संघ की नाराजगी, संगठन में बेचैनी...मोहन भागवत का एक इशारा और चंद घंटे के अंदर हो गया धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, INSIDE STORY
धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा हो गया है. कहा जा रहा है कि संघ की ओर से सरकार को इशारा दे दिया गया था. इसी बीच RSS प्रमुख का बयान आया और प्रधान की छुट्टी हो गई. आखिर संघ की नाराजगी की क्या वजह रही, जानें डिटेल.
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जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया। इस घटना के बाद सीजेपी सहित पूरे विपक्ष की प्रतिक्रिया सामने आ रही है. कांग्रेस-AAP सहित अन्य दलों ने इसे करोड़ों युवाओं की जीत करार दिया है। इसी बीच प्रधान के इस्तीफो लेकर सूत्रों के हवाले से ख़बर सामने आ रही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो सरकार संसद मार्च से नहीं झुकी, सीजेपी को एक महीने तक प्रदर्शन करने दिया, उसने क्यों अपने ही मंत्री को गद्दी छोड़ने को कह दिया.
संघ प्रमुख के बयान के बाद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा!
सूत्रों की मानें तो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे सरकार के अंदर कई दिनों से चर्चा चल रही थी. सरकार तैयार थी कि लॉन्ग रन और संसद के सत्र को ध्यान में रखते हुए मंत्री का इस्तीफा लेने में कोई दिक्कत नहीं है, हां टाइमिंग का इंतजार किया जा रहा था. ऐसे में सरकार को एक संदेश मिलता है जिसके बाद ये कंफर्म हो गया था कि अब सरकार को शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेना ही होगा.
संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के अंदर हो गई प्रधान की छुट्टी!
ये संदेश किसी और ने नहीं बल्कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से इशारों ही इशारों मे दिया गया था वो भी दिल्ली में से ही एक कार्यक्रम के माध्यम से. आपको बताएं कि संघ प्रमुख ने एक कार्यक्रम में बात करते हुए सलाह दी थी कि जमाना बदल गया है, अब वो दौर चला गया है जब बच्चे ऑर्डर मान लेते हैं. अब बच्चे सवाल करते हैं तो उनसे उसी अंदाज में बात करने की जरूरत है.
संघ प्रमुख ने मातृत्व, भारतीय संस्कृति और समाज में बदलते मूल्यों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एक कार्यक्रम में कहा कि अब बच्चों के साथ बात करने और उन्हें अपनी बात मनवाने के लिए डिक्टेशन की नहीं डिस्कशन की ज़रूरत है. इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि बच्चों पर ऑर्डर झाड़ने की ज़रूरत नहीं है, कंसेंसस बिल्ट करना जरूरी है.
'बच्चों को तर्क से समझाना जरूरी है'
संघ प्रमुख ने इसके पीछे कि वजह समझाते हुए कहा कि मौजूदा पीढ़ी अधिक जिज्ञासु है. वो हर चीज के पीछे का तर्क समझना चाहती है, सवाल करती है. उन्होंने आजकल परिवारों के भीतर बातचीत बंद हो हो जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि फिर से संवाद शुरू करना जरूरी है.
इसके अलावा उन्होंने अपने जमाने को याद किया और कहा कि जब वे युवा थे, तब आज्ञा मानने का दौर था, लेकिन आज के दौर में ऐसा नहीं रह गया है. अब नई पीढ़ी सवाल पूछती है और उन्हें तर्क समझाना पड़ता है.
मुरली मनोहर जोशी ने भी छात्रों को किया था सपोर्ट
दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने प्रदर्शनकारियों की मांगों को उचित बताया था और सरकार से उनके खिलाफ कार्रवाई न करने की अपील की थी। जोशी संघ के बेहद करीबी नेता रहे हैं और जनसंघ से होते हुए बीजेपी के फाउंडिग लीडर्स में से एक रहे हैं. वो वाराणसी से भी सांसद रहे हैं. पीएम मोदी के लोकसभा चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद उन्हें अपनी सीट छोड़नी पड़ी थी और मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया था.
भाजपा नेता ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर एक पोस्ट भी शेयर किया था। जोशी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि यह देखना अत्यन्त पीड़ादायक है कि देश के विभिन्न भागों से आए युवा छात्र कई दिनों से नई दिल्ली की सड़कों पर एकत्रित हैं। उनकी चिंताएं और सरोकार वास्तविक हैं। इन्हें सहानुभूति तथा दूरगामी समाधान की दृष्टि से हल किया जाना चाहिए। मुझे पूरी आशा है कि इसे केवल कानूनी और व्यवस्था की समस्या के रूप में नहीं देखा जाएगा, जिससे बलपूर्वक निपटा जाए।
उन्होंने कहा कि मुझे यह देखकर अत्यन्त पीड़ा हुई है कि महिलाओं और युवतियों पर निर्मम बल प्रयोग किया गया। ऐसे बल के उपयोग से भारतीय समाज का बड़ा हिस्सा विकसित भारत के लक्ष्य से बहुत दूर चला जाएगा।
जोशी का बयान संगठन की नाराजगी का संकेत!
जोशी के बाद संघ प्रमुख का बयान अपने आप में स्पष्ट था कि अब मोदी सरकार को एक्शन लेना ही होगा. इससे पहले भी यूजीसी के नोटिफिकेशन को लेकर देशभर में हुए बवाल से बीजेपी की काफी किरकिरी हुई थी. बीजेपी के अपने ही सवर्ण समर्थ, कैडर सड़कों पर उतरे थे और उन्हें सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना पड़ा था. यूजीसी विवाद पर संघ की भी नाराजगी सामने आई थी.
शिक्षा मंत्रालय में संघ का अमल दखल!
संघ का संस्कृति और शिक्षा जैसे विषयों पर सरकार के फैसलों और नीतियों में काफी अमल-दखल सलाह की हद तक रहता है. ऐसे में संघ के समर्थकों की भी नाराजगी सरकार तक पहुंची थी कि आखिर सरकार चाहती क्या है जो अपने ही लोगों-वैचारिक कैडर को नाराज कर रही है. संघ की ओर से सरकार को दो टूक संदेश तब भी दिया गया था. उसके बाद कोर्ट से आए फैसले के बाद किसी तरह सरकार की जान बची.
UGC के वक्त भी संघ की नाराजगी सामने आई थी!
हालांकि अब जब देशभर में सरकार विरोधी प्रदर्शन होने लगे तो संघ को आंतरिक तौर पर दखल देना पड़ा. सूत्रों के मुताबिक सरकार को संदेश दिया गया कि सरकार के समक्ष धर्मेंद्र प्रधान से भी बड़े मुद्दे हैं. महिला और युवा मोदी सरकार के दो मेन पिलर रहे हैं. इस लिहाज से उनका ही सड़क पर होने और खिलाफ हो जाना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं. जो विपक्ष मुद्दा विहीन रहा है, उसे बेवजह एक शिक्षा मंत्री के कारण बेवजह संजीवनी ना दी जाए.
सरकार के समक्ष बड़े बिलों को पास कराने की बड़ी चुनौती!
दूसरी तरफ संसद के मॉनसून सत्र में भी गतिरोध बरकरार है. दूसरा हफ्ता सोमवार से शुरू होगा. जहां सरकार को FCRA, परिसिमन बिल, महिला आरक्षण सहित कई बड़े बिल पड़े हैं, जिन्हें सरकार पास कराना चाह रही है. ऐसे में एक शिक्षा मंत्री के कारण ये सारे बिल गतिरोध की भेंट चढ़ जाती हैं तो किसी भी एंगल से बुद्धिमानी नहीं है.
इससे पहले विपक्ष की ओर से भी सीजेपी को समर्थन दिया गया. इतना ही नहीं ऐसा पहली बार हुआ कि राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष का प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना-प्रदर्शन हुआ, जहां से सभी को पुलिस ने बलपूर्वक उठाया और इलाका खाली किया.
नैरेटिव बिल्ट करने में फेल रही सरकार!
इसके अलावा सरकार के खिलाफ नाराजगी और नैरेटिव बिल्ट करने में संगठन और सरकार के फेल रहने के बाद खुद प्रधानमंत्री को मोर्चा संभालना पड़ा. सबसे पहले तो उन्होंने पेपर लीक मामलों की जांच के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का ऐलान किया और कैबिनेट से इसे हरी झंडी भी दिलाई गई। इसके बाद प्रधानमंत्री को युवाओं द्वारा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर दो बार आकर सीधे युवाओं से संवाद स्थापित करना पड़ा, जिस पर रिकॉर्ड व्यूज तो आए ही, बल्कि सजेशन भी खूब आए, जिसके बारे में प्रधानमंत्री को ब्रीफ भी किया गया.
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संगठन और अपने ही कैडर की बेचैनी से झुकी सरकार!
ऐसे में संसद से सड़क तक दबाव, संगठन में बेचैनी और संघ प्रमुख के दो टूक संदेश ने तय कर दिया कि धर्मेंद्र प्रधान का पद पर इस बार बने रहना मुश्किल होगा. इस लिहाज से संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान ने प्रधान की छुट्टी कर दी.
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मालूम हो कि सरकार की महत्वाकांक्षी न्यू एजुकेशन पॉलिसी को संघ के ही अनुषांगी संगठनों के विचार और मार्गदर्शन में तैयार किया गया जिसमें इतिहास से लेकर अन्य विषयों पर संघ के विचार को प्राथमिकता दी गई और एजेंडों को प्रॉयोरिटी पर रखा गया. इससे समझा जा सकता है कि शिक्षा मंत्रालय संघ की दृष्टि से कितना अहम है.