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भारत विरोधियों पर मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक, FCRA पर क्यों तिलमिलाया लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम, हुआ बड़ा खुलासा!

भारत विरोधी NGO कल्चर पर प्रहार के उद्देश्य से लाए गए FCRA संशोधन बिल ने मिशनरियों और सो-कॉल्ड लिबरल इकोसिस्टम से खलबली मच गई है. इस संबंध में वकील अश्विनी उपाध्याय ने बड़ा खुलासा किया है.

FCRA Amendment Bill Introduced/ Ashwini Upadhyay
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मोदी सरकार द्वारा विदेशी चंदे से चलने वाले NGO और संगठनों की गैरकानूनी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए लाए गए FCRA कानून पर बवाल मचा हुआ है. वहीं विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों पर बुधवार को तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं. विपक्ष ने इस विधेयक को रोकने की बात कही, वहीं बढ़ती चिंताओं के बीच BJP ने इस पर पुनर्विचार करने के संकेत दिए. वहीं इस कानून की जरूरत पर विस्तार से बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कई बड़े खुलासे किए हैं.

आपको बता दें कि FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) वो कानून है जिसे लाने का काम कांग्रेस ने किया था, मोदी सरकार इसमें संशोधन कर रही है. कहा जा रहा है कि बीते सालों में FCRA कानून के तहत सैकड़ों NGOs बंद हुए और आने वाले दिनों में कई और पर ताले लटके हैं. इसी कारण तो विपक्ष सहिए पूरे खेमे में खलबली मची हुई है. ऐसे में ये जानना जरूरी है कि आखिर यह कानून क्या है? और इसमें क्या बदलाव हो रहे हैं और कांग्रेस इससे क्यों परेशान है?

कांग्रेस राज में क्यों लाया गया था FCRA कानून?

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वकील अश्विनी उपाध्याय ने इस संबंध में बात करते हुए कहा कि FCRA कानून 2010 में कांग्रेस सरकार द्वारा विशेष रूप से भारत में भारत-विरोधियों को फंडिंग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया था. उन्होंने आगे कहा कि यह उन नेताओं, अभिनेताओं, लेखकों, पत्रकारों, कलमकारों, यूट्यूबर्स और बुद्धिजीवियों के एनजीओ को पैसा पहुंचाने का जरिया था जो भारत के खिलाफ लेख लिखते हैं और देश को अस्थिर करना चाहते हैं. 

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‘आजादी के बाद जानबूझकर बनाए गए देश विरोधी कानून’

उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह अंग्रेजों ने भारत को लूटने और बांटने के लिए कानून बनाए थे, ठीक उसी तरह 1950 के बाद भारत में लगभग 50 ऐसे देश विरोधी कानून बनाए गए जो आतंकवादियों, नक्सलियों, जिहादियों, अलगाववादियों और जातिवादियों को फायदा पहुंचाते हैं. इतना ही नहीं FCRA का इस्तेमाल माओवादियों, कट्टरपंथियों और लव जिहाद व धर्मांतरण जैसे कार्यों की फंडिंग के लिए किया जा रहा था.

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‘फंडिंग के जरिए भारत को अस्थिर करने का खेल’

 वहीं देश को अस्थिर करने के खेल पर बड़ा खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को बर्बाद करने के लिए सालाना लगभग 500 करोड़ की फंडिंग होती है, जिसमें से 50% पैसा FCRA के जरिए और बाकी 50% हवाला के जरिए आता है. उन्होंने दावा किया कि जब भी समाज में कोई जाति का जहर घोलता है, दलित बनाम सवर्ण या मराठी बनाम गुजराती करता है, तो उसके पीछे अक्सर विदेशी फंडिंग या राजनैतिक पार्टियों का पैसा होता है.

हिंदुओं के धर्मांतरण को लेकर क्या है मिशनरियों का 'जोशुआ प्रोजेक्ट'?

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वकील अश्विनी उपाध्याय ने 'जोशुआ प्रोजेक्ट' का हवाला करते हुए कहा कि यूरोप और अमेरिका से मिशनरियों को आने वाला पैसा इसी FCRA के जरिए आता है, जिससे कथित तौर पर प्रतिदिन हजारों हिंदुओं का धर्मांतरण कराया जाता है. वहीं, खाड़ी देशों और पाकिस्तान से आने वाला पैसा अक्सर 'हवाला' के जरिए लव जिहाद और अन्य कट्टरपंथी गतिविधियों में इस्तेमाल होता है. उन्होंने कृषि कानूनों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में भी विदेशी फंडिंग की जांच की आवश्यकता पर जोर दिया.

भारत में क्या है NGO कल्चर?

वहीं उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने 2014 के बाद इस कानून में धीरे-धीरे बदलाव किए और अब अंतिम प्रहार किया है, लेकिन वे इसके पूर्ण खात्मे के पक्षधर हैं. उनका कहना है कि "न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी"—इस कानून को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए क्योंकि भारत विरोधी लोग किसी न किसी तरह से लूपहोल्स ढूंढ ही लेते हैं. उन्होंने एनजीओ कल्चर पर भी प्रहार किया और कहा कि ज्यादातर एनजीओ नेताओं के रिश्तेदारों (पत्नी, साली, साले, मौसा-मौसी) के नाम पर चलते हैं ताकि पैसा सफेद किया जा सके. उनका सुझाव है कि यदि कोई अच्छा काम करना चाहता है, तो वह सीधे अपने व्यक्तिगत खाते में पैसा ले और आयकर (ITR) भरे, एनजीओ की आड़ में विदेशी चंदा लेने की क्या जरूरत है?

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‘भारत में कई लाइलाज बीमारी, सबका इलाज संभव!’

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चर्चा के अंत में अश्विनी उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि भारत की कोई भी समस्या लाइलाज नहीं है, बस कानून और सिस्टम में सुधार की जरूरत है. उन्होंने कहा कि 225 अंग्रेजी कानून आज भी चल रहे हैं और हमारा पुलिस एक्ट (1861) व जुडिशियल सिस्टम अभी भी गुलामी की मानसिकता पर आधारित है, जिससे थाना, तहसील और कचहरी भ्रष्टाचार के अड्डे बने हुए हैं. उनका मानना है कि यदि कानून मंत्रालय मात्र 5 साल ईमानदारी से काम कर दे और इन घटिया कानूनों को बदल दे, तो भारत में 'राम राज्य' आ जाएगा.

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