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आंबेडकर की प्रतिमाओं पर हमले के पीछे का पैटर्न उजागर-गोरखपुर से लेकर जौनपुर तक ‘षड्यंत्र’ की टूलकिट हुई बेनकाब!

जिस तरह एक के बाद एक आंबेडकर की प्रतिमाओं को निशाना बनाया गया, उससे एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है. यह पैटर्न किसी आकस्मिक प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'टूलकिट' का संकेत देता है.

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17 Apr 2026
( Updated: 17 Apr 2026
06:41 PM )
आंबेडकर की प्रतिमाओं पर हमले के पीछे का पैटर्न उजागर-गोरखपुर से लेकर जौनपुर तक ‘षड्यंत्र’ की टूलकिट हुई बेनकाब!
Source- IANS
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एक ओर, देश-प्रदेश में 14 अप्रैल को हर्षोल्लास से बाबा साहेब डॉ.भीमराव आंबेडकर के जन्मदिवस पर विभिन्न आयोजन हो रहे थे, वहीं कुछ शरारती तत्वों ने इस अवसर को प्रदेश में अशांति और अराजकता की आज में झुलसाने का प्रयास किया. ऐसे में, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, कासगंज और जौनपुर से सामने आई घटनाओं को अब अलग-अलग आपराधिक वारदातों के रूप में देखना नासमझी होगी. 

प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह एक के बाद एक आंबेडकर की प्रतिमाओं को निशाना बनाया गया, उससे एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है. यह पैटर्न किसी आकस्मिक प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'टूलकिट' का संकेत देता है. जिसमें प्रतीकों पर हमला करके सामाजिक तनाव पैदा किया जाए, फिर उसी तनाव को कानून-व्यवस्था की विफलता के रूप में पेश कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाए. 

क्या साजिश के पीछे किसका हाथ?

सवाल यह है कि क्या प्रदेश में अराजकता को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है. कहा जा रहा है, इसके मूल में है वही समाजवादी पार्टी जो आजकल प्रदेश में खुद को दलितों का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करने में लगी है. 

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गोरखपुर में खुली 'टूलकिट' की पहली परत!

गोरखपुर के बांसगांव में आंबेडकर प्रतिमा को खंडित करने की घटना इस टूलकिट की पहली स्पष्ट परत के रूप में सामने आती है. इस मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपियों के नाम विष्णु यादव और संदीप यादव हैं. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार किया और मौके पर शांति व्यवस्था कायम रखते हुए प्रतिमा की पुनर्स्थापना की. 

आरोप है कि गिरफ्तार किए गए दोनों ही आरोपियों का कथित तौर पर समाजवादी पार्टी से नाता रहा है. ऐसे में, एक ओर समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव खुद लखनऊ में बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण करके दलितों के कल्याण की कसमें खा रहे थे, वहीं उनके समर्थक उसी बाबा साहेब की प्रतिमा को तोड़कर प्रदेश में आग लगाने की फिराक में थे. 

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सोचिए, ये किस प्रकार का षड्यंत्र था, जहां लक्ष्य केवल नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि एक खास सामाजिक प्रतिक्रिया को ट्रिगर करना था. यही वह बिंदु है जहां यह घटना एक बड़ी रणनीति का हिस्सा लगने लगती है. 

कासगंज: माहौल बनाकर टकराव की स्क्रिप्ट

कासगंज में आंबेडकर जयंती के दिन जो हुआ, वह इस कथित टूलकिट के दूसरे चरण को समझने में मदद करता है. इस क्षेत्र के चहका गुनार गांव में पिछले 30 वर्षों से यादव पक्ष का रवैया 'जातीय श्रेष्ठता' के उस दंभ से भरा रहा है, जो दलितों को बराबरी का दर्जा देने के विचार मात्र से चिढ़ता है. ऐसे में, मौजूदा प्रकरण में यहां पहले रास्ता रोका गया, फिर तनाव पैदा किया गया और अंततः पत्थरबाजी और हिंसा की स्थिति बनाई गई. यहां तक कि पुलिस पर हमला भी हुआ. 

जाहिर है कि यह घटनाक्रम स्वतःस्फूर्त नहीं लगता. यह एक स्क्रिप्टेड प्रक्रिया की तरह नजर आता है, जिसमें पहले माहौल को गर्म किया जाता है और फिर उसे विस्फोटक स्थिति तक पहुंचाया जाता है. 

जब सार्वजनिक उत्सव को ही टकराव का माध्यम बना दिया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि अराजकता पैदा करना है. यहां सबसे बड़ी बात यही है कि जितने भी लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें से ज्यादातर का जुड़ाव समाजवादी पार्टी से रहा है. 

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यानी, यह एक षड्यंत्र था जहां अराजकता का सारा दोष लॉ एंड ऑर्डर पर थोपकर खुद को दलितों का संरक्षक सिद्ध करने की कोशिशें धरी की धरी रह गईं और उनका असली चेहरा उजागर हो गया. 

जौनपुर: प्रतीकात्मक उकसावे की रणनीति!

दावा किया जा रहा है कि यह दोनों घटनाएं जिस टूलकिट से जुड़ी हुई हैं, उसकी जड़ के बारे में जानने के लिए जौनपुर की मार्च 2026 की घटना को समझना होगा. इस घटना में आंबेडकर प्रतिमा पर कालिख पोतकर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई. यानी यह सीधा हमला नहीं था, बल्कि एक ऐसा प्रतीकात्मक कृत्य था जो अपमान और उकसावे दोनों को साथ लेकर चलता है. 

जाहिर है कि इस तरह की घटनाओं का मकसद होता है भावनाओं को भड़काना और समाज में प्रतिक्रिया पैदा करना. प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप करना पड़ा, जिससे यह साफ हो गया कि ऐसे कृत्य कितनी तेजी से हालात बिगाड़ सकते थे. जब एक ही तरह के प्रतीकों को अलग-अलग जिलों में निशाना बनाया जाता है, तो यह एक पैटर्न बन जाता है और वही पैटर्न अब इस पूरे मामले की असली परत को खोलता है. 

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पैटर्न और राजनीति का कनेक्शन!

अगर लगातार सामने आ रहे मामलों में एक ही तरह के नाम और एक ही राजनीतिक धारा से जुड़े होने की बातें बार-बार उभरती हैं, तो इसे महज संयोग मान लेना अपने आप में आंख मूंद लेना होगा. 
 
चाहें गोरखपुर में गिरफ्तार विष्णु यादव और संदीप यादव का मामला हो, या अन्य जिलों में सामने आई घटनाएं, हर बार एक ऐसा पैटर्न दिखता है जो सीधे-सीधे समाजवादी पार्टी से जुड़ी राजनीतिक संदर्भों की ओर इशारा करता है. 

ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या इस टूलकिट के तहत पहले आंबेडकर के प्रतीकों को निशाना बनाया जाता है, फिर उससे सामाजिक तनाव पैदा किया जाता है और अंततः उसी तनाव के आधार पर यह नैरेटिव खड़ा किया जाता है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है. इसका जवाब 'हां' है, ये कोई पहला मामला नहीं है जब अराजकता की आड़ में राजनीतिक अवसरवादिता को साधने की कोशिश न हुई हो. 

अखिलेश यादव से क्या है मांग? 

ऐसे में, इन घटनाओं को लेकर अखिलेश यादव और उनकी पार्टी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन घटनाओं में बार-बार संलिप्तता वाली चर्चाएं क्यों सामने आती हैं. क्या यह केवल संयोग है, या फिर यह एक सुनियोजित रणनीति है जिसमें अराजकता को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? 

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हालांकि, BJP का दावा है कि इस बार यह कथित टूलकिट पूरी तरह सफल होती नहीं दिखी. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रशासन ने जिस तरह त्वरित कार्रवाई की, उसने इस पूरी स्क्रिप्ट को बीच में ही तोड़ दिया. गोरखपुर में तत्काल गिरफ्तारी, कासगंज में हालात पर नियंत्रण और जौनपुर में सक्रिय प्रशासनिक हस्तक्षेप ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जा रही. 

यही वजह है कि जिस अराजकता को बड़ा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही थी, वह जमीन नहीं पकड़ सकी और अब वही राजनीतिक स्वर दूसरे मुद्दों की ओर मुड़ते नजर आ रहे हैं. 

‘टूलकिट’ का सच आया सामने!

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BJP का आरोप है कि गोरखपुर से लेकर जौनपुर तक की घटनाएं अब यह संकेत देती हैं कि आंबेडकर की प्रतिमाओं पर हमले अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ‘टूलकिट’ का हिस्सा थे. इस टूलकिट का उद्देश्य प्रतीकों पर हमला करके समाज में तनाव पैदा करना, फिर उसी तनाव को राजनीतिक नैरेटिव में बदलना और अंततः उससे लाभ उठाने की कोशिश करना हो सकता है. वे इसमें कामयाब भी हो जाते अगर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार न होती, जिस सरकार का सूत्रवाक्य ही 'जीरो टॉलरेंस' और 'विरासत व विकास' है, उसके सामने इस प्रकार के षड्यंत्र भला कहां ठहरने वाले थे. 

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कहा जा रहा है हर खुलती परत के साथ इन मामलों में विपक्ष की स्याह तस्वीर और भी पुष्ट होती जाती है और पूरी सोच उजागर हो जाती है. इसके पीछे समाजवादी पार्टी के दलितों के खिलाफ पुराना इतिहास बताया जा रहा है. ऐसे में उनकी वर्तमान की कार्यप्रणाली उनके PDA की सच्चाई को जनता के सामने ला चुकी है. उनका टूलकिट एक्सपोज हो चुका है और यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ इस षड्यंत्रकारी और अवसरवादी राजनीति की चर्चा  और आलोचना जोर पकड़ रही है. 

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