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होर्मुज पर बड़े एक्शन की तैयारी में ट्रंप... 2200 सैनिकों के साथ मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा अमेरिका का खतरनाक युद्धपोत

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि क्याडोनलड ट्रंप ईरान में सेना भेजेंगे. इसी बीच यूएसएस त्रिपोली 2,000 से ज्यादा सैनिकों के साथ मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा है, जिससे हालात और गंभीर हो गए हैं.

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मिडिल ईस्ट में पिछले तीन हफ्तों से चल रही जंग के बीच पूरी दुनिया की नजरें एक ही सवाल पर टिकी हैं. क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनलड ट्रंप (Donald Trump) ईरान में अपनी सेना भेजने जा रहे हैं? इस सवाल का जवाब अभी साफ नहीं है, इन सबके बीच हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों ने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. इन तस्वीरों में अमेरिका का ताकतवर युद्धपोत त्रिपोली दो हज़ार से अधिक सैनिकों के साथ मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ता हुआ नजर आया है, जो इस वक्त दक्षिण हिंद महासागर में भारत के करीब मौजूद बताया जा रहा है. 

ट्रंप का बयान ने बढ़ाया था सस्पेंस 

दरअसल, गुरुवार को जब मीडिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से इस मुद्दे पर सवाल किया, तो उन्होंने अपने खास अंदाज में जवाब दिया. उन्होंने कहा कि वह कहीं भी सेना नहीं भेज रहे हैं, और अगर भेजते भी तो इसकी जानकारी वो कभी भी सार्वजनिक नहीं करते. ट्रंप का यह बयान जितना हल्का लगता है, उतना ही गहरा संदेश भी देता है. क्योंकि वह अपने अप्रत्याशित फैसलों के लिए जाने जाते हैं और कई बार आखिरी वक्त पर बड़े कदम उठा चुके हैं. जो असर पूरी दुनिया पर पड़ता है. 

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों बना बड़ा मुद्दा?

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अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान में अपनी रणनीति को और मजबूत करने के लिए हजारों सैनिकों की तैनाती पर गंभीरता से विचार कर रहा है. अगर ऐसा होता है, तो यह कदम मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव को एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंचा सकता है. अब सवाल यह उठता है कि आखिर अमेरिका को जमीन पर सेना उतारने की जरूरत क्यों पड़ रही है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज'. यह दुनिया का सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जहां से लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की सप्लाई होती है. 28 फरवरी को शुरू हुए संघर्ष के बाद से ईरान ने इस रास्ते को लगभग बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है.

टैंकरों पर लगातार बढ़ रहा दबाव 

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जानकारी देते चलें की मौजूदा परिस्थिति में हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई टैंकर ऑपरेटर्स को इस रास्ते से सुरक्षित निकलने के लिए भारी रकम चुकानी पड़ रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक जहाज को करीब 20 लाख डॉलर तक देने पड़े. हालांकि ईरान ने भारत और पाकिस्तान की ओर जाने वाले कुछ जहाजों को राहत दी है, लेकिन पश्चिमी देशों के जहाजों को लेकर उसने सख्त रुख अपनाया हुआ है.

जमीनी सेना की जरूरत क्यों?

यही वजह है कि अमेरिका इस समुद्री रास्ते को फिर से सुरक्षित और चालू करना चाहता है. लेकिन इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ईरान के तटीय इलाकों और छोटे द्वीपों पर उसका मजबूत नियंत्रण है. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका को यहां स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, तो उसे जमीन पर अपने सैनिक उतारने ही होंगे.

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यूएसएस त्रिपोली की अहम भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में यूएसएस त्रिपोली (USS Tripoli) की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. यह कोई साधारण युद्धपोत नहीं है, बल्कि एक चलता-फिरता सैन्य अड्डा है. इस पर करीब 2,200 मरीन सैनिक तैनात हैं, जो हर तरह के युद्ध के लिए प्रशिक्षित हैं. इसके अलावा इसमें एफ-35 जैसे आधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट और उन्नत हेलीकॉप्टर भी मौजूद हैं, जो इसे और घातक बनाते हैं. ऐसे स्थिति में जानकारों का मानना है कि अगर ट्रंप इस जहाज का इस्तेमाल करते हुए ईरान के छोटे द्वीपों पर कब्जा करने की रणनीति अपनाते हैं, तो इससे समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है. खास बात यह है कि ईरान की नौसेना का एक बड़ा हिस्सा पहले ही कमजोर हो चुका है, जिससे अमेरिका के लिए यह ऑपरेशन अपेक्षाकृत आसान हो सकता है.

ईरान का परमाणु मुद्दा भी अहम

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इस पूरे मामले की दूसरी बड़ी वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी है. रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के पास करीब 950 पाउंड से ज्यादा उच्च संवर्धित यूरेनियम मौजूद है. यह सामग्री परमाणु हथियार बनाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. बताया जा रहा है कि हालिया हमलों के बाद यह यूरेनियम कई ठिकानों के मलबे के नीचे दबा हुआ है, जिसे सुरक्षित करने के लिए जमीनी सेना की जरूरत पड़ सकती है.

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बताते चलें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही यह साफ कर चुके हैं कि वह ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार बनाने नहीं देंगे. ऐसे में यह संभावना और भी बढ़ जाती है कि अमेरिका आने वाले दिनों में कोई बड़ा सैन्य कदम उठा सकता है. ऐसे में अगर अगले हफ्ते अमेरिकी मरीन सैनिक ईरान की जमीन पर उतरते हैं, तो यह पिछले 20 सालों में पहली बार होगा जब अमेरिका किसी बड़े युद्ध क्षेत्र में इस तरह सीधा हस्तक्षेप करेगा. ऐसे में पूरी दुनिया की नजरें अब इसी बात पर टिकी हैं कि क्या यह तनाव एक बड़े युद्ध में बदलने वाला है या फिर कूटनीति आखिरी समय में हालात संभाल लेगी.

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