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10,000 फीट की ऊंचाई, दुश्मन की घुसपैठ, 527 शहीद... जानें कारगिल विजय की पूरी कहानी

साल 1999 में कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गई करीब दो महीने की इस जंग में भारत ने 527 वीर सपूत खोए, लेकिन टोलोलिंग और टाइगर हिल जैसे दुर्गम इलाकों में विजय पताका लहराई. कैप्टन विक्रम बत्रा, मनोज पांडे और योगेंद्र सिंह यादव जैसे जांबाजों की वीरता आज भी देश की रगों में जोश भर देती है. हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में उन शहीदों को याद किया जाता है, जिन्होंने देश की मिट्टी के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.

10,000 फीट की ऊंचाई, दुश्मन की घुसपैठ, 527 शहीद... जानें कारगिल विजय की पूरी कहानी
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26 जुलाई का दिन भारतीय इतिहास में सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक गर्व और बलिदान की कहानी है. 1999 का वो साल जब पाकिस्तान की नापाक साजिशें जम्मू-कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों पर अपना कब्जा जमाने निकली थीं. लेकिन भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए ना केवल उनके मंसूबों को नाकाम किया, बल्कि दुनिया को दिखा दिया कि भारत अपने एक-एक इंच जमीन के लिए आखिरी सांस तक लड़ सकता है. दो महीने तक चली इस लड़ाई में भारत ने अपने 527 बहादुर जवान खोए और तकरीबन 1363 जवान घायल हुए थे. लेकिन जवानों के जज़्बे के चलते जीत का झंडा टोलोलिंग, टाइगर हिल और द्रास की ऊंचाइयों पर फहराया.

पाकिस्तान का ऑपरेशन बद्र हुआ नाकाम 

कारगिल युद्ध पाकिस्तान की एक सोची-समझी साजिश थी, जिसे उन्होंने ‘ऑपरेशन बद्र’ नाम दिया. इसका मकसद था भारतीय नियंत्रण रेखा (LoC) के भीतर घुसपैठ कर वहां की रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा करना, ताकि श्रीनगर-लेह मार्ग को काटा जा सके और भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाया जा सके. पाकिस्तानी सेना ने आतंकियों की आड़ में अपने सैनिकों को भेजा. मई 1999 की शुरुआत में भारत को इस घुसपैठ का पता चला और भारतीय सेना ने तत्काल मोर्चा संभाल लिया.

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जब वीरता ने लिखी गई कारगिल की गाथा

10 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित, बटालिक, कारगिल, लेह और बाल्टिस्तान के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण कारगिल युद्ध का केंद्र बिंदु था. बर्फ से ढकी दुर्गम पहाड़ियों में लड़ी गई यह लड़ाई सिर्फ सैन्य ताकत की नहीं, बल्कि धैर्य, साहस और बलिदान की परीक्षा थी. कैप्टन विक्रम बत्रा, जिनके 'ये दिल मांगे मोर' ने पूरे देश को हौसला दिया, से लेकर कैप्टन मनोज पांडे, जिन्होंने अपने आखिरी सांस तक दुश्मन से लोहा लिया. ऐसे कई नाम हैं, जो भारत के लिए हमेशा अमर रहेंगे. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और नायक दिगेंद्र कुमार जैसे जवानों ने असंभव से लगने वाले मिशन को मुमकिन बनाया और दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए.

वायुसेना ने दिखाई अपनी ताकत

जैसे ही पाकिस्तान की चाल सामने आई, भारतीय वायुसेना को भी मोर्चे पर उतारा गया. ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ के तहत भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों को चुन-चुनकर निशाना बनाया. यह पहली बार था जब भारत ने अपनी वायुसेना को इतने ऊंचे युद्ध क्षेत्र में सक्रिय रूप से शामिल किया. मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों ने ऊंची चोटियों पर बंकरों को नष्ट कर पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

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कैप्टन सौरभ कालिया की कुर्बानी और द्रास का दर्द

इस युद्ध की एक बेहद दर्दनाक कहानी कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों की है. कैप्टन सौरभ अपनी टुकड़ी के पांच अन्य सैनिकों के साथ गश्त पर थे, जब उन्हें पाकिस्तानी सेना ने घेर लिया और बंदी बना लिया. पकड़े जाने के बाद, इन भारतीय सैनिकों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों की पूरी तरह अवहेलना करते हुए, क्रूरता के साथ प्रताड़ित किया गया और अंततः उनकी हत्या कर दी गई. बाद में जब उनके शव भारत को सौंपे गए, तब ऑटोप्सी रिपोर्ट ने इस अमानवीय व्यवहार की पुष्टि की, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया. इसी दौरान, 9 मई को पाकिस्तान ने भारी गोलाबारी शुरू की, जो केवल एक कवर फायर था, ताकि पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादी भारतीय क्षेत्र में आसानी से घुसपैठ कर सकें. द्रास, मुश्कोह और काकसर जैसे दुर्गम सेक्टरों में बड़ी संख्या में घुसपैठ की गई, जो आगे चलकर कारगिल युद्ध का कारण बनी.

क्यों खास है 26 जुलाई?

26 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक प्रतीक है भारत की असाधारण सैन्य शक्ति, वीरता और राष्ट्रभक्ति का. इस दिन को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है. शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए द्रास स्थित ‘वार मेमोरियल’ पर विशेष समारोह होते हैं, जहां उनके नाम सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं. आज की पीढ़ी को कारगिल विजय दिवस सिर्फ याद नहीं करना चाहिए, बल्कि इससे प्रेरणा लेकर देश की सेवा का भाव जागृत करना चाहिए.

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आज भी जिंदा हैं वो किस्से

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हर साल जब देश कारगिल विजय दिवस मनाता है, तो उन हजारों परिवारों की आंखों में अपने खोए हुए सपूत की तस्वीरें तैर जाती हैं. किसी मां ने अपना इकलौता बेटा खोया, किसी पत्नी ने अपना सुहाग. लेकिन फिर भी वे गर्व से कहती हैं, मेरा बेटा देश के लिए शहीद हुआ. यही बलिदान भारत को एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक भावना बनाता है.

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