरसी (CRRC) को लगभग 1800 करोड़ रुपये के एक बड़े ठेके से बाहर कर दिया गया था. इसके अलावा कई सरकारी विभागों ने यह शिकायत की कि चीन से जरूरी मशीनरी और तकनीकी सामान न आने के कारण उनके प्रोजेक्ट्स अटक गए हैं. खासतौर पर बिजली क्षेत्र में इसका गहरा असर देखने को मिला है. भारत अगले 10 वर्षों में अपनी बिजली उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाना चाहता है, लेकिन इसके लिए जिन उपकरणों की जरूरत है, उनका बड़ा हिस्सा अभी भी चीन से आता है.
किसने की पाबंदियों में देने की सिफारिश?
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने भी पाबंदियों में कुछ हद तक ढील देने की सिफारिश की है. समिति का मानना है कि पूरी तरह प्रतिबंध के बजाय कड़े नियमों के साथ सीमित अनुमति दी जा सकती है, ताकि विकास परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकें.
ट्रंप को मिलेगा सबक
जानकारी देते चलें कि पिछले वर्ष से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर लगातार रूस से तेल न खरीदने का दबाव बना रहे हैं. इसी क्रम में अमेरिका ने भारत पर टैरिफ भी लगाया. इसके बावजूद भारत न तो अमेरिकी दबाव के आगे झुका और न ही रूस के साथ अपनी रणनीतिक दोस्ती में कोई कमी की. इसी बीच चीन में हुई एससीओ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सीधी बातचीत हुई. इसके बाद भारत और चीन के रिश्तों में आई नरमी के संकेत मिले हैं. माना जा रहा है कि इसी का असर है कि केंद्र सरकार अब चीनी कंपनियों पर लगी पाबंदियों में ढील देने की तैयारी कर रही है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.
PM मोदी के चीन दौरे के बाद बदले हालात
इस बीच भारत और चीन के संबंधों में भी धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिल रहे हैं. अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने और पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती नजदीकियों के बीच भारत अपनी कूटनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार कर रहा है. पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात साल बाद चीन का दौरा किया था. इस दौरे के बाद दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से शुरू हुईं और भारत ने चीनी प्रोफेशनल्स के लिए बिजनेस वीजा प्रक्रिया को भी आसान बनाया. हालांकि सरकार अब भी सतर्क रुख अपनाए हुए है. चीनी कंपनियों से जुड़े विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर प्रतिबंध अभी भी लागू हैं. साफ है कि सरकार आर्थिक जरूरतों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. आने वाले दिनों में पीएमओ का फैसला यह तय करेगा कि सरकारी ठेकों के क्षेत्र में चीन की वापसी किस हद तक और किन शर्तों पर होगी.
गौरतलब है कि साल 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद केंद्र सरकार ने यह सख्त पाबंदियां लगाई थीं. उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों से लगभग पूरी तरह बाहर कर दिया गया था. इन पाबंदियों के कारण चीनी कंपनियां करीब 700 से 750 अरब डॉलर के भारतीय सरकारी ठेकों की दौड़ से बाहर हो गई थीं. नियमों के तहत उन्हें भारतीय सरकारी समिति के साथ रजिस्ट्रेशन कराने के साथ राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य था.
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