कौन हैं आशुतोष सिन्हा? जिन्होंने वाराणसी में बीजेपी को दी बड़ी शिकस्त, लगातार दूसरी बार बने MLC
वाराणसी खंड स्नातक एमएलसी चुनाव में सपा के आशुतोष सिन्हा ने बीजेपी प्रत्याशी केदारनाथ सिंह को 19,932 मतों से हराकर लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की. कायस्थ बिरादरी से आने वाले आशुतोष ने 2006 में छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया और 2007 में अखिलेश यादव की मौजूदगी में छात्र युवा सम्मेलन आयोजित किया.
Follow Us:
उत्तर प्रदेश की 11 एमएलसी (MLC) सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं. इनमें बीजेपी ने 6, जबकि समाजवादी पार्टी ने 5 सीटों पर जीत दर्ज की है. लेकिन इन नतीजों में सबसे ज्यादा चर्चा वाराणसी की हो रही है। इसकी वजह यह है कि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. यहां की सभी आठ विधानसभा सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं. जिले से तीन एमएलसी हैं और योगी सरकार में चार मंत्री भी हैं. इसके अलावा नगर निगम में मेयर भी बीजेपी का है. इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर जीत हासिल कर बीजेपी को बड़ा झटका दिया है. शिक्षक खंड सीट से लाल बिहारी यादव और स्नातक खंड सीट से आशुतोष सिन्हा ने शानदार जीत दर्ज की है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन हैं आशुतोष सिन्हा, जिन्होंने बीजेपी के मजबूत गढ़ में सेंध लगाते हुए बड़ी जीत हासिल की? आइए जानते हैं.
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के वाराणसी खंड स्नातक चुनाव में समाजवादी पार्टी के आशुतोष सिन्हा ने जीत दर्ज कर सियासी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार केदारनाथ सिंह को हराकर लगातार दूसरी बार विधान परिषद में अपनी जगह बनाई है. आशुतोष सिन्हा का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था. कायस्थ बिरादरी से आने वाले आशुतोष ने साल 2006 में हरिश्चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा लिया था. इस चुनाव में उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल करते हुए उपाध्यक्ष का पद संभाला. इस जीत ने उन्हें छात्र राजनीति में पहचान दिलाई और यहीं से उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ने लगा.
मुद्दों को लेकर हमेशा रखी सक्रियता
साल 2007 में उन्होंने 'छात्र युवा सम्मेलन' का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे. उस समय अखिलेश यादव पार्टी के राष्ट्रीय युवा प्रभारी और सांसद थे. इस आयोजन के बाद आशुतोष की पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नजदीकी बढ़ी और वह संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे. उनकी राजनीति की एक खास बात यह भी मानी जाती है कि वह केवल चुनाव के समय ही लोगों के बीच नजर नहीं आते, बल्कि स्थानीय मुद्दों और आम लोगों की समस्याओं को लेकर भी सक्रिय रहते हैं. समर्थकों के बीच उनकी पहचान एक ऐसे नेता की है, जो अपने साथ जुड़े लोगों के सुख-दुख में खड़े रहने की कोशिश करते हैं. उनकी इसी व्यक्तिगत पहुंच और व्यवहार को चुनाव में मिले समर्थन की एक वजह माना जा रहा है.
आंदोलनों में शामिल रहे आशुतोष सिन्हा
आशुतोष सिन्हा का राजनीतिक सफर केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा. बसपा सरकार के दौरान विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के चलते उन्हें साल 2007 और 2011 में गिरफ्तार भी किया गया था. साल 2007 के बलिया लोकसभा उपचुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के पक्ष में प्रचार किया था. अधिवक्ताओं की समस्याओं को लेकर भी वह कई बार आवाज उठाते रहे हैं. युवा अधिवक्ताओं के लिए चैंबर और प्रोत्साहन राशि, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए पेंशन और असमय मृत्यु होने पर उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देने जैसी मांगों को लेकर आयोजित धरना-प्रदर्शनों में उन्होंने हिस्सा लिया. इसके अलावा वित्तविहीन शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों, प्रेरकों और सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों पर भी उनकी सक्रियता रही है. पुरानी पेंशन बहाली और सम्मानजनक मानदेय जैसी मांगों को लेकर हुए आंदोलनों में उन्होंने भागीदारी की. यही वजह है कि शिक्षक और कर्मचारी वर्ग के बीच भी उनकी राजनीतिक सक्रियता चर्चा में रही है.
2020 में पहली बार पहुंचे विधान परिषद
आशुतोष सिन्हा को साल 2020 में समाजवादी पार्टी ने वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था. 7 दिसंबर 2020 को वह पहली बार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए. उस चुनाव में भी उनका मुकाबला बीजेपी के केदारनाथ सिंह से हुआ था. आशुतोष ने उन्हें 3,850 मतों के अंतर से हराया था. इस जीत के बाद विधान परिषद में उनकी राजनीतिक भूमिका और मजबूत हुई. वर्ष 2023-24 में उन्होंने संसदीय एवं सामाजिक सद्भाव समिति के सभापति की जिम्मेदारी भी निभाई. यह जिम्मेदारी उनके राजनीतिक अनुभव और सदन में सक्रियता के लिहाज से अहम रही.
वाराणसी में सपा ने दोनों एमएलसी सीटों पर जमाया कब्जा
इस बार वाराणसी एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर जीत हासिल की है. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लाल बिहारी यादव लगातार दूसरी बार विधान परिषद पहुंचे. वहीं स्नातक सीट पर आशुतोष सिन्हा ने अपनी जीत दोहराई. दोनों सीटों पर सपा की जीत ने वाराणसी के राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है. वाराणसी खंड स्नातक सीट की मतगणना 27 अक्टूबर से शुरू हुई थी और अंतिम नतीजे आने में करीब तीन दिन का समय लगा. मतगणना के शुरुआती दौर से ही आशुतोष सिन्हा बढ़त बनाए हुए थे. प्रथम वरीयता के मतों की नौवें चक्र तक की गिनती में उन्हें 50,462 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के केदारनाथ सिंह को 33,478 मत प्राप्त हुए थे. इस दौरान आशुतोष 16,984 मतों से आगे थे. हालांकि, निर्धारित मतों का आंकड़ा पूरा नहीं होने के कारण दूसरी वरीयता के मतों की गिनती भी की गई. अंतिम परिणाम में आशुतोष सिन्हा को कुल 55,046 वोट मिले, जबकि बीजेपी प्रत्याशी केदारनाथ सिंह को 35,114 मत प्राप्त हुए. इस तरह आशुतोष ने 19,932 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की.
यह भी पढ़ें
बताते चलें कि वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत ने आशुतोष सिन्हा के राजनीतिक सफर को एक नई पहचान दी है. छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले आशुतोष अब विधान परिषद में लगातार दूसरी बार अपनी जिम्मेदारी निभाने जा रहे हैं. उनके सामने अब मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने और क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को सदन में मजबूती से उठाने की चुनौती होगी. आंकड़ों और चुनावी नतीजों से इतर यह जीत उनके लिए अपने राजनीतिक आधार को और मजबूत करने का अवसर भी है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपने इस जनसमर्थन को विकास और जनहित के मुद्दों पर किस तरह आगे बढ़ाते हैं.