जिस पर देशकरता है भरोसा

माखन-मिश्री नहीं... इस मंदिर में कान्हा को लगता है 'मिट्टी के पेड़े' का अनोखा भोग, जानें क्या है मान्यता

आज पूरे देश में जन्माष्टमी धूधाम से मनाई जा रही है. मथुरा के ब्रह्मांड बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी पर कान्हा को माखन-मिश्री नहीं, बल्कि मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है. यह परंपरा श्रीकृष्ण की मिट्टी खाने वाली बाल लीला से जुड़ी है.

माखन-मिश्री नहीं... इस मंदिर में कान्हा को लगता है 'मिट्टी के पेड़े' का अनोखा भोग, जानें क्या है मान्यता
Representative Photo Via IANS

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव आज पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. लेकिन ब्रज की गलियों और मंदिरों में इसकी रौनक पहले से ही दिखाई देने लगती है. मथुरा और आसपास के इलाकों में कान्हा की बाल लीलाओं से जुड़े कई ऐसे स्थल हैं, जहां आज भी सदियों पुरानी परंपराएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं. इन्हीं में से एक है महावन स्थित ब्रह्मांड घाट का ब्रह्मांड बिहारी मंदिर.

इस मंदिर की सबसे खास बात यहां भगवान श्रीकृष्ण को लगाया जाने वाला भोग है. आमतौर पर कृष्ण मंदिरों में कान्हा को माखन-मिश्री, दूध-दही या पेड़े का भोग लगाया जाता है, लेकिन ब्रह्मांड बिहारी मंदिर में मिट्टी से बने पेड़ों का भोग लगाने की परंपरा है. जन्माष्टमी के मौके पर इस अनोखी परंपरा को देखने और प्रसाद लेने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

मिट्टी खाने की बाल लीला से जुड़ी है मान्यता

ब्रह्मांड बिहारी मंदिर की परंपरा सीधे भगवान श्रीकृष्ण की एक प्रसिद्ध बाल लीला से जुड़ी मानी जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बालकृष्ण ने इसी स्थान पर गोप-बालकों के साथ खेलते हुए मिट्टी खा ली थी. जब बलराम ने इसकी शिकायत माता यशोदा से की तो मैया ने कान्हा से मुंह खोलने को कहा. कहा जाता है कि जैसे ही यशोदा ने श्रीकृष्ण के मुख के भीतर देखा, वह हैरान रह गईं. उन्हें कान्हा के मुंह में केवल मिट्टी नहीं, बल्कि अनगिनत ब्रह्मांडों के साथ ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दर्शन हुए. कुछ पल के लिए मैया को समझ नहीं आया कि उनकी आंखों के सामने आखिर क्या हो रहा है. फिर वही नटखट बालक उनके सामने था. इसी लीला की स्मृति में इस स्थान को ब्रह्मांड घाट और यहां विराजमान भगवान को ब्रह्मांड बिहारी कहा जाता है.

यह भी पढ़े: इस बार जन्माष्टमी बेहद खास! बन रहा द्वापर युग जैसा शुभ संयोग, कालकाजी मंदिर के पीठाधीश्वर ने बताई खास बात

प्रसाद के रूप में साथ ले जाते हैं मिट्टी के पेड़े

मंदिर में मिट्टी के पेड़े चढ़ाने की परंपरा श्रद्धालुओं के लिए भी खास आकर्षण है. धार्मिक आस्था के चलते भक्त इन पेड़ों को भगवान का प्रसाद मानकर अपने साथ ले जाते हैं और परिवार तथा परिचितों में बांटते हैं. मंदिर के पुजारी राजू के अनुसार, ब्रह्मांड घाट की पहचान ही कान्हा की इसी बाल लीला से जुड़ी हुई है. यहां आने वाले श्रद्धालु दर्शन के साथ मिट्टी के पेड़े का प्रसाद भी लेना चाहते हैं.

यह भी पढ़े: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों फोड़ी जाती है दही हांडी? जानिए इस परंपरा के पीछे की कहानी

यह भी पढ़ें

बताते चलें कि ब्रज में भगवान कृष्ण की लीलाओं से जुड़े कई धार्मिक स्थल हैं, लेकिन मिट्टी के पेड़ों के इस अनोखे भोग के कारण ब्रह्मांड बिहारी मंदिर की अपनी अलग पहचान है. जन्माष्टमी के अवसर पर यहां श्रद्धा और उत्साह का माहौल देखने को मिलता है.

टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
अधिक
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें