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उत्तराखंड की बेटी और शिव की अर्धांगिनी मां नंदा देवी, जानिए क्यों खास हैं माता पार्वती का ये स्वरूप

'मां नंदा देवी' उत्तराखंड की आराध्या और हिमालय की संरक्षक देवी हैं, जिन्हें माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है. उन्हें कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में 'आनंद देने वाली देवी' के रूप में पूजा जाता है. यह संपूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति और आस्था का मुख्य केंद्र हैं.

उत्तराखंड की बेटी और शिव की अर्धांगिनी मां नंदा देवी, जानिए क्यों खास हैं माता पार्वती का ये स्वरूप
Image Credits: @pushkardhami/x
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उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है और इस देवभूमि में मां नंदा देवी में विराजमान हैं. इस पावन धरा में माता रानी को सिर्फ देवी ही नहीं, बल्कि अपनी बेटी के रूप में पूजा जाता है. इसलिए उनकी पूजा में श्रद्धा के साथ-साथ अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव भी देखने को मिलता है.

सीएम धामी ने शेयर किया मंदिर का भव्य वीडियो

ऐसी मान्यता है कि मां नंदा देवी को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी (माता पार्वती) माना जाता है. गुरुवार को माता रानी की महिमा का उल्लेख उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी किया है. 

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का भव्य वीडियो शेयर किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, "अल्मोड़ा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक मां नंदा देवी का पावन मंदिर श्रद्धा, आस्था और विश्वास का दिव्य केंद्र है. पर्वतीय शिल्पकला से सुसज्जित यह प्राचीन मंदिर आदिशक्ति भगवती मां नंदा देवी को समर्पित है. आप भी अल्मोड़ा जनपद आगमन पर मां नंदा देवी के दर्शन अवश्य करें.”

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नंदा देवी को माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है

'मां नंदा देवी' उत्तराखंड की आराध्या और हिमालय की संरक्षक देवी हैं, जिन्हें माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है. उन्हें कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में 'आनंद देने वाली देवी' के रूप में पूजा जाता है. यह संपूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति और आस्था का मुख्य केंद्र हैं.

देवी हर 12 साल में अपने मायके नौटी गांव आती हैं

ऐसी मान्यता है कि देवी हर 12 साल में अपने मायके नौटी गांव आती हैं. इस अवसर पर कुमाऊं मण्डल नंदा राजजात यात्रा के तहत 280 किमी लंबी अत्यंत कठिन पदयात्रा निकाली जाती है, जो होमकुंड तक जाती है. यह यात्रा देवी नंदा के मायके (नौटी गांव, चमोली) से उनके ससुराल (कैलाश पर्वत) जाने की विदाई का प्रतीक है. इस यात्रा का नेतृत्व एक विशेष चार सींग वाले काले मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) द्वारा किया जाता है, जो देवी का वाहन माना जाता है.

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केले के पेड़ से मां नंदा की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है

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इसी के साथ ही भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का भी विशेष महत्व है, जिसे नंदा अष्टमी भी कहा जाता है.इस अवसर पर बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ त्योहार मनाया जाता है. खास बात यह है कि इस दिन केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है.

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