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अब खत्म होगा होर्मुज स्ट्रेट का संकट! अमेरिका-ईरान के बीच डील पक्की, शांति समझौते के MoU पर दोनों देशों ने किए हस्ताक्षर

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव कम होने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियान ने शांति समझौते के एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. अधिकारियों के मुताबिक, यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा और व्यापार क्षेत्र को राहत मिलने की उम्मीद है.

अब खत्म होगा होर्मुज स्ट्रेट का संकट! अमेरिका-ईरान के बीच डील पक्की, शांति समझौते के MoU पर दोनों देशों ने किए हस्ताक्षर
Image Source: Screengrab (X/@WhiteHouse)
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दुनिया की नजरें पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव पर टिकी हुई थीं. दोनों देशों के रिश्तों में लगातार बढ़ रही कड़वाहट ने वैश्विक राजनीति, तेल बाजार और समुद्री व्यापार को प्रभावित किया था. लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान (Masoud Pezeshkian) ने दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए शांति समझौते के एमओयू (MoU)पर औपचारिक हस्ताक्षर कर दिए हैं.

अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के अनुसार, बुधवार को दोनों नेताओं ने इस समझौता ज्ञापन पर साइन किए. इसके साथ ही यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू भी हो गया है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच का समझौता नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.

होर्मुज स्ट्रेट खुलने से मिलेगी बड़ी राहत

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा वैश्विक ऊर्जा बाजार को मिल सकता है. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय से तनाव का केंद्र बना हुआ था. यह मार्ग खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से की आवाजाही का मुख्य रास्ता है. जानकारों का मानना है कि यदि समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खुला रहता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने लगेगी. इससे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है और ऊर्जा संकट की आशंकाएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती हैं. यही वजह है कि दुनिया भर के बाजार इस समझौते को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं.

पहले डिजिटल साइन, अब औपचारिक मंजूरी

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जानकारी के मुताबिक, इससे पहले रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद बुधवार को राष्ट्रपति स्तर पर इसे औपचारिक मंजूरी दी गई. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इस कदम से लगभग चार महीने से चला आ रहा तनावपूर्ण संघर्ष समाप्त होने की दिशा में निर्णायक प्रगति हुई है. हालांकि दोनों पक्ष अभी भी आगे की वार्ताओं के लिए तैयार हैं ताकि समझौते को और मजबूत बनाया जा सके.

जिनेवा वार्ता पर बनी हुई है नजर

दिलचस्प बात यह है कि शुक्रवार को जिनेवा में प्रस्तावित वार्ता कार्यक्रम अभी भी एजेंडे में शामिल है. हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस बैठक का उद्देश्य नए हस्ताक्षर करना नहीं होगा. चूंकि दस्तावेज पर पहले ही डिजिटल और औपचारिक हस्ताक्षर हो चुके हैं, इसलिए अब चर्चा का केंद्र समझौते के क्रियान्वयन और आगे की रणनीति होगा. फिलहाल यह तय नहीं है कि बैठक अंतिम रूप से आयोजित होगी या नहीं. इसके बारे में फैसला अगले कुछ घंटों में लिया जा सकता है.

तेल निर्यात और प्रतिबंधों में राहत की उम्मीद

समझौते का एक अहम पहलू ईरान के तेल निर्यात से जुड़ा हुआ है. ईरान लंबे समय से चाहता रहा है कि उसे अपने तेल की बिक्री बिना परिवहन और बीमा संबंधी प्रतिबंधों के करने की अनुमति मिले. साथ ही तेल बिक्री से होने वाली आय तक उसकी सीधी पहुंच भी सुनिश्चित हो. ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका ने फ्रीज की गई संपत्तियों तक पहुंच से जुड़ी बाधाओं को हटाने की प्रतिबद्धता दिखाई है. यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो ईरानी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिल सकता है और वैश्विक तेल आपूर्ति भी मजबूत हो सकती है.

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अगले 60 दिन होंगे बेहद अहम

समझौते के बावजूद दोनों देशों के सामने कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं. सहमति के अनुसार हस्ताक्षर के बाद 60 दिनों की विशेष बातचीत अवधि शुरू होगी. इस दौरान दोनों पक्ष ऐसे किसी भी राजनीतिक, आर्थिक या सैन्य कदम से बचेंगे, जिससे आपसी विश्वास प्रभावित हो.

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बताते चलें कि यही अवधि तय करेगी कि मौजूदा समझौता भविष्य में एक स्थायी और व्यापक समझौते का रूप ले पाता है या नहीं. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत बनकर उभरा है. आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह पहल इतिहास में शांति की मिसाल बनेगी या फिर केवल एक शुरुआती प्रयास साबित होगी.

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