Almora: एक रात में बना मां स्याही देवी मंदिर, दिन में तीन बार बदलता है स्वरूप!
इस मंदिर को लेकर कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण केवल एक रात में हुआ था. लोककथाओं के अनुसार, स्थानीय लोगों ने मंदिर के लिए ईंटें तैयार की थीं. तेज बारिश के बावजूद वे ईंटें अगली सुबह पकी हुई मिलीं. मंदिर को जोड़ने में चूने या सीमेंट की जगह बेल और गुड़ के मिश्रण का प्रयोग हुआ, जो आज भी लोगों को अचंभित करता है. स्याही देवी को आसपास के 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है और उत्तराखंड के अनेक परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं.
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उत्तराखंड की मनमोहक वादियों में देवी-देवताओं का वास मिलता है. ऐसा ही अल्मोड़ा जिले में शीतलाखेत के पास प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां स्याही देवी मंदिर स्थित है. शांत वातावरण और पहाड़ों के बीच स्थित मंदिर एक दिन में तैयार किया गया था.
शांत वातावरण और पहाड़ों के बीच बसी मां स्याही देवी मंदिर
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में माता की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है. इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासनकाल में हुआ था और इसे अल्मोड़ा के राजाओं की कुलदेवी माना जाता है.
मुख्यमंत्री धामी ने श्रद्धालुओं से की इस मंदिर में आने की अपील
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को मंदिर के लिए खास पोस्ट की. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "जनपद अल्मोड़ा के शीतलाखेत क्षेत्र में स्थित मां स्याही देवी मंदिर, आदिशक्ति मां भगवती को समर्पित है. इस पावन मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासनकाल में किया गया था. रमणीय पर्वतीय वातावरण के बीच माँ का दर्शन आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम एहसास कराता है. अल्मोड़ा जनपद आगमन पर आप भी इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें."
कैसे हुआ मंदिर का निर्माण
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण केवल एक रात में हुआ था. लोककथाओं के अनुसार, स्थानीय लोगों ने मंदिर के लिए ईंटें तैयार की थीं. तेज बारिश के बावजूद वे ईंटें अगली सुबह पकी हुई मिलीं. मंदिर को जोड़ने में चूने या सीमेंट की जगह बेल और गुड़ के मिश्रण का प्रयोग हुआ, जो आज भी लोगों को अचंभित करता है. स्याही देवी को आसपास के 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है और उत्तराखंड के अनेक परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं.
यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर के बनने से पहले, स्याही देवी की असली मूर्ति लगभग आधा किलोमीटर दूर एक दूसरी पहाड़ी पर स्थापित थी. स्याही देवी को अल्मोड़ा के राजाओं की कुल देवी माना जाता था. इसलिए, राजाओं ने इस जगह पर अपनी देवी के लिए एक नया और बड़ा मंदिर बनवाया.
गुरु गोरखनाथ के वंशज करते है मंदिर की देखभाल
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जब मंदिर बन गया, तो रोज की पूजा-पाठ और मंदिर की देखभाल के लिए नेपाल से गुरु गोरखनाथ के वंशजों को यहां लाया गया. आज भी उसी वंश के लोग इस मंदिर की पूजा और व्यवस्था संभालते हैं. यह भी कहा जाता है कि कत्यूरी राजा बहुत अच्छे कारीगर और शिल्पकार थे, लेकिन वे अपना सारा निर्माण काम सिर्फ रात में ही करते थे. इसी वजह से कहा जाता है कि यह मंदिर भी सिर्फ एक ही रात में बना था.