हार को हथियार बना रही BJP... महिला आरक्षण बिल पर PM मोदी ने तैयार कर दी सियासी पिच, बंगाल चुनाव में होगा बड़ा खेल
संसद में महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका, लेकिन बीजेपी इसे राजनीतिक रणनीति में बदलने की तैयारी में है. पार्टी अब विपक्ष को महिला विरोधी बताकर आगामी चुनावों, खासकर 2029 लोकसभा तक इस मुद्दे को भुनाने की योजना बना रही है.
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देश की संसद में महिला आरक्षण बिल का पास न होना अब सिर्फ एक संसदीय घटना नहीं रह गया है, बल्कि इसने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. जहां विपक्ष इसे सरकार की असफलता के तौर पर पेश कर रहा है, वहीं बीजेपी इसे एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की तैयारी में जुट गई है. पार्टी इस मुद्दे को भावनात्मक और सामाजिक दोनों स्तर पर उठाकर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है.
हार के बाद तुरंत सक्रिय हुई रणनीति
विधेयक गिरने के तुरंत बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के शीर्ष नेताओं की बैठक हुई. इस बैठक में साफ तौर पर यह समझ लिया गया कि मौजूदा संख्या बल के साथ विपक्ष के सहयोग के बिना ऐसे अहम बिल को पारित कराना संभव नहीं है. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के जरिए पहले ही राजनीतिक जमीन तैयार कर दी. इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को सीधे निशाने पर लेते हुए इसे महिलाओं के हितों के खिलाफ खड़ा दिखाने की कोशिश की.
संसद से सड़क तक बढ़ेगा मुद्दा
बीजेपी ने इस मुद्दे को सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रखा है. बिल गिरने के बाद महिला सांसदों का संसद परिसर में प्रदर्शन इसी रणनीति का संकेत था. अब पार्टी इसे देशभर में आंदोलन का रूप देने की तैयारी कर रही है. विपक्षी नेताओं के घरों का घेराव और लगातार विरोध प्रदर्शन के जरिए यह मुद्दा जनता के बीच ले जाया जाएगा.
महिला वोट बैंक पर खास नजर
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे बड़ा फोकस देश की आधी आबादी यानी महिला वोटर्स हैं. बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि वह महिलाओं को उनका अधिकार दिलाना चाहती है, जबकि विपक्ष इसमें बाधा बन रहा है. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा. इसके साथ अगले साल उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में भी इसे लगातार हवा दी जाएगी.
2029 तक लंबी राजनीतिक योजना
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी इस मुद्दे को लंबे समय तक जिंदा रखने की रणनीति पर काम कर रही है. जैसे आपातकाल के मुद्दे पर कांग्रेस को बार-बार घेरा जाता है, उसी तरह महिला आरक्षण को लेकर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी है. बीजेपी आने से तमाम विधानसभा चुनावों समेत 2029 के लोकसभा चुनाव तक इसे एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है.
कमजोर बहुमत ने बदली रणनीति
लोकसभा चुनाव 2024 में पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद बीजेपी के लिए यह साफ हो गया है कि बड़े और संवेदनशील विधेयकों को पास कराना आसान नहीं होगा. ऐसे में पार्टी अब हर मुद्दे को राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल करने के नए तरीके तलाश रही है. महिला आरक्षण बिल इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जिसके जरिए पार्टी भविष्य की जमीन तैयार कर रही है.
विपक्ष ने उठाए मंशा पर सवाल
दूसरी ओर विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहा है. विपक्षी दलों का कहना है कि अगर सरकार सच में बिल पास कराना चाहती तो पहले से संवाद करती. सर्वदलीय बैठक की मांग को नजरअंदाज करना और संसद में टकराव की स्थिति बनाना इस बात का संकेत है कि सरकार का उद्देश्य राजनीतिक लाभ लेना ज्यादा था. उनके मुताबिक, यह मुद्दा महिलाओं के अधिकार से ज्यादा चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है.
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बताते चलें कि अब महिला आरक्षण बिल एक ऐसा मुद्दा बन चुका है, जो आने वाले समय में लगातार सुर्खियों में रहेगा. बीजेपी इसे अपनी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की कमजोरी के रूप में पेश कर रहा है. आने वाले चुनावों में यह साफ होगा कि यह सियासी दांव किसके पक्ष में जाता है और किसके खिलाफ.
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