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हेट स्पीच मामले में SC की कड़ी टिप्पणी, कपिल सिब्बल से पूछा तीखा सवाल- क्या आरोप केवल BJP के मुख्यमंत्रियों पर ही सही हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने 12 लोगों की PIL पर सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के मुद्दे पर दायर याचिका में केवल बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को निशाना बनाया गया है, जो पक्षपातपूर्ण है. बता दें याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल थें.

हेट स्पीच मामले में SC की कड़ी टिप्पणी, कपिल सिब्बल से पूछा तीखा सवाल- क्या आरोप केवल BJP के मुख्यमंत्रियों पर ही सही हैं?
Kapil Sibal (File Photo)
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कथित हेट स्पीच को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने साफ कहा कि याचिका अगर केवल कुछ चुनिंदा राजनीतिक व्यक्तियों को निशाना बनाती है तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने संकेत दिया कि संवैधानिक नैतिकता जैसे गंभीर मुद्दे पर किसी एक दल या राज्य को केंद्र में रखकर बहस नहीं की जा सकती.

यह टिप्पणी उस जनहित याचिका पर आई, जिसे 12 प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने दायर किया था. याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग और नौकरशाह सार्वजनिक मंचों से ऐसे बयान दे रहे हैं जो नफरत फैलाते हैं और संविधान की भावना के खिलाफ हैं.

क्या है पूरा मामला?

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याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि देश का माहौल जहरीला होता जा रहा है और इसे संतुलित करने के लिए न्यायालय को दिशा-निर्देश तय करने चाहिए. उनका कहना था कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपने भाषणों में संयम और नैतिक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए. हालांकि, सुनवाई कर रही पीठ ने तुरंत सवाल उठाया कि याचिका में केवल बीजेपी शासित राज्यों के नेताओं का नाम क्यों है. पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची शामिल थे. अदालत ने कहा कि अगर हेट स्पीच का मुद्दा उठाया जा रहा है तो उसे सभी राजनीतिक दलों और नेताओं पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने की सख्त टिप्पणियां?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह याचिका कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाती प्रतीत होती है, जबकि अन्य दलों के नेताओं के कथित बयानों का कोई जिक्र नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि एक निष्पक्ष और तटस्थ याचिका के साथ ही सुनवाई आगे बढ़ सकती है. मुख्य न्यायाधीशसूर्यकांत ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों को संवैधानिक नैतिकता का पालन करना चाहिए और भाषण देते समय संयम बरतना चाहिए. अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी दिशा-निर्देश सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए.

किन नेताओं का था जिक्र?

याचिका में जिन नेताओं का नाम लिया गया, उनमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस, देवभूमि उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी, अनंत कुमार हेगड़े और केंद्रीय गृह मंत्री गिरिराज सिंह शामिल थे. इसके अलावा कुछ नौकरशाहों की टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया था.

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर छिड़ी नई बहस

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालत आदेश दे सकती है, लेकिन विचार प्रक्रिया को नियंत्रित करना संभव नहीं है. उन्होंने पूछा कि क्या न्यायिक निर्देशों से किसी की सोच बदली जा सकती है. साथ ही उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का भी जिक्र किया. न्यायमूर्ति बागची ने याचिका को अस्पष्ट बताते हुए कहा कि इसे लोकलुभावन प्रयास के बजाय रचनात्मक संवैधानिक पहल बनाना चाहिए. अदालत ने कहा कि राजनीति का शोर-शराबा जनहित याचिका का आधार नहीं हो सकता.

कपिल सिब्बल ने मांगा दो सप्ताह का समय 

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जब कपिल सिब्बल ने कहा कि वे याचिका से व्यक्तियों के नाम हटा देंगे, तो पीठ ने स्पष्ट किया कि आवश्यक संशोधन के बाद ही मामले पर आगे सुनवाई होगी. सिब्बल ने इसके लिए दो सप्ताह का समय मांगा है. याचिकाकर्ताओं की मांग है कि संवैधानिक पदधारियों के भाषणों को संवैधानिक नैतिकता के दायरे में रखने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं. साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो.

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बताते चलें कि यह मामला केवल कानूनी तकनीक का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी है. अब सबकी नजर इस पर है कि संशोधित याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट किस तरह का संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है.

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