मिडिल ईस्ट तनाव के बीच PM मोदी का मास्टरस्ट्रोक, जयशंकर और पुरी संभाल रहे कूटनीतिक मोर्चा; बड़े मिशन पर निकले
मिडिल ईस्ट तनाव के बीच अमेरिका-ईरान दो हफ्ते के संघर्ष विराम पर सहमत हुए हैं. भारत ने इस मौके पर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है. इसी क्रम में हरदीप सिंह पुरी कतर दौरे पर हैं, जहां एलएनजी सप्लाई और रणनीतिक सहयोग पर फोकस है.
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मिडिल ईस्ट में कई दिनों से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के संघर्ष विराम पर सहमति बनना एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है. इस फैसले के बाद अब भारत ने तेजी से कूटनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ताकि अपनी ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखा जा सके. इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो सबसे भरोसेमंद मंत्री मिशन तौर पर अपने काम में लग गए हैं.
खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने की रणनीति
भारत सरकार इस मौके को सिर्फ राहत के तौर पर नहीं देख रही, बल्कि इसे एक अवसर के रूप में भुना रही है. खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को और मजबूत करने के लिए सरकार ने तुरंत हाई लेवल दौरे शुरू कर दिए हैं. इन दौरों का सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा हुआ है.
कतर दौरे का महत्व
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी 9 और 10 अप्रैल 2026 को कतर के दौरे पर हैं. यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद यह किसी भारतीय मंत्री की खाड़ी क्षेत्र की पहली यात्रा है. इस दौरान ईरान द्वारा कतर एनर्जी के ठिकानों पर हमले से गैस उत्पादन प्रभावित हुआ था, जिसका असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ा. भारत के लिए कतर का महत्व बेहद ज्यादा है, क्योंकि देश अपनी एलएनजी जरूरतों का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कतर से ही पूरा करता है. ऐसे में संघर्ष विराम के बाद भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि गैस की आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रहे.
ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन
सबसे अहम बात यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के दोबारा खुलने की संभावना बढ़ गई है. यह रास्ता भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है. हाल ही में भारत ने कतर के साथ 2048 तक के लिए बड़े एलएनजी समझौते किए हैं, और इनकी स्थिरता बनाए रखना इस दौरे का मुख्य उद्देश्य है.
यूएई दौरे पर रहेंगे विदेश मंत्री जयशंकर
वहीं दूसरी ओर, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर 11 और 12 अप्रैल को संयुक्त अरब अमीरात के दौरे पर रहेंगे. यूएई भारत का चौथा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर है. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी.
व्यापारिक सुरक्षा पर फोकस
मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते हैं, और संघर्ष के दौरान उनकी सुरक्षा भारत की प्राथमिकता रही है. अब जब हालात कुछ सामान्य हो रहे हैं, तो भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि व्यापारिक जहाजों और नागरिकों की सुरक्षा पूरी तरह बनी रहे. सरकार ने यह भी साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद देश में ईंधन की कोई कमी नहीं होने दी गई. इसका उदाहरण भारतीय जहाज ग्रीन आशा है, जिसने 5 अप्रैल को होर्मुज पार किया और 9 अप्रैल को सुरक्षित मुंबई पहुंच गया.
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बताते चलें कि यह साफ है कि भारत ने इस संकट को केवल चुनौती नहीं माना, बल्कि इसे एक रणनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश की है. इससे पहले भारत मिडिल ईस्ट में जारी जंग के दौरान बहुत ही धैर्य बनाए रखा था. जिसका नतीजा था कि ईरान ने भारत के जहाज होर्मुज से सुरक्षित निकलने दिया.
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