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जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा, पद से हटाने की महाभियोग प्रक्रिया थमी; घर में मिले थे जले हुए नोट, जानें पूरा मामला
जस्टिस यशवंत वर्मा ने कैशकांड के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया अब खत्म मानी जा रही है. दिल्ली आवास से बड़ी मात्रा में जला हुआ कैश मिलने के बाद मामला काफी विवादों में आया था.
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देश की न्यायपालिका से जुड़ा एक बड़ा मामला अब नए मोड़ पर पहुंच गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इस फैसले के साथ ही उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया भी अब खत्म मानी जा रही है. लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफा स्वीकार होते ही यह पूरी कार्रवाई स्वतः समाप्त हो जाएगी.
दिल्ली आवास से कैश मिलने पर शुरू हुआ विवाद
यह मामला उस वक्त सुर्खियों में आया था जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी. चौंकाने वाली बात यह थी कि इस कैश का कुछ हिस्सा जला हुआ भी था. जैसे ही यह खबर सामने आई, राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में हलचल तेज हो गई. मामले ने गंभीर रूप ले लिया और संसद तक पहुंच गया.
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15 मार्च की घटना बनी टर्निंग पॉइंट
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पूरा विवाद 15 मार्च 2024 की रात से शुरू हुआ, जब उनके आवास पर आग लगने की घटना हुई. आग बुझाने के दौरान स्टोर रूम से जले हुए नोट बरामद हुए. इस घटना के वीडियो भी सामने आए, जिससे मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया. उस समय जस्टिस वर्मा भोपाल में मौजूद थे. बाद में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया.
महाभियोग तक पहुंचा मामला
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मामले की गंभीरता को देखते हुए संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के कुल 152 सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था. इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया. हालांकि जस्टिस वर्मा ने इस समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 16 जनवरी को उनकी याचिका खारिज कर दी गई.
आरोपों पर जस्टिस वर्मा का पक्ष
जस्टिस वर्मा लगातार इन आरोपों से इनकार करते रहे. उनका कहना था कि जो नकदी बरामद हुई है, उसका उनसे या उनके परिवार से कोई संबंध नहीं है. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल ने उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की थी.
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बताते चलें कि अब उनके इस्तीफे के बाद महाभियोग प्रक्रिया रुक गई है, लेकिन इस पूरे मामले ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. फिलहाल सबकी नजर इस बात पर है कि आगे इस मामले में क्या नए तथ्य सामने आते हैं.