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देवभूमि की आस्था का केंद्र है मां झूमाधूरी मंदिर, सीएम धामी ने भक्तों से दर्शन करने की अपील की

देवभूमि उत्तराखंड की गोद में बसे अनेक अलौकिक तीर्थस्थलों में मां झूमाधूरी मंदिर एक विशेष और अनूठा स्थान रखता है.

देवभूमि की आस्था का केंद्र है मां झूमाधूरी मंदिर, सीएम धामी ने भक्तों से दर्शन करने की अपील की
Image Credits: Video Grab
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देवभूमि उत्तराखंड की गोद में बसे अनेक अलौकिक तीर्थस्थलों में 'झूमाधूरी मंदिर' एक विशेष और अनूठा स्थान रखता है. घने जंगलों, ऊंचे पर्वतों और मैदानों के बीच स्थित यह मंदिर न केवल अगाध आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए शांति का स्थान है.

सीएम धामी ने साझा की मंदिर से जुड़ी जानकारी

यह मंदिर आस्था, चमत्कार और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है और मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं.

शुक्रवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर के भव्यता का उल्लेख किया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो शेयर किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, "चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र में स्थित मां झूमाधूरी मंदिर आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है. मां भगवती को समर्पित यह प्राचीन मंदिर भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है. यहां भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के अवसर पर हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन किया जाता है."

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उन्होंने सभी को आमंत्रित करते हुए लिखा, "अगर आप चंपावत आएं तो मां झूमाधूरी के दर्शन जरूर करें. यहां का शांत और आध्यात्मिक वातावरण मन को सुकून देता है और भक्तों को विशेष आध्यात्मिक अनुभव की अनुभूति कराता है."

भाद्रपद में लगता है भव्य मेला

उत्तराखंड की आम जनत में इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है, जहां पहुंचकर भक्त न केवल मानसिक शांति का अनुभव करते हैं, बल्कि वहां की समृद्ध लोक-संस्कृति और परंपराओं से रू-ब-रू भी होते हैं.

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लोक-संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक

यह मंदिर आदिशक्ति मां भगवती को समर्पित यह मंदिर सिद्ध शक्तिपीठ है. यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है. हर साल भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को हर साल भव्य रूप से 'मां झूमाधूरी महोत्सव' मनाया जाता है. आमतौर पर अगस्त या सितंबर के महीने में पड़ता है.

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महोत्सव के समय आसपास के क्षेत्रों (जैसे पाटन और राईकोट) से देवी रथ यात्राएं दुर्गम पहाड़ों से होती हुई मंदिर तक पहुंचती हैं. यह त्योहार स्थानीय कुमाऊंनी संस्कृति, लोक संगीत और परंपराओं के संरक्षण का एक बड़ा माध्यम है.

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