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क्या हमसे वफादारी साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा दोगे? जब भारत के दूत ने कर दी अमेरिका की बोलती बंद, पूछा- क्या इकोनॉमी का शटर गिरा दें?

रूस से तेल खरीद पर जब पश्चिमी देशों ने सवाल उठाए, तो ब्रिटेन में भारत के हाई कमिश्नर विक्रम दोराईस्वामी ने साफ कहा, "क्या आप चाहते हैं कि हम अपनी इकोनॉमी बंद कर दें? उन्होंने दोहरा मापदंड उजागर करते हुए पूछा, "जब आप खुद उन्हीं देशों से तेल खरीद रहे हैं, तो हमें क्यों रोका जा रहा है? दोराईस्वामी का जवाब न सिर्फ भारत की ऊर्जा जरूरतों की हकीकत दिखाता है, बल्कि ये भी बताता है कि भारत अपनी नीतियां किसी की मंजूरी से नहीं, अपने हितों से तय करता है.

तस्वीर: विक्रम दोराईस्वामी, ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त (फाइल फोटो)
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जब से डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को टैरिफ की धमकी दी है, जुर्माना लगया है, शुल्क ठोका है, तब से मानो इसने देश के लोगों और कूटनीतिक तबके को एकजुट कर दिया है. इसने न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हो रही है और नई दिल्ली के अगले कदम का इंतजार किया जा रहा है, बात भी हो रही है. इसी बीच लंदन में भारत के उच्चायुक्त विक्रम दोराईस्वामी का एक ब्रिटिश चैनल को दिए इंटरव्यू की एक क्लिपिंग वायरल हो रही है, जिसमें वो देश के पक्ष को प्रमुखता से रख रहे हैं और अमेरिका को भी दो टूक जवाब दे रहे हैं.

दोराईस्वामी की भाषा को देखें तो कहा जा सकता है कि भारत ने एक बार फिर पश्चिमी देशों को यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा, भले ही उस पर रूस से तेल खरीद को लेकर कितना भी अंतरराष्ट्रीय दबाव क्यों न डाला जाए. यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस पर लगे प्रतिबंधों के बीच भारत द्वारा सस्ती दरों पर रूसी तेल खरीदने पर पश्चिमी देशों की नाराजगी लगातार बनी हुई है. लेकिन अब भारत ने दो टूक अंदाज में यह संदेश दे दिया है कि उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा को बाहरी आलोचना से प्रभावित नहीं किया जा सकता. भारत की कमजोरी और ताकत भी यही रही है कि वो अपनी नीति अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रख कर बनाता है न कि किसी अन्य देश के चश्मे और दबाव से प्रभावित होकर.

ब्रिटेन में भारत के हाई कमिश्नर विक्रम दोराईस्वामी ने ब्रिटिश चैनल Times Radio को दिए एक इंटरव्यू में इसी मुद्दे पर पश्चिमी देशों, उनकी गोरे देश वाली मानसिकता, थर्ड वर्ल्ड को हीन भावना से देखने वाली सोच को करारा जवाब दिया, उनकी पोल खोली है. उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है. ऐसे में यह अपेक्षा करना कि भारत सिर्फ भू-राजनीतिक कारणों से अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे बंद कर ले, अव्यावहारिक और अनुचित है.

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जब दोराईस्वामी से सवाल किया कि क्या आप रूस और पुतिन के साथ अपने (भारत) के संबंधों को लेकर सहज महसूस करते हैं या नहीं? इसके जवाब में उन्होंने जो कहा वो ही भारत की राय है और वो ही जमकर फिर से वायरल हो रहा है.

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दोराईस्वामी ने कहा कि यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आखिर भारत करे तो क्या करे? क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था को ठप (स्विच ऑफ) कर दें सिर्फ इसलिए कि कुछ देशों को हमारी ऊर्जा नीति रास नहीं आ रही? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा अपनाया जा रहा रवैया दोहरे मापदंडों से भरा है, क्योंकि वही देश खुद उन जगहों से तेल और संसाधन खरीद रहे हैं, जहां से भारत को खरीदने पर आपत्ति जताई जा रही है.

दोराईस्वामी ने अमेरिका सहित यूरोपीय देश के दोगलेपन की खोली पोल
भारत के लंदन में उच्चायुक्त दोराईस्वामी ने यह भी स्पष्ट किया कि रूस के साथ भारत का रिश्ता केवल तेल तक सीमित नहीं है. यह संबंध दशकों पुराने रणनीतिक, सुरक्षा, और ऊर्जा सहयोग पर आधारित हैं. उन्होंने याद दिलाया कि जब पश्चिमी देश भारत को हथियार देने से कतराते थे, तब रूस ने हर मुश्किल वक्त में भारत का साथ दिया. इसके विपरीत, कुछ पश्चिमी देश भारत के दुश्मन पड़ोसियों को हथियार बेचते रहे, जो अंततः भारत की सुरक्षा के खिलाफ इस्तेमाल हुए, जबकि भारत ने कई बार इस चिंता का इजहार किया लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया, इसे इग्नोर कर दिया गया. उन्होंने साफ पूछा कि क्या भारत ने कभी कहा कि आप हमारे दोस्त हैं, अगर हमारे साझीदार हैं तो अपनी वफादारी के सबूत दें, अग्निपरीक्षा दें (लिटमस टेस्ट) पास करें, नहीं न? फिर हमें ऐसे दोराहे पर खड़े करने की क्या जरूरत.

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रूस से भारत की तेल खरीद की शुरुआत 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद और तेज़ हुई, जब पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस ने वैश्विक बाजार में भारी छूट पर कच्चा तेल बेचना शुरू किया. भारत और चीन जैसे देशों ने इस मौके का लाभ उठाते हुए सस्ती दरों पर तेल खरीदा, जिससे अपनी अर्थव्यवस्था को महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता के बीच मजबूती दी. मौजूदा समय में भारत की कुल कच्चे तेल की जरूरतों का करीब 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा रूस से पूरा हो रहा है. जुलाई में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात सालभर में सबसे उच्चतम स्तर पर रहा.

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भारत का यह रुख अब न सिर्फ उसकी ऊर्जा जरूरतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है. विक्रम दोराईस्वामी की टिप्पणी एक बार फिर यह संकेत देती है कि भारत अपनी नीतियों को बाहरी अपेक्षाओं से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और ज़मीनी हकीकतों के आधार पर तय करता रहेगा.

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