मिडिल ईस्ट जंग में ट्रंप घिरे...ईरान के बाद अब इजरायल ने भी दिखाया आईना, जानें पूरी अपडेट
मिडिल ईस्ट में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं.ईरान और इजरायलके बीच लगातार हमले जारी हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप के बदले हुए बयान हैरान कर रहे हैं. पहले कड़ा अल्टीमेटम देने वाले ट्रंप अब शांति की बात कर रहे हैं और पांच दिन तक हमला न करने की घोषणा कर चुके हैं. वहीं नेतन्याहूने साफ कहा है कि युद्ध खत्म करने का फैसला अमेरिका नहीं बल्कि इजरायल करेगा.
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मिडिल ईस्ट इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है. एक तरफ ईरान और इजरायल के बीच लगातार हमले हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बदलते बयान पूरी दुनिया को हैरान कर रहे हैं. जो ट्रंप कुछ दिन पहले तक ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे रहे थे और उसे पूरी तरह तबाह करने की बात कर रहे थे, वही अब कह रहे हैं कि ईरान शांति चाहता है. यह बदलाव सिर्फ एक बयान नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपी रणनीति और दबाव की कहानी भी उतनी ही बड़ी है. वैश्विक मीडिया और विशेषज्ञ इसे ट्रंप की मजबूरी और डर के रूप में देख रहे हैं. इसके अलावा ट्रंप को दूसरी चोट देते हुए इजरायल के राष्ट्रपति नेतन्याहू ने कहा कि इस युद्ध की समाप्ति का निर्णय अमेरिका नहीं लेगा.
आधे युद्धविराम की घोषणा
23 मार्च को ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अगले पांच दिनों तक ईरान के पावर प्लांट या एनर्जी फैसिलिटी पर हमला नहीं करेगा. यह बयान किसी औपचारिक युद्धविराम से कम नहीं माना जा रहा. लेकिन असलियत यह है कि जमीन पर हालात बिल्कुल अलग हैं. ईरान और इजरायल के बीच हमले लगातार जारी हैं. बेंजामिन नेतन्याहू पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे, वहीं ईरान भी पूरी ताकत के साथ जवाब दे रहा है. यानी एक तरफ अमेरिका बातचीत की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ उसके सहयोगी देश जंग को और तेज कर रहे हैं. इसके साथ ही बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि इस युद्ध की समाप्ति का निर्णय अमेरिका नहीं लेगा. यह युद्ध तब समाप्त होगा जब हम इसकी समाप्ति की घोषणा करेगा. बेंजामिन नेतन्याहू ने यह बयान देकर विश्व मंच पर ट्रंप को छोटा और शक्तिहीन साबित कर दिया.
तेल अवीव पर ईरान का भीषण हमला
24 मार्च को हालात और बिगड़ गए जब ईरान ने इजरायल की राजधानी Tel Aviv पर बड़ा हमला किया. क्लस्टर बमों के जरिए किए गए इस हमले ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया. करीब 100-100 किलो वजन वाले कई बम गिराए गए, जिसके बाद हर तरफ धुआं, आग और मलबा दिखाई देने लगा. रिहायशी इलाकों तक में धमाकों की गूंज सुनाई दी. सायरन बजते रहे और लोग दहशत में घरों में छिपे रहे. यह हमला साफ संकेत देता है कि ईरान अब पीछे हटने वाला नहीं है.
ट्रंप क्यों फंस गए हैं चार रास्तों के बीच?
ट्रंप इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां हर रास्ता मुश्किल नजर आता है. पहला रास्ता है युद्धविराम का, जिसकी बात सिर्फ ट्रंप कर रहे हैं. वहीं, दूसरा रास्ता है ईरान से सीधे टकराव का, जो अब उनके लिए आसान नहीं रह गया. तीसरा रास्ता सहयोगियों का है, जहां नाटो से लेकर इजरायल तक उनकी बात पूरी तरह नहीं मानी जा रही. इसके साथ ही चौथा और सबसे कठिन रास्ता है अपने देश के भीतर बढ़ते विरोध का सामना करना. यानी ट्रंप के लिए यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती भी बन चुका है.
खाड़ी देशों की चेतावनी ने बदला गेम
ट्रंप के रुख में अचानक आए बदलाव के पीछे खाड़ी देशों की बड़ी भूमिका मानी जा रही है. कतर, बहरीन, दुबई और अबू धाबी जैसे देशों ने अमेरिका को साफ चेतावनी दी थी कि अगर सिविलियन पावर प्लांट्स पर हमला हुआ तो हालात बेकाबू हो जाएंगे. इन देशों की चिंता साफ है. अगर जंग बढ़ती है, तो उसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल सकती है.
तेल की कीमतों ने बढ़ाया दबाव
इस जंग का सबसे बड़ा असर तेल बाजार पर पड़ा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों को चिंता में डाल दिया है. जैसे ही ट्रंप ने पांच दिन तक हमला नहीं करने की बात कही, बाजार में राहत दिखी और तेल की कीमतों में गिरावट आई. इससे साफ है कि युद्ध का असर सीधे आम आदमी की जेब तक पहुंच रहा है. ट्रंप पर दबाव सिर्फ विदेशों से नहीं, बल्कि अपने देश के भीतर से भी बढ़ रहा है. अमेरिका में युद्ध के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और उनकी छवि एक 'डीलमेकर' से बदलकर 'युद्ध कराने वाले नेता' की बनती जा रही है.
क्या बातचीत का रास्ता खुल रहा है?
सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और ओमान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहे हैं. अमेरिका की ओर से 15 प्वाइंट का प्रस्ताव भी भेजा गया है. लेकिन ईरान ने सार्वजनिक रूप से किसी भी बातचीत से इनकार किया है. ईरान का साफ कहना है कि जंग खत्म होगी तो उसकी शर्तों पर ही होगी.
क्या अमेरिका की सैन्य ताकत पर असर पड़ेगा?
इस युद्ध ने अमेरिका की सैन्य स्थिति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी नौसेना थक चुकी है और हथियारों का भंडार भी दबाव में है. ईरान भले ही आर्थिक रूप से कमजोर हुआ हो, लेकिन उसकी आक्रामकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है. यही वजह है कि यह जंग अमेरिका के लिए लंबी और महंगी साबित हो सकती है.
नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल
बेंजामिन नेतन्याहू और ट्रंप की जोड़ी ने सोचा था कि ईरान के खिलाफ जंग शुरू होते ही वहां की जनता विद्रोह कर देगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके उलट ईरान की जनता अपनी सरकार और सेना के साथ खड़ी नजर आई. इससे दोनों नेताओं की रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं. अब हालात ऐसे हैं कि दोनों ही नेता बातचीत की तरफ झुकते दिखाई दे रहे हैं.
क्या अमेरिका जमीन पर उतारेगा सेना?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका ईरान की जमीन पर अपने सैनिक उतारेगा. जानकारों की माने तो यह कदम बेहद जोखिम भरा होगा. ईरान का भूगोल कठिन है और वहां जमीनी युद्ध में जीत हासिल करना आसान नहीं होगा. अगर अमेरिकी सैनिकों को नुकसान हुआ, तो ट्रंप को अपने देश में भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है. बता दें कि इस जंग ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पर खतरा मंडरा रहा है. यूरोप, एशिया और खाड़ी देशों ने लगातार अपील की है कि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालें. क्योंकि अगर यह जंग और बढ़ती है, तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया आर्थिक और राजनीतिक संकट में फंस सकती है.
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बताते चलें कि मौजूदा हालात यह दिखा रहे हैं कि जंग का रास्ता किसी के लिए आसान नहीं है. ट्रंप और नेतन्याहू दोनों समझ चुके हैं कि यह लड़ाई जितनी लंबी चलेगी, उतना ही नुकसान बढ़ेगा.ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव धीरे-धीरे उसे भी बातचीत की तरफ ला सकता है.अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बारूद की गूंज के बीच शांति की आवाज निकल पाएगी या नहीं. क्योंकि यह सिर्फ तीन देशों की जंग नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के भविष्य से जुड़ा हुआ सवाल बन चुका है.
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