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UP में बंदरों का गजब कारनामा...करोड़ों का सोना लेकर बंदर हुए नो-दो-ग्यारह, सुनकर जज साहब भी रह गए दंग!

UP Viral Video: सालों तक केस चलता रहा और आखिरकार 2024 में अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया. इसके बाद बरी हुए व्यक्ति मुदित अग्रवाल ने कोर्ट में आवेदन दिया कि जो गहने पुलिस ने जब्त किए थे, उन्हें वापस किया जाए क्योंकि वे उनके परिवार की संपत्ति थे. लेकिन जब गहनों की तलाश शुरू हुई, तो पुलिस की तरफ से जो जवाब आया उसने पूरे मामले को और उलझा दिया.

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UP Trending Videos: सालों तक केस चलता रहा और आखिरकार 2024 में अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया. इसके बाद बरी हुए व्यक्ति मुदित अग्रवाल ने कोर्ट में आवेदन दिया कि जो गहने पुलिस ने जब्त किए थे, उन्हें वापस किया जाए क्योंकि वे उनके परिवार की संपत्ति थे. लेकिन जब गहनों की तलाश शुरू हुई, तो पुलिस की तरफ से जो जवाब आया उसने पूरे मामले को और उलझा दिया. पुलिस ने पुराने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि गहने अब मौजूद नहीं हैं और इसके पीछे एक ऐसा कारण बताया गया जिसने सबको हैरान कर दिया.

मामला उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी का है. साल 2007 में एक महिला ने अपनी जान दे दी थी. मौत के वक्त महिला ने अंगूठी, नोज़पिन, चूड़ियां और गले का हार पहना हुआ था. वहीं आज के समय में जिसकी कीमत करीब एक करोड़ रुपए है. मौत के बाद दहेज प्रताड़ना का केस बना था. आरोप मृतका के पति मुदित अग्रवाल और ससुराल वालों पर लगा था. पोस्टमार्टम के बाद महिला के शरीर में जितने गहने थे, उसे पुलिस थाने के स्टोर रूम में रख दिया गया. कई सालों तक केस चलता रहा.

“छत पर सुखाए गए गहने और बंदरों की कहानी”

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पुलिस द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ में लिखा था कि उस समय भारी बारिश के कारण गहने भीग गए थे और निरीक्षण की तैयारी चल रही थी, इसलिए उन्हें सुखाने के लिए थाने की छत पर रखा गया. इसी दौरान बंदरों का झुंड आया और कथित तौर पर गहनों को इधर-उधर फेंककर ले गया. यही वह दावा था जिसने पूरे मामले को असाधारण बना दिया. करोड़ों रुपये के गहनों का इस तरह खुले में रखा जाना और फिर “बंदरों द्वारा ले जाने” की बात ने न सिर्फ अदालत को चौंकाया बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए.

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कोर्ट की नाराज़गी और जांच के आदेश

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जब यह बात अदालत के सामने रखी गई तो कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही माना. कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब गहने एक आपराधिक मामले से जुड़े सबूत थे, तो उन्हें सुरक्षित ताले में रखने के बजाय छत पर क्यों रखा गया.. साथ ही “बंदरों द्वारा गहने ले जाने” की कहानी को भी संदिग्ध माना गया. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है और पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए. अदालत ने यह भी निर्देश दिए कि पीड़ित पक्ष को हुए नुकसान की भरपाई पर विचार किया जाए.

जिम्मेदारी तय करने की उलझन

पुलिस ने आगे बताया कि गहने 2007 से 2009 के बीच गायब हुए थे और उस समय जो स्टोर रूम इंचार्ज थे, उनकी बाद में मृत्यु हो चुकी है. इसी वजह से सीधे तौर पर किसी व्यक्ति पर जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो गया. दूसरी तरफ, याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अनियमितता है, और उनके परिवार की संपत्ति को सही तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया.उनका कहना है कि सालों से उन्हें न तो गहने मिले और न ही उसका कोई मुआवजा दिया गया.

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एक और अजीब उदाहरण - “चूहों द्वारा शराब पी जाने” की कहानी

ऐसा ही एक और चर्चित मामला साल 2017 में बिहार से भी सामने आया था, जहाँ पुलिस द्वारा जब्त की गई शराब को लेकर दावा किया गया कि उसे चूहे पी गए. यह मामला भी मीडिया में खूब चर्चा में रहा और इसने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि जब्त सामान की सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर हो सकती है. हालांकि हर ऐसे मामले में असली समस्या एक ही नजर आती है , जिम्मेदारी और पारदर्शिता की कमी.

असली मुद्दा क्या है?

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इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल “बंदर या चूहा” नहीं है, बल्कि यह है कि करोड़ों रुपये की संपत्ति जो कोर्ट केस से जुड़ी थी, वह इतनी असुरक्षित जगह पर क्यों रखी गई. यह कहानी कहीं न कहीं सिस्टम की ढिलाई, रिकॉर्ड में गड़बड़ी और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है. अदालतें भले ही इन मामलों की जांच कर रही हों, लेकिन ऐसे घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि सबूतों की सुरक्षा सिर्फ नियमों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी सख्ती से लागू होनी चाहिए.

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