जहां होता रहा विरोध…! वहां चमकी ‘हिंदी’ भाषा, 93% छात्रों ने थर्ड लैंग्वेज के रूप में अपनाया
केंद्र की शिक्षा नीति में हिंदी भाषा को तीसरी लैंग्वेज के रूप में अपनाने की पॉलिसी का अक्सर विरोध होता रहा, कुछ राज्य हिंदी थोपने का आरोप लगाते रहे, लेकिन यह भाषा छात्रों की पहली पसंद बनती जा रही है.
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‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बदले वाणी’ ये महज एक कहावत नहीं है बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान है. भाषा जो अलग-अलग संस्कृतियों को एक दूसरे से जोड़ती है, लेकिन भारत में ही भाषा पर बहस भी होती है, जब बात हिंदी की आती है तो नॉर्थ वर्सेज साउथ हो जाता है, दक्षिणी राज्य अक्सर हिंदी थोपने का आरोप लगाते हुए इसे सियासी मुद्दा करार दे देते हैं, लेकिन जनता हर बार इन सियासतदाओं को झुठला देती है. जैसा की कर्नाटक में हुआ.
कर्नाटक से सामने आए ताजा आंकड़े हिंदी के चहेतों के लिए सुखद तस्वीर पेश करते हैं. यहां 93% छात्रों ने तीसरी भाषा (Third language) के रूप में हिंदी को चुना है. आंकड़े साबित करते हैं कि हिंदी तेजी से लोकप्रिय भाषा के तौर पर उभरी है.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक,
- कर्नाटक में 2025-26 में करीब 8.1 लाख छात्रों ने हिंदी को तीसरी भाषा चुना
- 7.5 लाख से ज्यादा छात्रों ने सामान्य पाठ्यक्रम के तहत हिंदी को चुना
- आदर्श विद्यालयों में NCERT पाठ्यक्रम के जरिए 4,778 छात्रों ने हिंदी पढ़ी
यह संख्या अन्य भाषाओं के मुकाबले काफी ज्यादा है, जो हिंदी विरोधियों के दावों को झुठला रही है. अक्सर दक्षिणी राज्य सरकार पर हिंदी को जबरन थोपने का आरोप लगाते हैं. जबकि यह आंकड़े बताते हैं कि छात्रों ने खुद हिंदी को जानने, समझने और पढ़ने में रुचि ली.
हिंदी ने इन भाषाओं को छोड़ा पीछे
कर्नाटक में यहां की स्थानीय भाषा कन्नड़ भी हिंदी से पिछड़ गई. जबकि अंग्रेजी को दूसरा स्थान मिला.
अंग्रेजी- 32,135 नए छात्र
कन्नड़- 11,483 नए छात्र
उर्दू- 5,544 नए छात्र
संस्कृत- 5,159 नए छात्र
अरबी- 361 नए छात्र
आंकड़ों से साफ है सबसे ज्यादा छात्रों ने जिस भाषा को अपनाया है वो हिंदी है.
थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले के बाद हिंदी की लोकप्रियता बढ़ी
थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला (Three Language Formula) भारत की शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसका मकसद राष्ट्रीय एकता बढ़ाना, भाषाई विविधता को बनाए रखना और छात्रों को कम से कम तीन भाषाओं में दक्ष बनाना है. तीसरी भाषा के रूप में छात्रों ने सबसे ज्यादा हिंदी को चुना है वो भी ऐसे राज्य में जहां क्षेत्रीय भाषा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है.
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कुछ राज्यों में खासकर तमिलनाडु में इसे हिंदी थोपने की कोशिश के रूप में देखा जाता है, इसलिए वे दो भाषा फॉर्मूला (क्षेत्रीय भाषा + अंग्रेजी) पर अड़े हुए हैं, थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला का मकसद है कि बच्चे अपनी मातृभाषा, एक अन्य भारतीय भाषा और अंग्रेजी जैसी भाषा सीखकर ज्यादा कुशल और सांस्कृतिक रूप से जुड़े रहें. तमिलनाडु में हिंदी का हमेशा से ही व्यापक विरोध होता रहा. स्टालिन सरकार ने इस नीति में हिंदी को शामिल किए जाने का पुरजोर विरोध किया था. स्टालिन ने केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से हिंदी थोपे जाने का आरोप लगाती रही है.
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