Advertisement
भारत के लिए मिस्त्र ने पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की के 'इस्लामिक नाटो' को दिखाया ठेंगा, ठुकराया मक्का समझौते का प्रस्ताव
पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच बीते दिनों नया रक्षा समझौता हुआ, जिसे मक्का डील कहा गया. इसमें मिस्त्र को भी शामिल करने की 2 साल तक काफी मशक़्क़त की गई, लेकिन उसने भारत के लिए इसमें शामिल होने का प्रस्ताव कथित तौर पर ठुकरा दिया.
Advertisement
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हस्ताक्षरित 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' (मक्का संयुक्त रक्षा समझौता) क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इसे पाकिस्तान की ओर से इस्लामिक नाटो की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है. यानी कि यूरोपीय देशों के सैन्य संगठन नाटो की तरह एक देश पर हमला दूसरे सदस्य देशों के ऊपर भी हमला माना जाएगा वाला क्लॉज़ शामिल किया गया है.
लाख कोशिशों के बावजूद मक्का समझौते में शामिल नहीं हुआ मिस्त्र!
हालांकि पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किए को उस समय झटका लगा जब लंबी कोशिशों के बावजूद मिस्त्र इस समूह में शामिल नहीं हुआ और दो टूक कह दिया कि उसकी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. कहा जा रहा है कि मिस्त्र ने कथित तौर पर भारत की वजह से इस मक्का पैक्ट से दूरी बनाई है.
Advertisement
भारत के कारण मिस्त्र ने इस्लामिक नाटो से बनाई दूरी!
Advertisement
बीबीसी की रिपोर्ट की मानें तो मिस्त्र ने इस समझौते में शामिल होने के बजाय भारत और यूएई के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता दी है. एक ओर मिस्त्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल सीसी भारत के साथ आर्थिक संबंधों को बढ़ाना चाह रहे हैं, यूएई की तरह ही कोई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट या कोई कंप्रेहेंसिव इकोनॉमिक डील हो जाए. वहीं उसे यूएई से भी फंडिंग की ज़रूरत है ताकि मुल्क अच्छे से चल सके और पब्लिक एंगर भी मैनेज रहे.
मिस्त्र ने भारत के कारण क्यों बनाई पाकिस्तान-तुर्की, सऊदी के समझौते से दूरी!
Advertisement
इस संबंध में दिल्ली स्थित थिंक टैंक अनंता सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची ने दलील दी कि मिस्त्र ने इस डील से दूरी बनाने के पीछे अपने मित्र देशों की चिंता का भी ध्यान दिया है. बागची की मानें तो मिस्त्र ने इस बात का ख़याल रखा कि उनके लिए इस डील में शामिल होना ठीक नहीं क्योंकि इसके सदस्य देशों की हिस्ट्री और संबंध उसके मित्र देशों के साथ ठीक नहीं है.
भारत के साथ संबंधों को मिस्त्र ने ज्यादा तवज्जो दी!
मसलन मिस्र अरब का पहला ऐसा मुस्लिम देश है जिसने इसराइल को सबसे पहले मान्यता दी और उसके साथ शांति समझौता भी है. ज्ञात हो कि मिस्र ही वो देश है जिसने इज़रायल बनने के बाद कई बार उससे युद्द किए, कई जंगे लड़ीं और अरब देशों का नेतृत्व किया. हालांकि बदले वैश्विक परिवेश में उसने अपने फैसलों में लचीला रुख़ अख़्तियार किया. ऐसे में अब वो ऐसे किसी भी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकता जिसके देश इज़रायल के अस्तित्व को ही नकारते हैं, उसे खत्म करना चाहते हैं.
Advertisement
इतना ही नहीं उसके भारत के साथ भी संबंध भी अच्छे नहीं हैं और तो और कहीं ना कहीं कथित इस्लामिक नाटो का इस्तेमाल ही भारत के ख़िलाफ़ करने की कोशिश उसके यानी कि पाकिस्तान के द्वारा की जाएगी. वहीं मिस्र का यूएई के साथ बहुत गहरा संबंध है, जिसके कि सऊदी के साथ संबंधों में अविश्वास पैदा हुआ है. मिस्र ऐसे में किसी पक्ष को नहीं चुनना चाहता है.''
बीबीसी ने इंद्राणी बागची के हवाले से लिखा है कि, ''मिस्र अगर मक्का समझौते का हिस्सा भी होता तो भारत के साथ संबंधों पर बहुत असर नहीं पड़ता लेकिन इसका संदेश अच्छा नहीं जाता.''
भारत-मिस्त्र के बीच कितना है व्यापार?
Advertisement
बीबीसी के मुताबिक़ भारत मिस्त्र के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक दोस्त नहीं बल्कि एक आर्थिक साझेदार, ट्रंप कार्ड और मुश्किल के वक्त में ट्रस्टवर्दी दोस्त है. अल सीसी चाह रहे हैं कि भारत के साथ आर्थिक साझेदारी को बढ़ाया जाए. फ़िलहाल मिस्र में क़रीब 700 से अधिक भारतीय कंपनियां रजिस्टर्ड हैं, जो कि क़रीब 70 अलग-अलग सेक्टर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. और ये मिलकर इनका कुल 5.5 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किए हुए हैं. जिसके ज़रिए मिस्र के क़रीब 40,000 लोगों को रोज़गार मिला रहा है.
बीबीसी की ख़बर के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और मिस्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.5 अरब डॉलर रहा.
मिस्र को भारत के प्रमुख निर्यात में पेट्रोलियम उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन, सूती धागा, मांस के साथ दवाएं शामिल हैं. मिस्र से भारत के प्रमुख आयात में पेट्रोलियम उत्पाद, केमिकल, मेटल और खट्टे फल शामिल हैं. मिस्र को निर्यात करने के मामले में भारत पांचवां सबसे बड़ा देश, मिस्र से आयात करने वाला 12वां सबसे बड़ा देश और मिस्र का छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. ऐसे में एक ठोस बनी-बनाई आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी और भारत को नाराज़ कर मिस्त्र ऐसे किसी भी गुट में शामिल नहीं होना चाहता जिसके मेंबर की उसके दोस्तों के साथ शत्रुता है.
Advertisement
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस समझौते में कहा गया है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. साथ ही रक्षा सहयोग को कई क्षेत्रों में और बढ़ाने का भी प्रावधान किया गया है.
मिस्त्र में मक्का समझौता और भारत के लिए क्या कहा जा रहा है?
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में तेजी से बदल रहे रणनीतिक हालात का परिणाम है. इसमें ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की सैन्य कार्रवाई, अमेरिकी ठिकानों पर ईरान की जवाबी कार्रवाई तथा खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा और जल ढांचे की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं शामिल हैं.
Advertisement
विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य अस्थिर होते क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना है. वहीं मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक़, ''मिस्र... तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान से बने एक धड़े और दूसरी ओर इसराइल, यूएई और भारत वाले धड़े के बीच किसी एक पक्ष को चुनना नहीं चाहता…” MEI के मुताबिक़ मिस्र दिल्ली के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को और मज़बूत करने में रुचि रखता है. साथ ही, वह यूएई से मिलने वाली वित्तीय मदद पर भी निर्भर है.
भारत-यूएई-इजरायल और मिस्त्र के बीच नया गठजोड़?
मिस्र के ऑनलाइन पेपर माडा मस्र ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि, ''अरब के एक पूर्व राजनयिक का मानना है कि मिस्र तुर्की के साथ किसी रक्षा समझौते में शामिल नहीं होगा, ख़ासकर ग्रीस और साइप्रस के साथ उसके जटिल संबंधों को देखते हुए. इसी तरह, यह देखना भी मुश्किल है कि मिस्र पाकिस्तान के साथ किसी रक्षा समझौते में शामिल होगा, क्योंकि मिस्र भारत के साथ आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहा है." बीबीसी ने माडा मिस्त्र के हवाले से ये रिपोर्ट छापी है. हालांकि ये समझौता कितना कारगर साबित होगा ये तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन ये अपने पहले ही टेस्ट में 48 घंटे के अंदर फेल साबित हो गया.
Advertisement
जहां तक मक्का समझौते की बात है तो इसने भारत के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है. एक विश्लेषक ने कहा, "सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भविष्य में किसी बड़े सीमा-पार आतंकी हमले के बाद भारत को पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ढांचे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करनी पड़े, तो इस समझौते की पारस्परिक रक्षा धारा की व्याख्या किस तरह की जाएगी."
क्या सच में इस्लामिक नाटो भारत की चिंता बढ़ाने वाला है?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत हमेशा यह स्पष्ट करता रहा है कि आत्मरक्षा के तहत की जाने वाली आतंकवाद-रोधी कार्रवाई किसी संप्रभु देश के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई से अलग होती है. ऐसी स्थिति में यह रक्षा प्रावधान कानूनी या राजनीतिक रूप से लागू होगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. यह पूरी तरह परिस्थितियों, राजनयिक सलाह-मशविरों और समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले तीनों देशों की व्याख्या पर निर्भर करेगा.
Advertisement
ये भी पढ़ें: कागजी साबित हुआ PAK-तुर्की-सऊदी रक्षा समझौता, एक हमला और शुरू होने से पहले ही जमींदोज हुआ 'इस्लामिक नाटो' का ख्वाब
विश्लेषकों का कहना है कि तुर्की लगातार पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है. वहीं, सऊदी अरब के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और मजबूती को बढ़ा सकते हैं. एक विशेषज्ञ के अनुसार, "इन घटनाक्रमों पर नई दिल्ली को स्वाभाविक रूप से करीब से नजर रखनी चाहिए."
दूसरी ओर, भारत और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश और आतंकवाद-रोधी सहयोग के आधार पर मजबूत और लगातार बढ़ते रणनीतिक संबंध हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि रियाद को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह समझौता भारत के खिलाफ नहीं है और इससे सभी प्रकार के आतंकवाद के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता कमजोर नहीं पड़ती.
Advertisement
ये भी पढ़ें: 'कोई भी कागजी समझौते नहीं बचाएगा...', PAK-तुर्किए-सऊदी डिफेंस डील की ईरान ने निकाली हवा, MBS को दे डाली वॉर्निंग
यह भी पढ़ें
विशेषज्ञों की राय है कि भारत के लिए सही प्रतिक्रिया न तो घबराहट होनी चाहिए और न ही लापरवाही. इसके बजाय भारत को सावधानीपूर्ण कूटनीति, क्षेत्रीय साझेदारों के साथ लगातार संवाद और इस बात पर दृढ़ रुख बनाए रखना चाहिए कि कोई भी सुरक्षा व्यवस्था सीमा-पार आतंकवाद को किसी भी तरह का राजनीतिक संरक्षण नहीं दे सकती.