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ममता के जाने के बाद पलटी बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन की किस्मत, 19 साल बाद लौटेंगी बंगाल

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के जाने के बाद बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन के दिन बदलने लगे हैं. लंबे समय तक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं नसरीन 19 साल बाद बंगाल का दौरा करेंगी. सुवेंदु सरकार ने उनकी पुख्ता सुरक्षा का वादा और बंदोबस्त किया है.

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15 Jul 2026
( Updated: 15 Jul 2026
10:15 AM )
ममता के जाने के बाद पलटी बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन की किस्मत, 19 साल बाद लौटेंगी बंगाल
Taslima Nasrin (File Photo)/ Image Source: IANS
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बंगाल में ममता सरकार के जाने और बीजेपी के सत्ता में आने के बाद कई लोगों की किस्मत मानो पलट सी गई है. अपने देश बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की धमकी के कारण निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहीं मशहूर बांग्लादेशी लेखिका और कवयित्री तस्लीमा नसरीन के भी दिन बदलने वाले हैं. ममता बनर्जी और पूर्ववर्ती लेफ्ट सरकार के दौरान उन्हें बंगाल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था. कोलकाता में भारी विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथियों की धमकी के आगे सरकार झुक गई थी और नसरीन को बाहर जाना पड़ा था, लेकिन वो अब 19 साल बाद 1 अगस्त को कोलकाता लौटने जा रही हैं.

19 साल बाद बंगाल लौटेंगी तसलीमा नसरीन

आपको बता दें कि वर्ष 2007 में उनकी किताब 'द्विखंडितो' को लेकर विवाद हुआ था. उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य थे. किताब के विरोध में कोलकाता के कुछ इलाकों में हिंसक प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद तस्लीमा नसरीन को शहर छोड़ना पड़ा था.

1 अगस्त को कोलकाता जाएंगी तसलीमा नसरीन

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वह 1 अगस्त को कोलकाता आ रही हैं. वह सेंट्रल कोलकाता के रवींद्र सदन में होने वाले एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होंगी, जिसे कई सांस्कृतिक समूहों ने मिलकर आयोजित किया है. इनमें से एक समूह 'सेक्युलर मिशन' है. सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजकों ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को इस मौके पर मौजूद रहने के लिए आमंत्रित किया था, और उन्होंने इसके लिए सहमति भी दे दी थी.

सुवेंदु अधिकारी सरकार ने दिया सुरक्षा का भरोसा

आयोजकों में से एक, मोहित रॉय ने कहा कि नसरीन की सुरक्षा एक अहम मुद्दा है, इसलिए राज्य पुलिस प्रशासन ने राज्य में उनके प्रवास के दौरान पुख्ता सुरक्षा का भरोसा दिया है. उन्होंने कहा कि इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कोई राजनीति शामिल नहीं है, और यह कार्यक्रम नसरीन द्वारा लिखे गए विभिन्न उपन्यासों, कहानियों और कविताओं पर केंद्रित होगा. अगले महीने होने वाले इस सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजकों में से एक, "सेक्युलर मिशन" के प्रतिनिधि और कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील उस्मान मल्लिक ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करके कार्यक्रम में नसरीन की मौजूदगी की पुष्टि की.

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मल्लिक ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि लंबा इंतजार खत्म हो गया है और वह सभी प्रतिक्रियावादी ताकतों को मात देकर आ रही हैं. उन्होंने कहा कि वे उनके संघर्ष के साथ थे, हैं और रहेंगे. उन्होंने नसरीन को 'कट्टरपंथ-विरोधी विरोध प्रदर्शनों का एक सशक्त प्रतीक' बताया. हालांकि, पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (एआईएसएफ) के एकमात्र विधायक नौशाद सिद्दीकी ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी आपत्ति जताई है.

सिद्दीकी ने मीडियाकर्मियों से कहा कि भाजपा ने अन्नपूर्णा योजना, बिजली और महिलाओं की सुरक्षा का वादा किया था और सत्ता में आई थी. उन्होंने कहा कि उन्होंने जो भी वादे किए थे, वे फिलहाल विफल रहे हैं, और उस विफलता से लोगों का ध्यान हटाने के लिए वे नसरीन का राज्य में स्वागत कर रहे हैं. उन्होंने सवाल किया कि नसरीन आकर क्या कहेंगी, और कहा कि वह कुछ मुस्लिम-विरोधी बयान देंगी और फिर वापस चली जाएंगी.

2007 में लेफ्ट राज में बाहर गईं, ममता सरकार में नहीं आने दिया गया वापस!

2007 में, नसरीन के उपन्यास "द्विखंडितो (द बाइफरकेटेड)" के प्रकाशन को लेकर कोलकाता के कुछ इलाके युद्ध के मैदान में बदल गए थे. शहर के अल्पसंख्यक-बहुल इलाकों में तनाव फैल गया था. हालात इतने बिगड़ गए थे कि प्रशासन को सेना तैनात करनी पड़ी थी.

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लेफ्ट शासन में राज्य छोड़ने का दिया गया था आदेश

तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य में किताब के वितरण पर भी रोक लगा दी थी. बांग्लादेशी लेखिका को कोलकाता छोड़ने के लिए भी कहा गया था. बाद में, 2011 से 2016 तक तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान भी नसरीन पर लगा यह अघोषित प्रतिबंध लागू रहा.

हिंदुओं के लिए उठाती रही हैं आवाज, बांग्लादेश के कट्टरपंथी रहते हैं परेशान

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आपको बता दें कि नसरीन बांग्लादेश में अल्पसंख्य हिंदुओं पर होने वाले हमले और बढ़ती कट्टरता की मुखर आलोचक रही हैं. उन्होंने हमेशा से बांग्लादेश में कट्टरपंथियों और जमात-ए-इस्लामी की पैठ का विरोध किया. उन्होंने मौलानाओं की कट्टरता, मदरसे, इस्लाम आदि विषयों पर भी खुलकर आलोचना की, यहां तक की भारत में भी इस्लामीकरण की विचारधारा पर तगड़ा हमला बोला. उनकी यही विचारधारा उनके लिए भारी पड़ी और उन्हें आए दिन जान का खतरा बना रहता है.

दीपू दास की बर्बर लिंचिंग पर भी किया था बड़ा खुलासा!

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वो तसलीमा नसरीन ही थीं, जिन्होंने बीते साल दिसंबर में हिंदू युवक दीपू दास की कट्टरपंथियों द्वारा जिदा जलाने की घटना का खुला किया था. उन्होंने ही बताया था कि कैसे एक झूठे आरोप में दीपू को साथी मुस्लिम सहकर्मियों ने भीड़ के हवाले कर दिया था.

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