ईरान की पूरी नेवी को तबाह करने में सक्षम, इजरायल-अमेरिका ने जिस युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन से किया 'हमला', जानें उसकी खासियत
Iran Israel War Live: ईरान की नौसेना पर अकेले भारी अमेरिकी युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन से ईरानी शहरों पर अमेरिका और इजरायल ने मिलकर हमला किया है. कहा जा रहा है कि इसकी लंबे समय से प्लानिंग थी.
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ईरान और इजरायल के बीच एक बार फिर जंग की शुरुआत हो गई. इजरायल ने एक साथ 30 हमले किए. Wall Street Journal की खबर के मुताबिक ईरान पर अमेरिका और इज़राइल ने साझा रूप से हमला किया है. रिपोर्ट में कहा गया कि यह एक संयुक्त अभियान है, जिससे दुनिया के सबसे आर्थिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में से एक में व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा पैदा हो सकता है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार इस हमले की प्लानिंग कई दिनों से हो रही थी. वहीं बहरीन में अमेरिकी नौसेनिक बेस पर अलर्ट जारी किया गया है. इस ऑपरेशन का नाम एपिक फ्यूरी दिया गया है.
अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर मिलकर किया हमला
वहीं एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से WSJ ने खबर दी है कि अमेरिका ने भी हमले में भाग लिया और हमले किए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान पर ये हमले संभवतः अमेरिका के समुद्र में चलते-फिरते युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन से किए गए. इस युद्धपोत पर कई दिनों से युद्ध की तैयारी की जा रही थी. लिंकन से हमले की खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जॉर्डन, कतर, सऊदी अरब सहित कई मुस्लिम देशों ने साफ कर दिया था कि वे ईरान पर हमले के लिए अपने एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे.
अमेरिका के युद्धपोत से ईरान पर हमला
न्यूज़ 18 की खबर के मुताबिक ईरान पर ये हमले मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और एयरक्राफ्ट कैरियर, संभवतः अब्राहम लिंकन से उड़ान भरने वाले जेट्स के जरिए किए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि करीब 6–8 शहरों पर हमले किए गए हैं और 30 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया गया है.
वहीं इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक ईरान पर अमेरिका ने ये हमले अपने युद्धपोत अब्राहम लिंकन से किए हैं. इस हमले में अमेरिकी नौसेना और वायुसेना शामिल है.
क्या है USS अब्राहम लिंकन?
USS अब्राहम लिंकन अमेरिकी नौसेना का एक न्यूक्लियर युद्धपोत है और यह युद्धक पोतों व जहाजों के पूरे युद्ध समूह का हिस्सा है. इसमें एक बड़ा कैरियर मुख्य जहाज होता है. पूरा ग्रुप अकेले ही पूरी सेना जितनी तबाही मचाने में सक्षम है. इसका नाम Carrier Strike Group-3 (CSG-3) है.
इस ग्रुप में कई जहाज और पनडुब्बियां होती हैं, जैसे कि:
1 बड़ा न्यूक्लियर कैरियर, जैसे USS अब्राहम लिंकन (1 लाख टन से ज्यादा वजन)
3–4 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर (Arleigh Burke क्लास)
कभी-कभी 1 क्रूज़र
1–2 न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियाँ
1–2 सपोर्ट जहाज (तेल और गोला-बारूद ले जाने वाले)
कुल मिलाकर: 7–10 जहाज और पनडुब्बियाँ होती हैं.
इंडिया टुडे में छपी खबर के मुताबिक USS अब्राहम लिंकन में करीब 7000–8000 सैनिक और मरीन, तथा 65–70 लड़ाकू विमान तैनात हैं, जिनमें
- F/A-18 Super Hornet
- F-35C स्टील्थ फाइटर
- E-2D Hawkeye (आसमान की निगरानी करने वाला)
- MH-60 हेलीकॉप्टर
- EA-18G Growler (दुश्मन के रडार जाम करने वाला) शामिल हैं.
इसमें कितनी मिसाइलें और हथियार हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक अब्राहम लिंकन पर सैकड़ों टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइलें (दूर से दुश्मन को मारने वाली), हवा से हवा, हवा से ज़मीन और समुद्र में मार करने वाली मिसाइलें, हजारों किलो बम और गोला-बारूद, डिफेंस मिसाइलें (समुद्र से आने वाले हमले रोकने वाली) मौजूद हैं, जो इसे बेहद घातक और लगभग अभेद्य बना देती हैं.
यह कैरियर इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यह न्यूक्लियर पावर से चलता है, यानी इसे ईंधन की वैसी समस्या नहीं होती जैसी फ्यूल, डीज़ल या बैटरी से चलने वाले कैरियर को होती है.
ईरान को किस तरह के नुकसान का अनुमान?
इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक इस हमले के बाद ईरान को भारी नुकसान की संभावना है. कैरियर से हर रोज़ 100–150 हमले किए जा सकते हैं. इसके अलावा टॉमहॉक मिसाइलें ईरान के एयरबेस, मिसाइल साइट, तेल फैक्ट्रियों और नौसेना अड्डों को तबाह कर सकती हैं. ईरान की छोटी नौसेना को पूरी तरह नेस्तनाबूद किया जा सकता है.
होर्मुज़ स्ट्रेट (तेल के रास्ते) पर कब्जा किया जा सकता है और ईरान की हवाई उड़ानें बंद हो सकती हैं. हालांकि, ईरान के पास भी बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन और सहयोगी गुट हैं, जो जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं. इज़रायल की छोटी आबादी और सीमित क्षेत्रफल को देखते हुए कहा जा सकता है कि उसे भी ईरानी हमलों से भारी नुकसान हो सकता है.
हमले की टाइमिंग महत्वपूर्ण!
कहा जा रहा है कि यह हमला राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जनवरी की शुरुआत में ईरानी रेजीम के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों की मदद करने के वादे के बाद, एक महीने तक चले अमेरिकी सैन्य जमावड़े के बाद हुआ. राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को बार-बार चेतावनी दी थी कि यदि वह अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ता, तो उसे सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा.
इसी बीच ईरान पर हमले के बाद ट्रंप का एक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना सकता, उसे ऐसा नहीं करने दिया जाएगा. अगर वह ऐसा करेगा, तो उसे खत्म कर दिया जाएगा.
ईरान में क्या हो रहा है, कहां-कहां हमले हुए?
इज़रायल और अमेरिका ने ईरान में जिन जगहों पर हमला किया, उनमें रक्षा मंत्रालय, खुफिया मुख्यालय, सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का ऑफिस, एटॉमिक एनर्जी ऑफ ईरान और परचीन शामिल हैं. वहीं ईरान के शीर्ष अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि देश किसी भी हमले का जवाब देगा और यहां तक कि सबसे छोटा हमला भी क्षेत्रीय युद्ध को जन्म दे सकता है. ईरान ने संघर्ष के लिए खुद को तैयार कर लिया था, अपनी सेनाओं को जुटा लिया, परमाणु सुविधाओं को मजबूत किया, निर्णय लेने की शक्ति का विकेंद्रीकरण किया और आंतरिक असहमति पर सख्ती की.
नुकसान कितना हुआ और कितने लोग मारे गए, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है. जवाबी कार्रवाई की आशंका के चलते इज़रायली सेना ने कहा कि उसने देश के कई इलाकों में हवाई हमले के सायरन बजाए हैं.
सेना ने कहा कि यह कदम “इज़रायल की ओर मिसाइल दागे जाने की आशंका को देखते हुए जनता को तैयार करने” के लिए एक प्रो-एक्टिव कदम था. अधिकारियों की चेतावनी के बाद इज़रायल के कई हिस्सों में सायरन सुने गए.
इजरायल में इमरजेंसी घोषित!
एहतियात के तौर पर इज़रायल ने देश भर के स्कूल बंद रखने का आदेश दिया, नागरिकों को घर से काम करने की सलाह दी और लोगों के एक जगह जुटने पर रोक लगा दी. मिलिट्री ने कहा कि इन अलर्ट उपायों का मकसद ईरान या उसके क्षेत्रीय सहयोगियों की ओर से संभावित मिसाइल हमलों की स्थिति में आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है.
ट्रंप के बयान के बीच ईरान पर हमला!
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को “बहुत मुश्किल” और “बहुत खतरनाक” बताया था. ईरानी और अमेरिकी अधिकारियों के बीच गुरुवार को जिनेवा में बातचीत का तीसरा दौर हुआ था और शनिवार को बातचीत का एक और दौर तय किया गया था.
2024 और 2025 में इज़रायल और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा शैडो संघर्ष, पहले कभी न देखे गए सीधे सैन्य टकरावों की श्रृंखला में बदल गया, जिसमें बड़े हवाई हमले और जवाबी मिसाइल हमले शामिल थे. पहले जहां ये हमले छिपे-छिपे किए जाते थे, वहीं अब इनका खुलकर इस्तेमाल हो रहा है.
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