क्या है Zomato फाउंडर की कनपटी पर लगी ये 'डिवाइस', क्यों कहा जा रहा इसे अमीरों का महंगा खिलौना, जानें
जोमाटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल की कनपटी पर लगी एक डिवाइस ने लोगों में उत्सुकता पैदा कर दी है. कोई इसे छोटा कंप्यूटर कह रहा है तो कई अमीरों का महंगा खिलौना. तो सवाल ये उठता है कि आखिर ये है क्या?
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जोमाटो (Zomato) के फाउंडर दीपिंदर गोयल हाल ही में एक मशहूर पॉडकास्ट में नजर आए. इस दौरान जोमाटो, 10 मिनट फूड डिलीवरी कॉन्सेप्ट और गिग वर्कर्स यूनियन की मांगों व आरोपों को लेकर चर्चा हुई. हालांकि उनके वर्क-रिलेटेड मुद्दों से ज्यादा चर्चा जिस बात की हुई, वह थी उनकी कनपटी पर लगी एक छोटी-सी मैटेलिक डिवाइस. सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे.
दीपिंदर गोयल की कनपटी पर लगी कौन सी डिवाइस?
दीपिंदर गोयल को जानने-देखने वालों की उत्सुकता बढ़ गई कि आखिर यह डिवाइस है क्या. कुछ लोग तो इस बात को लेकर चिंतित भी नजर आए कि कहीं जोमाटो के संस्थापक की सेहत तो खराब नहीं हो गई. हालांकि ऐसा कुछ नहीं है.
अब सवाल उठता है कि यह छोटी-सी डिवाइस आखिर है क्या? जहां कुछ लोग इसे ‘च्युइंग गम’ बता रहे हैं, तो कुछ इसे ‘छोटा कंप्यूटर’ कह रहे हैं. लेकिन हकीकत में यह दोनों में से कुछ भी नहीं है. दरअसल यह एक हेल्थ-टेक वियरेबल डिवाइस है, जिसे ‘टेंपल’ (Temple) नाम दिया गया है. इस डिवाइस को लेकर इंटरनेट पर छिड़ी बहस अब एक बड़े विवाद का रूप ले चुकी है. असल में यह ‘टेंपल’ वियरेबल डिवाइस दीपिंदर गोयल की निजी रिसर्च कंपनी ‘कंटिन्यू’ (Continue) द्वारा विकसित की जा रही है.
दीपिंदर गोयल और उनकी टीम का दावा है कि यह डिवाइस दिमाग में होने वाले रक्त प्रवाह (Cerebral Blood Flow) को रियल-टाइम में ट्रैक करती है. इसके पीछे उनकी एक अनोखी थ्योरी है, जिसे वे ‘ग्रेविटी एजिंग’ कहते हैं. उनका मानना है कि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण हमारे शरीर, खासकर दिमाग तक रक्त पहुंचाने की क्षमता को प्रभावित करता है.
अगर लंबे समय तक यह डेटा इकट्ठा किया जाए कि अलग-अलग अवस्था और पोस्चर में दिमाग को कितना खून मिल रहा है, तो भविष्य में अल्जाइमर, डिमेंशिया और मानसिक एकाग्रता में कमी जैसी समस्याओं की समय रहते पहचान की जा सकती है. इतना ही नहीं, इन समस्याओं की रफ्तार को धीमा करने में भी मदद मिल सकती है.
क्या है ‘टेंपल’ डिवाइस?
दीपिंदर गोयल की कनपटी पर लगा ‘टेंपल’ एक एक्सपेरिमेंटल डिवाइस है, जो रियल-टाइम में मस्तिष्क के रक्त प्रवाह (Cerebral Blood Flow) को ट्रैक करती है. इसे सिर की कनपटी, जिसे अंग्रेजी में Temple कहा जाता है, वहां पहना जाता है, इसी वजह से इसका नाम ‘टेंपल’ रखा गया है. यह डिवाइस यह समझने की कोशिश करती है कि हमारे शरीर की मुद्रा (Posture) और गुरुत्वाकर्षण (Gravity) दिमाग की सेहत को किस तरह प्रभावित करते हैं.
कौन कर रहा है टेंपल डिवाइस को डेवलप?
जानकारी के मुताबिक यह जोमाटो का आधिकारिक प्रोडक्ट नहीं है. इसे दीपिंदर गोयल की व्यक्तिगत रिसर्च पहल ‘कंटिन्यू रिसर्च’ (Continue Research) के तहत विकसित किया जा रहा है. कहा जा रहा है कि इसमें व्यक्तिगत रूप से दीपिंदर गोयल का करीब 225 करोड़ रुपये का निवेश शामिल है.
क्या है ग्रेविटी एजिंग?
दीपिंदर गोयल के अनुसार, इंसान ज्यादातर समय खड़े या बैठे रहने की स्थिति में रहता है. ऐसे में गुरुत्वाकर्षण के कारण दिमाग तक पर्याप्त मात्रा में खून पहुंचना मुश्किल हो जाता है. उनका दावा है कि यही कमी उम्र बढ़ने यानी एजिंग का एक बड़ा कारण हो सकती है.
क्यों मचा है बवाल?
जैसे ही यह डिवाइस चर्चा में आई, मेडिकल और फार्मा सेक्टर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों का कहना है कि इस डिवाइस के दावों के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार की कमी है. AIIMS के पूर्व डॉक्टरों और कई न्यूरोलॉजिस्ट्स ने इस पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि केवल कनपटी पर एक छोटा-सा सेंसर लगाकर दिमाग के गहरे हिस्सों के रक्त प्रवाह का सटीक डेटा मिलना संभव नहीं है.
इतना ही नहीं, एक प्रसिद्ध डॉक्टर ने तो इसे ‘अमीरों का महंगा खिलौना’ तक करार दे दिया. उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वे ऐसी अनटेस्टेड तकनीकों पर अपना पैसा बर्बाद न करें. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि किसी भी मेडिकल दावे के लिए कड़े क्लिनिकल ट्रायल और वैज्ञानिक रिसर्च पेपर्स जरूरी होते हैं, जो इस डिवाइस के मामले में अभी उपलब्ध नहीं हैं.
यह डिवाइस कैसे काम करती है?
सेंसर और लाइट:
यह डिवाइस लाइट-बेस्ड सेंसर का इस्तेमाल करती है, जो त्वचा के नीचे मौजूद आर्टरीज से सिग्नल पकड़ते हैं.
डेटा कलेक्शन:
पारंपरिक मशीनों के विपरीत, इसे घंटों या दिनों तक पहना जा सकता है, जिससे यह समझा जा सकता है कि काम करते समय, तनाव की स्थिति में या नींद के दौरान दिमाग के ब्लड सर्कुलेशन में कैसे बदलाव आते हैं.
एल्गोरिदम का विश्लेषण:
डिवाइस से मिलने वाला रॉ डेटा क्लाउड पर भेजा जाता है, जहां एल्गोरिदम यह विश्लेषण करते हैं कि फोकस, याददाश्त और मानसिक थकान का ब्लड फ्लो से क्या संबंध है.
एंग्जायटी का खतरा
डॉक्टरों का मानना है कि ऐसी डिवाइस, जो लगातार हेल्थ डेटा दिखाती रहती हैं, स्वस्थ लोगों में भी बिना वजह चिंता और एंग्जायटी पैदा कर सकती हैं.
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वहीं दीपिंदर गोयल ने साफ किया है कि यह डिवाइस अभी एक्सपेरिमेंटल स्टेज में है. वे खुद इसे पिछले एक साल से पहन रहे हैं और लगातार डेटा इकट्ठा कर रहे हैं. उनका कहना है कि भले ही उनकी ‘ग्रेविटी थ्योरी’ गलत साबित हो जाए, लेकिन ब्रेन-ब्लड फ्लो को ट्रैक करना भविष्य की सेहत के लिहाज से एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है.
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