ट्रंप को झटका, भारतीयों को बड़ी राहत! US कोर्ट ने H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर शुल्क लगाने के फैसले को किया रद्द
अमेरिकी कोर्ट ने भारतीयों को बड़ी राहत देते हुए ट्रंप द्वारा लगाए गए 1 लाख डॉलर H-1B वीजा शुल्क के फैसले को ही रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को नया टैक्स लगाने का अधिकार नहीं है.
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा है. H-1B वीजा को लेकर बोस्टन की एक संघीय अदालत के फैसले से भारतीय छात्रों और पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है. दरअसल अदालत ने H-1B आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना को ना सिर्फ गैरकानूनी करार दिया बल्कि इसे रद्द भी कर दिया.
आपको बता दें कि ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1 बी वीजा के लिए 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगाने के फैसले को रद्द करने वाले एक संघीय न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले का मुख्य मुद्दा इमिग्रेशन नीति नहीं, बल्कि यह था कि क्या राष्ट्रपति प्रशासन ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना नया टैक्स लगा दिया था.
42 पन्नों के अपने फैसले में अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन ने कहा कि एच-1 बी नीति वास्तव में एक अनधिकृत टैक्स थी और यह राष्ट्रपति को कानून द्वारा दी गई शक्तियों से बाहर थी. उन्होंने लिखा, "अदालत का मानना है कि यह नीति एच-1 बी याचिकाओं पर टैक्स लगाती है, जबकि इसके लिए कांग्रेस ने कोई अधिकार नहीं दिया है. एच-1 बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लगाने की अनुमति किसी कानून में नहीं है."
डेमोक्रेटिक पार्टी ने जोर-शोर से उठाया था H1B वीजा शुल्क का मुद्दा
आपको बता दें कि इस मामले को डेमोक्रेटिक पार्टी ने जोर-शोर से उठाया था. इसके बाद 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में मुकदमा दर्ज कराया था. ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क विदेशी नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की राष्ट्रपति की शक्ति का हिस्सा है लेकिन न्यायाधीश ने इस दलील को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि जिन इमिग्रेशन कानूनों का हवाला दिया गया है, वे राष्ट्रपति को नया टैक्स लगाने का अधिकार नहीं देते.
कोर्ट ने ट्रंप के फैसले को ही बता दिया असंवैधानिक
उन्होंने लिखा, "इन कानूनों को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वे कांग्रेस की विशेष टैक्स लगाने की शक्ति राष्ट्रपति को सौंपते हों." फैसले में बार-बार कहा गया कि राष्ट्रपति के पास इमिग्रेशन मामलों में व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन उनकी भी संवैधानिक सीमाएं हैं. न्यायाधीश ने कहा, "कार्यपालिका (एग्जीक्यूटिव) के पास विदेशी नागरिकों के प्रवेश और निष्कासन को लेकर व्यापक अधिकार हैं, लेकिन ये अधिकार असीमित नहीं हैं."
उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियां संविधान की सीमाओं या कांग्रेस द्वारा दिए गए अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकतीं. सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि 1 लाख डॉलर की राशि टैक्स नहीं बल्कि इमिग्रेशन प्रतिबंध का हिस्सा है. इस पर न्यायाधीश ने साफ कहा, "टैक्स को प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता."
फैसले में अमेरिकी संविधान का भी उल्लेख किया गया, जिसमें टैक्स लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस को दिया गया है. न्यायाधीश ने कहा कि कांग्रेस कुछ मामलों में यह अधिकार सरकारी एजेंसियों को दे सकती है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट कानूनी अनुमति होना जरूरी है.
ट्रंप के पास नहीं था नया टैक्स बानाने का अधिकार!
उन्होंने पाया कि जिन इमिग्रेशन कानूनों का हवाला दिया गया, वे राष्ट्रपति को नियम, प्रतिबंध और शर्तें लगाने की अनुमति तो देते हैं, लेकिन नया टैक्स बनाने की अनुमति नहीं देते. न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस नीति को लागू करने वाली सरकारी एजेंसियां अपने कानूनी अधिकारों से आगे बढ़ गई थीं. फैसले में कहा गया, "प्रतिवादियों (सरकारी एजेंसियों) के पास एच-1 बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लगाने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है."
संवैधानिक मुद्दों के अलावा, अदालत ने यह भी पाया कि एजेंसियों ने जरूरी नियम बनाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया और न ही यह ठीक से समझाया कि नियोक्ताओं पर इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत क्यों डाली जा रही है.
अंत में अदालत ने इस नीति को अवैध घोषित करते हुए पूरे देश में इसे रद्द कर दिया. न्यायाधीश ने आदेश दिया, "इस घोषणा को लागू करने वाली नीति को अवैध घोषित किया जाता है और इसे पूरी तरह रद्द किया जाता है."
H-1B वीजा के नए शुल्क से भारतीयों को होती सबसे ज्यादा परेशानी!
आपको बता दें कि यदि यह नीति लागू होती तो H-1B वीजा प्राप्त करने की लागत में भारी इजाफा हो जाता. H-1B वीजा का उपयोग अमेरिकी कंपनियां दूसरे देशों के स्किल्ड प्रोफेशनल्स, खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर के प्रोफेशनल्स को नियुक्त करने के लिए करती हैं.
पहले क्या था H-1B वीजा को लेकर नियम?
मालूम हो कि ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा शुल्क बढ़ाने से पहले सामान्य तौर पर एक नए H-1B आवेदन पर कुल सरकारी शुल्क करीब $2,000 से $4,000 के बीच आता था. हालांकि ये कंपनी टू कंपनी, एम्प्लॉयर टू एम्प्लॉयर, सेक्टर टू सेक्टर अलग हो सकता है.
क्या है H-1B वीजा?
इसी वजह से प्रस्तावित $100,000 शुल्क मौजूदा आवेदन शुल्क की तुलना में लगभग 25 से 50 गुना अधिक था और इससे भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर बड़ा असर पड़ने की आशंका जताई गई थी.
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H-1B वीजा से संबंधित अधिकांश शुल्क आमतौर पर स्पॉन्सर करने वाली कंपनी (Employer) द्वारा भुगतान किए जाते हैं, न कि कर्मचारी द्वारा. चुकि H-1B वीजा प्रोग्राम का सबसे अधिक लाभ इंडियन IT प्रोफेशनल्स और अमेरिका में काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों को मिलता है, इसलिए ट्रंप के इस फैसले को भारतीयों को लिए बड़ा झटका माना जा रहा था. अब कोर्ट द्वारा इसे गैर कानूनी करार और रद्द किए जाने के बाद ये बड़ी राहत भरी ख़बर मानी जा रही है.