‘आपको लाइसेंस किसने दिया’ PM मोदी और गृह मंत्री पर वकील ने की FIR की मांग, CJI सूर्यकांत ने लगाई फटकार
वकील पूरन चंद्र सेन ने CAA बनाने के खिलाफ PM मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के खिलाफ FIR की मांग की थी.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई है. यह मामला नागरिकता संशोधन कानून, 2019 ( CAA ) से जुड़ा है. जिस पर वकील पूरन चंद्र ने PM और गृह मंत्री पर केस दर्ज करने के लिए याचिका दायर की थी. हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माने से रोक लगा दी थी.
याचिका को रद्द करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने वकील पूरन चंद्र की योग्यता पर सवाल उठाए हैं. CJI ने पूरन चंद्र सेन से यहां तक कह दिया कि 'इनपर कॉस्ट नहीं लगाया हाई कोर्ट ने? बैंड पहना नहीं है, लग रहा है कोई दंगल में उतरने आए हैं.’
'आपको लाइसेंस देने की गलती किसने की'
CJI सूर्यकांत ने फटकार लगाते हुए यह तक पूछ लिया कि 'कितने साल हो गए वकालत करते आपको? आपको लाइसेंस देने की गलती किसने की? प्लीज ऐसी याचिकाएं न दायर करें.' बेंच ने वकील से सवाल किया कि किस प्रक्रिया के तहत संवैधानिक पदाधिकारियों के खिलाफ संसद से कानून बनाने के लिए FIR दर्ज करने को कहा जा सकता है.
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने याचिकाकर्ता से कहा, 'आपके विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ राजनीतिक और सामाजिक मतभेद हो सकते हैं, इस मतभेद से अपराध नहीं बनता. अपराध कहां है? मुख्य सवाल यह है कि अगर संसद कोई कानून पास करती है, तो क्या यह अपराध की श्रेणी में आ सकता है? आप वकील हैं, प्लीज खुद से ही पूछिए.’
जब बेंच को पता चला कि याचिकाकर्ता वकील पूरन चंद्र सेन का रजिस्ट्रेशन पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल में हुआ है. इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा, 'ओह, तो आप पंजाब और हरियाणा (बार) से हैं? तब आपको लाइसेंस देने की गलती किसने की? उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं.’
क्या है मामला?
दरअसल, भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अदालत में राजस्थान हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई की. हाई कोर्ट ने वकील पर CAA बनाने के खिलाफ पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के खिलाफ 'बेवजह' याचिका डालने के लिए 50,000 रुपये की रकम वसूलने का आदेश दिया था.
हाईकोर्ट के जुर्माने वाले आदेश को वकील ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को जुर्माने से राहत तो दी, लेकिन कड़ी फटकार भी लगाई. साथ ही साथ ऐसी याचिकाओं को बेकार की याचिका माना.
बेंच ने वकील को यह तक कि चेतावनी दे दी थी कि वह उन पर हाई कोर्ट से लगाए गए 50,000 रुपये की रकम बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर देंगे, लेकिन वकील ने दोबारा ऐसी याचिकाएं नहीं दर्ज करने का वादा किया. इस शर्त पर सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माने पर रोक लगाने का आदेश दिया.
हालांकि इस मामले ने सुप्रीम कोर्ट को भी चिंता में डाल दिया. कोर्ट ने कहा, वकील होने के बाद भी अगर याचिकाकर्ता बेमतलब की याचिकाएं डालेगा तो इससे लीगल प्रोफेशन की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे. उन्होंने कहा, 'प्लीज इस तरह की बेकार की याचिकाएं मत फाइल कीजिए. आप वकील हैं,लोग अभी भी कानूनी बिरादरी को गंभीरता से लेते हैं. अगर आप किसी को सलाह देंगे, तो लोग उसपर भरोसा करेंगे और आप ऐसे केस फाइल करने में शामिल होंगे, तो लोग आप पर कैसे विश्वास करेंगे?'
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