1 जुलाई से पेट्रोल-डीजल खरीदने के नियम बदले, सरकार का बड़ा फैसला लागू
Petrol-Diesel Rules: ग्राहक पहले की तरह किसी तय सीमा के बिना सीधे पेट्रोल पंपो से पेट्रोल और डीजल खरीद सकेंगे. सरकार का मानना हैं कि अब देश में ईंधन की सप्लाई पहले के मुकाबले काफी बेहतर और स्थिर हो चुकी हैं ,इसलिए इस तरह की पाबंदी बनाए रखने की जरूरत नहीं रह गई.
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Petrol-Diesel Rules: 1 जुलाई से देश में पेट्रोल और डीजल खरीदने के नियमों में एक अहम बदलाव लागू हो गया हैं. केंद्र सरकार ने वह अस्थायी रोक हटा दी हैं, जिसके कारण बड़े व्यावसायिक उपभोक्ता जैसे ट्रांसपोर्ट कंपनियां, फैक्ट्रियां, उद्योग और लॉजिस्टिक्स कंपनियां खुदरा पेट्रोल पंपो से सिमित मात्रा में ही ईंधन खरीद सकती थीं. अब ये सभी ग्राहक पहले की तरह किसी तय सीमा के बिना सीधे पेट्रोल पंपो से पेट्रोल और डीजल खरीद सकेंगे.. सरकार का मानना हैं कि अब देश में ईंधन की सप्लाई पहले के मुकाबले काफी बेहतर और स्थिर हो चुकी हैं ,इसलिए इस तरह की पाबंदी बनाए रखने की जरूरत नहीं रह गई...
आखिर सरकार ने पहले यह रोक क्यों लगाई थी?
कुछ महीने पहले पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात की वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने लगी थी. इसका असर भारत पर भी पड़ने की आशंका थी, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे समय में सरकार नहीं चाहती थी कि देश में पेट्रोल और डीजल की कमी हो या आम लोगों को ईंधन खरीदने में परेशानी आए. इसी कारण बड़े व्यावसायिक खरीदारों के लिए खुदरा पेट्रोल पंपों से बड़ी मात्रा में ईंधन खरीदने पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी. इस फैसले का मकसद था कि हर जगह ईंधन की उपलब्धता बनी रहे, जमाखोरी न हो और आम लोगों को किसी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़े.
कीमतों का अंतर भी बना था बड़ी परेशानी
उस समय एक और बड़ी समस्या सामने आई थी. औद्योगिक और कमर्शियल ग्राहकों को मिलने वाला डीजल खुदरा कीमत के मुकाबले काफी महंगा पड़ रहा था. दोनों कीमतों में लगभग 40 रुपये प्रति लीटर तक का अंतर था. ऐसे में कई कंपनियों और ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों ने महंगा औद्योगिक डीजल खरीदने के बजाय सीधे पेट्रोल पंपों से सस्ता डीजल लेना शुरू कर दिया. इसका असर यह हुआ कि सरकारी पेट्रोल पंपों पर अचानक डीजल की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई, जबकि निजी कंपनियों के पंपों पर बिक्री कम होने लगी. इससे कई इलाकों में सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव भी देखने को मिला.
सरकारी तेल कंपनियों पर बढ़ गया था दबाव
देश में अधिकांश पेट्रोल पंप सरकारी तेल कंपनियों के हैं, इसलिए बढ़ती मांग का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ा. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम मिलकर देश के लगभग 90 प्रतिशत यानी एक लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप चलाती हैं. जब बड़ी संख्या में व्यावसायिक ग्राहक भी इन्हीं पंपों से ईंधन खरीदने लगे तो कई जगह डीजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया. वहीं निजी कंपनियां बाजार के हिसाब से कीमत तय कर रही थीं, इसलिए उनके यहां ग्राहकों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही.
अब क्यों हटाई गई पाबंदी?
पिछले कुछ समय में पश्चिम एशिया के हालात पहले की तुलना में काफी सामान्य हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई भी स्थिर होने लगी है. इसी वजह से सरकार को भरोसा है कि अब देश में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता को लेकर किसी तरह की बड़ी चिंता नहीं है. यही कारण है कि व्यावसायिक खरीदारों पर लगी अस्थायी पाबंदी हटा दी गई है. अब ट्रांसपोर्ट कंपनियां, फैक्ट्रियां और अन्य बड़े उपभोक्ता पहले की तरह सामान्य तरीके से खुदरा पेट्रोल पंपों से अपनी जरूरत के मुताबिक ईंधन खरीद सकेंगे.
कारोबार और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को मिलेगा फायदा
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विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उद्योग और परिवहन क्षेत्र को काफी राहत मिलेगी. कंपनियों को अब ईंधन खरीदने के लिए अलग व्यवस्था करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां पहले की तरह आसानी से चल सकेंगी. साथ ही बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी और ईंधन वितरण व्यवस्था पहले से ज्यादा सुचारु होने की उम्मीद है. कुल मिलाकर 1 जुलाई से लागू हुआ यह बदलाव सिर्फ उद्योगों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ईंधन वितरण सिस्टम के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है.