Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...

जिसे कभी मुंह तक नहीं लगाया...उस कांग्रेस से गुहार लगाती रह गईं ममता, लगा बड़ा झटका, राहुल गांधी ने भी कहा NO!

ममता बनर्जी को जो कांग्रेस फूटी आंख नहीं सुहाती थी, उससे उपचुनाव के लिए मदद मांगती नज़र आईं. दिल्ली तक फोन लगाया, केसी वेणुगोपाल से बात की, लेकिन जो जवाब मिला उससे उन्हें बड़ा झटका लगा है.

Image Source-IANS
Loading Ad...

TMC सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने मौजूदा और पूर्व सहयोगियों के आग्रह और प्रोत्साहन के बावजूद अगले महीने होने वाले विधानसभा उपचुनावों में चुनाव न लड़ने का फैसला किया है. इस फैसले ने उनके व्यापक राजनीतिक हितों को लेकर चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है. कहा जा रहा है कि उनके चुनावी मैदान में ना उतरने का फैसला उनकी उम्र, पार्टी में बगावत, हार का डर ही नहीं बल्कि कांग्रेस की ओर से मिला झटका भी है, जिससे कि उनकी आखिरी उम्मीद भी चकना-चूर हो गई.

ममता बनर्जी को कांग्रेस से क्या झटका लगा?

दरअसल जिस बंगाल की राजनीति में कांग्रेस को खत्म करने के लिए ममता ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, कथित तौर पर कांग्रेस के संगठन के आंतरिक फैसलों तक में दखलअंदाजी की, उसे कभी गठबंधन में जगह नहीं दिया, जलील किया और लोकसभा में 42 में से ज्यादा से ज्यादा दो सीटें देने से टस से मस नहीं हुईं, विधानसभा में भी वहीं कुछ किया...उसी कांग्रेस से उन्हें बंगाल में हो रहे उपचुनावों में मदद मांगनी पड़ रही है. कांग्रेस ने भी दशकों का बदला ले लिया और नंदीग्राम और रेजीनगर सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिए. 

Loading Ad...

बंगाल उपचुनाव को लेकर ममता बनर्जी ने कांग्रेस से क्या मदद मांगी?

Loading Ad...

स्थानीय बंगाली अखबार संघवाद प्रतिदिन के अनुसार ममता की ओर से कांग्रेस से संपर्क भी किया गया और मदद मांगी गई. इस संबंध में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से भी बात की गई, लेकिन जवाब ठंडा ही मिला. इतना ही नहीं ममता की ओर से कांग्रेस के साथ बंगाल में एक वर्किंग गठबंधन के अलावा INDIA ब्लॉक को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन गेंद इस बार राहुल गांधी के पाले में है, जिसे किसी कीमत विपक्षी गठबंधन का नेता स्वीकार करने को ममता तैयार नहीं थीं.

नंदीग्राम के बदले रेजीनगर पर नहीं बन पाई बात?

Loading Ad...

इसी कड़ी में ममता ने पहली बार कांग्रेस के लिए कोई सीट छोड़ने की बात की है. उन्होंने नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने की भी पेशकश की और रेजीनगर जो कि एक मुस्लिम बहुल सीट है, वहां कांग्रेस से समर्थन की मांग की और अपने उम्मीदवार हटाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उनका मंसूबा उस वक्त फेल हो गया जब कांग्रेस की ओर से दोनों ही सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए गए. 

ममता और कांग्रेस की बंगाल में क्या लड़ाई है?

ममता बनर्जी का मुस्लिम वोट बैंक पर एकक्षत्र राज रहा है. उन्होंने इसके लिए कड़ी मेहनत भी की थी. सालों तर मुस्लिम वोटों को सहेज कर रखा. वो कथित तौर पर इसके लिए उस हद तक गईं जहां उनके हाथ से हिंदू वोट ही छिटक गए और ममता मुस्लिम बहुल जिलों तक ही सिमट कर रह गईं. इसी के कारण उन्हें उम्मीद थी कि अगर मुर्शिदाबाद की रेजीनगर, जहां से हुमायूं कबीर जीतने में कामयाब रहे, वहां पर हो रहे उपचुनाव में अगर कांग्रेस अपने उम्मीदवार ना उतारे तो जीत थोड़ी आसान हो सकती है. क्योंकि मुस्लिम वोटों का बिखराव कबीर की नई पार्टी, कांग्रेस और टीएमसी में होगा और फायदा बीजेपी को होगा. 

Loading Ad...

ममता को कमजोर और हाशिये पर जाता देख कांग्रेस क्यों खुश हो रही है?

हालांकि कांग्रेस का भी ऐसा ही मानना है. कांग्रेस का भी देशभर में मुस्लिम वोटबैंक के साथ लंबा इतिहास रहा है. ऐसे में उसको लगता है कि अगर टीएमसी रिप्लेस होती है बंगाल में तो उसके लिए चांस बन सकते हैं. मुसलमान बीजेपी को हराने वाले दल को वोट देते हैं. ऐसे में अगर टीएमसी कमजोर होगी, कांग्रेस मजबूत होगी तो मुस्लिम नेशनल लेवल पर बीजेपी को हराने के लिए नेचुरल विकल्प कांग्रेस को मानेंगे और उसे वोट देंगे.ऐसे में नेपथ्य में जा चुकी, खत्म होने के कगार पर खड़ी पार्टी को थोड़ी संजीवनी मिलेगी. आने वाले समय में सीधी फाइट कांग्रेस-बीजेपी के बीच हो सकती है.

BJP ने ममता का राज खत्म कर कांग्रेस को दी संजीवनी?

Loading Ad...

आपको बता दें कि इस साल भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त जीत के साथ उनका 15 साल का लगातार शासन खत्म हो गया, और उनके करीबी सहयोगी से कट्टर विरोधी बने सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन गए. तब से, 71 वर्षीय नेता ने कई बार अपने संगठन को फिर से खड़ा करने और साथ ही विपक्षी इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने की अपनी इच्छा दोहराई है, जिसमें भाजपा की विशाल ताकत के खिलाफ एकजुटता पर जोर दिया गया है.

दिलचस्प बात यह है कि अब उन्होंने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्टों और कांग्रेस, जिससे वे 1998 में अलग हो गई थीं, की ओर गठबंधन का हाथ बढ़ाया है. तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे के बाद, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अब पार्टी के असली नाम और उसके 'दो फूलों' वाले लोगो (जिसे उन्होंने खुद बनाया था) को बनाए रखने के लिए रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी तृणमूल गुट के साथ कड़े संघर्ष में उलझा हुआ है.

ममता ने अपने धुरविरोधी लेफ्ट-कांग्रेस से भी दोस्ती का बढ़ाया हाथ?

Loading Ad...

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों को पता है कि जमीनी स्तर पर पूर्व मुख्यमंत्री का कितना प्रभाव था, जिसके कारण 1977 से लगातार शासन कर रही लेफ्ट फ्रंट सरकार 2011 में गिर गई थी, लेकिन अब, धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और तस्करी के आरोपों ने तृणमूल कांग्रेस को घेर लिया है, जबकि सत्ता की होड़ में प्रतिद्वंद्वी गुट आपस में भिड़ रहे हैं.

हालांकि उन्होंने कभी-कभी सख्त रवैया भी दिखाया, जैसे पार्टी सदस्यों को सबके सामने डांटना, लीडरशिप कमेटियों को भंग करना और फिर से बनाना, लेकिन ज्यादातर उन्हें बेबस होकर यह देखते हुए देखा गया कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी संगठन का नियंत्रण संभाल रहे हैं.

पार्टी छोड़कर जाने वालों ने खुलकर और उनके गुट में अभी भी मौजूद लोगों ने दबी जबान से यह बात कही है. उन्होंने यह भी माना था कि प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी का शायद संगठन पर कुछ असर पड़ा है, और उन्होंने जमीनी स्तर से पार्टी को फिर से खड़ा करने का वादा किया.

Loading Ad...

अपनी लड़ाई को इंडिया ब्लॉक से जोड़ना चाह रहीं ममता?

साथ ही, ममता बनर्जी ने अपनी लड़ाई को व्यापक इंडिया ब्लॉक से जोड़ा है, 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस' (इंडिया) ब्लॉक का नामकरण करने का श्रेय उनके समर्थक उन्हें ही देते हैं.

हालांकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) और एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसी पार्टियों ने अब संबंध खत्म कर लिए हैं, लेकिन कुछ नेताओं का मानना ​​है कि ममता के व्यक्तिगत संबंध उन्हें 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए वापस आने के लिए मना सकते हैं. इस गठबंधन में शामिल कई लोग, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाले मंच का विरोध करते हैं, ममता बनर्जी में एक ऐसा विकल्प देखते हैं जो शायद पूरे देश में मजबूत पकड़ बनाने के बजाय क्षेत्रीय राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहेंगी.

Loading Ad...

ममता के सामने अस्तित्व का संकट!

लेकिन, कुछ जानकारों का कहना है कि 'इंडिया' गठबंधन को मजबूत करने पर ममता का जोर उनकी उस रणनीति को दिखाता है जिसके तहत वह खुद को विपक्ष की राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश करना चाहती हैं. इस बीच, पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव उनके गुट की ताकत और पार्टी में नई जान फूंकने या कोई राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पूरी करने की उनकी क्षमता की एक अहम परीक्षा होंगे.

बंगाल में कब हो रहे उपचुनाव?

Loading Ad...

पश्चिम बंगाल में रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होंगे. इन सीटों पर जीतने वाले हुमायूं कबीर और मौजूदा मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया था.

जहां कबीर ने नौदा सीट अपने पास रखने का फैसला किया, वहीं अधिकारी ने भवानीपुर का प्रतिनिधित्व करने का विकल्प चुना. भवानीपुर में उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती और कभी उनकी मेंटर रहीं ममता बनर्जी को 15,000 से ज्यादा वोटों से हराया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस के दूसरे नंबर पर रहे पवित्र कर के खिलाफ उनकी जीत का अंतर 10,000 वोटों से भी कम था.

ममता बनर्जी को हुमायुं कबीर ने क्या दिया न्योता?

Loading Ad...

कबीर ने ममता बनर्जी को रेजीनगर से चुनाव लड़ने का 'न्योता' दिया था और दावा किया था कि वह इस सीट से उनकी जीत पक्की कर सकते हैं. वहीं, रिताब्रता के नेतृत्व वाले गुट के नेताओं ने जोर देकर कहा कि अगर ममता खुद चुनाव लड़ती हैं तो वे नंदीग्राम में कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगे.

ये भी पढ़ें: बंगाल में बदल जाएगी दूर्गा पूजा की सूरत... DJ, शराब, मूर्ति, पंडाल और विसर्जन को लेकर CM सुवेंदु ने जारी की गाइडलाइंस

अपनी 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (एजेयूपी) का प्रतिनिधित्व करते हुए कबीर ने रेजीनगर सीट 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती और कुल वोटों का 51.62 प्रतिशत हासिल किया. नौदा में जीत का अंतर 28,000 वोटों से कम था, जहां एजेयूपी प्रमुख को कुल वोटों का लगभग 39 प्रतिशत ही मिला.

Loading Ad...

ये भी पढ़ें: बंगाल में बंद होंगे 200 से ज्यादा मदरसे! सुवेंदु सरकार ने भेजा नोटिस, सर्वे के बाद एक्शन 

मुस्लिम बहुल सीट है रेजीनगर, जिस पर कांग्रेस और टीएमसी की है नजर!

दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों सीटें मुर्शिदाबाद जिले में हैं, जहां मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का लगभग 70 प्रतिशत है. इसके बावजूद, भापजा दूसरे स्थान पर रही और तृणमूल तीसरे स्थान पर खिसक गई, जो इस बार दिखे ध्रुवीकरण को दर्शाता है.

Loading Ad...

यह भी पढ़ें

इस बदलाव के बीच, ममता के नेतृत्व वाला तृणमूल गुट अब पार्टी के चुनाव चिह्न और विपक्ष की एकता के लिए उनकी लड़ाई को बड़े 'इंडिया' गठबंधन से जोड़कर देख रहा है. उनका कहना है कि एक बार जब ममता अपनी पार्टी पर पूरी तरह नियंत्रण हासिल कर लेंगी, तो बीजेपी के दबदबे का मुकाबला करने के लिए विपक्ष की एकजुटता ज़रूरी होगी.

LIVE
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...