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जंग के बीच राहत भरी खबर... ईरान 7 साल बाद भारत को भेज रहा कच्चे तेल की बड़ी खेप

पश्चिम एशिया संकट के बीच ईरान का तेल लेकर ‘पिंग शुन’ टैंकर वाडीनार बंदरगाह पहुंच रहा है, जिसमें करीब 6 लाख बैरल कच्चा तेल है. अमेरिका ने हाल ही में ईरानी तेल पर एक महीने की छूट दी है, जिससे भारत को राहत मिल सकती है.

जंग के बीच राहत भरी खबर... ईरान 7 साल बाद भारत को भेज रहा कच्चे तेल की बड़ी खेप
Image Source: Canva
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मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है. करीब सात साल के लंबे अंतराल के बाद ईरान का कच्चा तेल लेकर एक टैंकर भारत की ओर बढ़ रहा है. यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनियाभर में तेल की कीमतें दबाव में हैं और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

ईरानी तेल से भरा टैंकर भारत की ओर

वेसल ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक ‘पिंग शुन’ नामक तेल टैंकर वाडीनार बंदरगाह की ओर बढ़ रहा है. इस टैंकर में लगभग 6 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल लदा है, जिसे 4 मार्च के आसपास खर्ग द्वीप से लोड किया गया था. इसके 4 अप्रैल तक भारत पहुंचने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि किस भारतीय रिफाइनरी द्वारा इस तेल का उपयोग किया जाएगा.

अमेरिकी छूट बना बड़ी वजह

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिका द्वारा हाल ही में दी गई अस्थायी छूट भी है. 21 मार्च को अमेरिका ने एक महीने के लिए ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है. यह छूट खास तौर पर उन खेपों पर लागू होती है जो पहले से टैंकरों में लदी हुई हैं. इसका मकसद वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाना और बढ़ती कीमतों को काबू में रखना है.

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भुगतान और प्रतिबंध बड़ी चुनौती

जानकारों का मानना है कि यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है. कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म क्लेपर के विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार, भारत-ईरान तेल व्यापार फिर से पटरी पर लौटता दिख रहा है. यह डिलीवरी ऐसे समय में हो रही है, जब भारतीय रिफाइनरियों के पास भंडार घट रहा है और उन्हें अतिरिक्त आपूर्ति की जरूरत है. हालांकि इस संभावित व्यापार के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं. 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने ईरान से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया था. सबसे बड़ी समस्या भुगतान प्रणाली को लेकर है, क्योंकि ईरान अभी भी अंतरराष्ट्रीय तीव्र नेटवर्क से बाहर है. पहले यूरो के माध्यम से भुगतान किया जाता था, लेकिन प्रतिबंधों के बाद यह व्यवस्था भी बंद हो गई.

भारत को मीलगा नया मौक़ा

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ईरानी तेल पूरी तरह बाजार से गायब नहीं हुआ है. इसका बड़ा हिस्सा लगातार चीन को निर्यात होता रहा है. ऐसे में अमेरिकी छूट से सप्लाई में अचानक उछाल तो नहीं आएगा, लेकिन भारत जैसे देशों को खरीद का नया मौका जरूर मिलेगा.

हॉर्मुज जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व

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इस पूरे घटनाक्रम में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की भूमिका भी बेहद अहम है. दुनिया के करीब 20% तेल और गैस का परिवहन इसी मार्ग से होता है. मौजूदा युद्ध के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है. भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88% तेल आयात करता है, ऐसे में हर अतिरिक्त बैरल की अहमियत बढ़ जाती है.

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बताते चलें कि अगर इतिहास पर नजर डालें तो 2016 में प्रतिबंध हटने के बाद भारत ने ईरान से तेल आयात तेजी से बढ़ाया था और वह देश का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया था. लेकिन 2019 में प्रतिबंधों की वापसी के बाद यह व्यापार पूरी तरह ठप हो गया. अब एक बार फिर हालात बदलते नजर आ रहे हैं और आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस मौके का कितना फायदा उठा पाता है.

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