चीन नहीं अमेरिका ने फैलाया कोरोना! तुलसी गबार्ड ने जारी किए सीक्रेट दस्तावेज, दावा- वुहान लैब में भेजा गया था फंड
चीन से निकलकर जिस कोविड 19 ने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी थी वो महज एक एक्सीडेंटल या एक्सपेरिमेंटल वायरस नहीं था बल्कि सोची समझी साजिश थी.
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दिसंबर 2020, चीन का वुहान शहर, एक रिसर्च लैब से निकला वायरस जिसने पूरी दुनिया को त्रासदी की ओर धकेल दिया. लाशों के ढेर, अस्पतालों के बाहर लगी लंबी लाइन और ऑक्सीजन के लिए जद्दोजहद, ऐसा समय जब मौत के बाद अपनों को मुखाग्नि देने पर भी बंदिशें लग गई थी.
चीन से निकलकर जिस कोविड 19 ने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी थी वो महज एक एक्सीडेंटल या एक्सपेरिमेंटल वायरस नहीं था बल्कि सोची समझी साजिश थी. जो असल में चीन ने नहीं बल्कि अमेरिका ने रची थी. ये दावा खुद अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड ने किया है. जिसके बाद दुनिया भर में हड़कंप मच गया है.
कोरोना पर तुलसी गबार्ड का चौंकाने वाला दावा
अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड जाते-जाते बड़ा धमाका कर गईं. अपने कार्यकाल के आखिरी दिन उन्होंने कुछ गोपनीय दस्तावेज जारी कर दावा किया कि अमेरिका के मशहूर हेल्थ एक्सपर्ट और पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के करीबी डॉ. एंथनी फाउची (Dr. Fauci) ने वुहान रिसर्च लैब को लाखों डॉलर दिए थे. दावा किया जाता है कि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से ही कोरोना पूरी दुनिया में फैला था, लेकिन कोरोना वायरस पर खतरनाक गेन-ऑफ फंक्शन रिसर्च के लिए फंड बाइडेन के पूर्व चीफ मेडिकल एडवाइजर फाउची ने दिए थे.
गबार्ड ने उन गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जिनमें डॉ. एंथनी फाउची की फंडिंग से जुड़े सबूत हैं. दरअसल, डॉ. फाउची ने साल 2020 की शुरुआत में अमेरिका में कोविड वायरस का संक्रमण आने पर बाइडन सरकार की कोविड रणनीति का नेतृत्व किया था.
क्या है ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’
डॉ. फॉसी ने जिस ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ के लिए फंडिंग की थी. वह एक ऐसी वैज्ञानिक रिसर्च है, जिसमें किसी वायरस को लैब के भीतर जानबूझकर ज्यादा ताकतवर, संक्रामक या खतरनाक बनाया जाता है. ताकि यह पता लगाया जा सके कि भविष्य में यह वायरस इंसानों पर कैसे असर डाल सकते हैं या कितना गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं.
तुलसी गबार्ड ने जो दस्तावेज जारी किए हैं उसके अनुसार, एंथनी फाउची ने अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर चीन की उसी वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को दिए, जिसे कोरोना महामारी का केंद्र माना जाता है.
Today, on my final day as Director of National Intelligence, I’m releasing never-before-seen communications and documents exposing how Dr. Fauci provided millions in US taxpayer dollars to fund dangerous gain-of-function research at the Wuhan lab, worked with politicized elements… pic.twitter.com/ZMdliW4zyS
— DNI Tulsi Gabbard (@DNIGabbard) June 19, 2026
लैब के लीक सबूतों को फाउची ने ही दबाया- गबार्ड
तुलसी गबार्ड ने डॉ. फाउची पर बड़ा दावा करते हुए कहा, फाउची ने साल 2024 में अमेरिकी संसद के सामने शपथ लेकर झूठ बोला था. गबार्ड ने कहा,
‘फाउची ने इंटेलिजेंस कम्युनिटी के साथ मिलकर लैब-लीक के सबूतों को दबाया और दुनिया के सामने वायरस के प्राकृतिक उत्पत्ति का फर्जी नैरेटिव पेश किया ताकि उनकी फंड की गई खतरनाक रिसर्च छिपी रहे.’
गबार्ड के कार्यालय ने बताया, डॉ. फाउची ने खुद एक ‘फर्जी वैज्ञानिक पेपर’ तैयार करवाकर अपने पसंदीदा वैज्ञानिकों को खुफिया एजेंसियों के पास भेजा. इन वैज्ञानिकों ने आधिकारिक रिपोर्ट में लिखवाया कि कोरोना वायरस लैब से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से जानवरों से इंसानों में फैला है, ताकि फाउची का खतरनाक रिसर्च प्रोजेक्ट छिपा रहे. ये कुछ वैसा ही था जैसे एक क्रिमिमल पहले प्लानिंग करता है, फिर उसे अंजाम देता है और अंजाम के बाद उसे छुपाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें लगाता है.
तुलसी गबार्ड के ऑफिस की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया कि वायरस के लैब लीक से फैलने की सच्चाई को दबाने के लिए राजनीति से जुड़े अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया. कहा गया कि ‘ये दस्तावेज़ COVID-19 पर IC (इंटेलिजेंस कम्युनिटी) के आकलन को प्रभावित करने और उनमें हेरफेर करने में फाउची की सीधी भूमिका का पर्दाफ़ाश करते हैं.’
'सच सामने लाने वालों को डराया-धमकाया गया'
तुलसी गबार्ड के खुलासे के बाद यह भी सामने आया कि जिन व्हिसलब्लोअर्स या विशेषज्ञों ने फाउची के झूठ को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें डराया-धमकाया गया और उनके करियर बर्बाद कर दिए गए.
तुलसी गबार्ड ने इसे ‘डीप स्टेट प्लेबुक’ का हिस्सा बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. फाउची जैसे लोग अपनी गलतियों को छिपाने के लिए न केवल जनता को गुमराह करते रहे, बल्कि निर्वाचित राष्ट्रपति तक को महत्वपूर्ण तथ्यों से दूर रखा.
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब फाउची पर कोरोना से जुड़े आरोप लगे हैं. साल 2021 में कोरोना के प्रसार के दौरान ही उन पर आरोप लगे थे कि अमेरिकी सरकार से मिले पैसे का एक हिस्सा गैर-लाभकारी संस्था के जरिए चीन की वुहान लैब में चमगादड़ों पर रिसर्च के लिए इस्तेमाल हुआ. हालांकि डॉ. फाउची ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उनकी एजेंसी ने वुहान लैब में वायरस को ज्यादा खतरनाक बनाने वाली रिसर्च के लिए किसी भी तरह की फंडिंग नहीं दी. हालांकि इसके बाद भी फाउची पर सवाल उठते रहे.
गबार्ड ने कहा, ‘कोविड-19 महामारी की वजह से हमारे लाखों साथी, अमेरिकियों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों को बहुत मुश्किल भरे दौर से गुजरना पड़ा. सालों के झूठ, सेंसरशिप और छिपाने के बाद, अमेरिकी लोग पारदर्शिता, सच्चाई और जवाबदेही के हकदार हैं.’
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डॉ. एंथनी फाउची ने लगभग 38 वर्षों तक अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी (NIAID) का जिम्मा संभाला है. ऐसे में तुलसी गबार्ड का ये दावा उन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. ये दावे न केवल फाउची बल्कि तत्कालीन जो बाइडेन सरकार को भी कटघरे में खड़ा करते हैं.
कौन हैं तुलसी गबार्ड
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भारतीय मूल की तुलसी गबार्ड राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टॉप अधिकारियों में शामिल रही हैं. वह अमेरिका की 'डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस' हेड थीं, 22 मई को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. 19 जून उनके कार्यकाल का आखिरी दिन था. तुलसी गबार्ड की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंडर में 18 सीक्रेट एजेंसियां काम करती थीं. पति को कैंसर होने की वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. क्योंकि इस मुश्किल समय में वह पति को पूरा समय देना चाहती हैं.