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'ग्लोबल साउथ की आवाज बनेगा भारत...', दिल्ली में हो रहे BRICS समिट का अमेरिका ने भी माना लोहा, क्या बोले एक्सपर्ट्स?
दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर अमेरिकियों की पैनी नजर है. अखबारों ने इसे भारत के लिए वैश्विक स्थिरता की स्थापना, विश्वास बहाली और ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का बड़ा मौका माना है.
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भारत की मेजबानी में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नज़र है. BRICS की स्थापना के 20 साल हो चुके हैं और भारत इसका संस्थापक सदस्य है. भारत ने ना सिर्फ इस समूह को मजबूती दी है बल्कि इसके जरिए ग्लोबल साउथ की भी आवाज उठाई है. ऐसे में देखें तो ब्रिक्स के जरिए भारत ना सिर्फ पड़ोसी बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन को मजबूती देना का मौका है. यही कुछ अब अमेरिकी एक्सपर्ट्स भी मान रहे हैं. अमेरिकी मीडिया की भी ब्रिक्स 2026 पर नज़र है.
इसी बीच अमेरिकी और दक्षिण एशिया मामलों के अमेरिकी विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने 18वें ब्रिक्स सम्मेलन को भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व को फिर से स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर करार दिया है. उन्होंने कहा कि ग्लोबल इकोनॉमी और वर्ल्ड ऑर्डर में पैदा सीमा विवाद, ट्रेड टैरिफ, जंग और मंदी की वजह से पैदा हुई अनिश्चितता के बीच हो रहा यह आयोजन विकासशील देशों को एक नया विकल्प देने का मंच बना है.
अमेरिका ने भी माना BRICS का लोहा
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हालांकि उन्होंने माना कि खाड़ी जंग और अमेरिका विरोधी समूहों के बीच सामंजस्य स्थापित कर जॉइंट डिक्लेरेशन पर आम सहमति बनाना और उस पर हस्ताक्षर करवाना भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती होगी.
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कुगेलमैन ने आगे कहा कि जब मौजूदा व्यवस्था के प्रति (UN, WTO, IMF) और ग्लोबल सुपर पावर वाले सिस्टम में, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ में असंतोष बढ़ रहा है, तब ब्रिक्स नया योगदान दे सकता है. उन्होंने आगे कहा कि ये सम्मेलन भारत को अपने वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ अपने प्रयासों को दोगुना करने का सही मौका देता है, जो भारतीय विदेश नीति की पहली प्राथमिकताएं हैं.
अमेरिकी मीडिया की नजर में ब्रिक्स
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वहीं अमेरिका के प्रमुख अखबारों ने नई दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को बदलते वैश्विक हालात की झलक के तौर पर देखा है. ये हालात तनावपूर्ण गठबंधनों, क्षेत्रीय युद्धों और वॉशिंगटन व बीजिंग के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से तय हो रहे हैं.
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने एक खबर में कहा कि इस शिखर सम्मेलन में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग में से कौन विकासशील दुनिया की अधिक प्रभावशाली आवाज बनकर उभरेगा. चीन ब्रिक्स को अमेरिकी ताकत को चुनौती देने के एक प्लेटफॉर्म के तौर पर देखता है. वहीं, भारत चाहता है कि यह ग्रुप इतना बड़ा और खुला रहे कि देशों को अलग-अलग गुटों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न होना पड़े.
अखबार ने कहा कि युद्ध, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, अमेरिकी टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चिंताएं देशों को वॉशिंगटन और बीजिंग के साथ अपने रिश्तों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रही हैं. वॉशिंगटन में स्टिमसन सेंटर के चीन प्रोग्राम की डायरेक्टर युन सन ने 'टाइम्स' को बताया, "भारत को लेकर चीन की मुख्य चिंता हमेशा से भारत का अमेरिका के साथ झुकाव रही है. इसलिए बीजिंग निश्चित रूप से दिल्ली के साथ अपने रिश्तों को बेहतर बनाने का मौका नहीं गंवाना चाहेगा."
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सात साल बाद दिल्ली पहुंचे शी जिनपिंग
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का यह दौरा सात साल में भारत का उनका पहला दौरा है. यह दौरा 2020 में सीमा पर हुई जानलेवा झड़प के बाद रिश्तों में आई लंबी खटास और 2024 में शुरू हुई सावधानी भरी कूटनीतिक सुधार की प्रक्रिया के बाद हो रहा है. शी 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने वाले हैं. यह मुलाकात नई दिल्ली समिट को और भी अहम बनाती है, क्योंकि चीनी नेता अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बेहद अहम बातचीत की तैयारी कर रहे हैं.
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत और चीन के रिश्तों में अनिश्चितता ने इन दोनों परमाणु-हथियार वाले पड़ोसी देशों के लिए तनाव कम करने का मौका दिया है. तृप्ति लाहिड़ी और ऑस्टिन रैमजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में गिरावट आई थी, जिसकी वजह नई दिल्ली द्वारा रूसी तेल की खरीद जैसे मुद्दे थे.
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ब्रिक्स ने बदला समीकरण
नई दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में चीनी अध्ययन के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने जर्नल को बताया, "भारत स्थिति को फिर से संतुलित करने की कोशिश कर रहा है." अखबार ने कहा कि भारत-चीन संबंधों में कोई भी सुधार सीमा विवाद के अनसुलझे रहने, पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी रिश्तों और हिंद महासागर में सुरक्षा प्रतिस्पर्धा की वजह से सीमित है.
सुन ने जर्नल को बताया, "चीनी पक्ष भी देख रहा है कि भारत सही समय का इंतजार कर रहा है और बेहतर विकल्पों पर काम कर रहा है, जो भविष्य में सामने आ सकते हैं. इसलिए मुझे लगता है कि इससे चीन-भारत संबंधों में मौजूदा सुधार की सतही प्रकृति और बढ़ जाती है."
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वाशिंगटन पोस्ट ने एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों एजाज हुसैन और शेख सालिक की रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जिनमें इस शिखर सम्मेलन को भारत के लिए एक मुश्किल संतुलन बनाने वाली कवायद बताया गया. रिपोर्टों में कहा गया कि बैठक में शामिल होने वाले नेताओं में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और शी शामिल थे. पीएम मोदी ने शिखर सम्मेलन से पहले पुतिन और पेजेश्कियान के साथ अलग-अलग बातचीत की.
ग्लोबल साउथ की आवाज बनेगा भारत
वाशिंगटन 'पोस्ट' में छपी एपी की रिपोर्ट के अनुसार, इस बढ़े हुए ग्रुप के 11 सदस्य ग्लोबल ऑर्डर में अधिक प्रभाव चाहते हैं, लेकिन उनके राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति से जुड़े हित अलग-अलग हैं. इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के सीनियर एनालिस्ट प्रवीण डोंथी ने एपी को बताया, "ग्लोबल साउथ कोई एक जैसा ग्रुप नहीं है. इसलिए, इस ग्रुप के लिए इन झगड़ों को संभालना और उनमें मध्यस्थता करना मुश्किल होगा."
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रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध इन मतभेदों को सामने ला सकते हैं. भारत के रूस और ईरान के साथ पुराने संबंध हैं, जबकि वह अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी अपनी साझेदारी बढ़ा रहा है.