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भारत के मदरसों में पाकिस्तान की एंट्री, मौलाना रच रहा था युवाओं के खिलाफ बड़ी साजिश, गिरफ्तारी के बाद हुए कई बड़े खुलासे
जांच एजेंसियों ने भारत में टारगेट किलिंग की पाकिस्तान की साजिश का खुलासा किया है, जिसमें बिहार के एक मदरसा टीचर इजहारुल हक को गिरफ्तार किया गया है..
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ATS: जांच एजेंसियो की हालिया कार्यवाई में एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जो देश के युवाओं को बहकाकर और उन्हें जोड़कर नेपाल के रास्ते पाकिस्तान भेजने की योजना बना रहा था..ख़ुफ़िया सूत्रों के मुताबिक यह पूरा नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था, जिसमें अलग अलग लोगों को अलग -अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं...
कौन-कौन आया गिरफ्त में
इस मामले में मधुबनी से इजहारुल हक की गिरफ्तारी हुई है, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि उसे पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों से सीधे निर्देश मिल रहे थे. उसका काम था देश के अलग-अलग हिस्सों में युवकों को इस नेटवर्क से जोड़ना और उनके पासपोर्ट बनवाकर उन्हें आगे नेपाल भेजने की व्यवस्था करना.
इसके अलावा उत्तर प्रदेश के देवबंद से नईम अब्दुल्ला और मध्य प्रदेश के भोपाल से फराज उर्फ खालिद सैफुल्ला को भी इस नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है.. जांच एजेंसियों का कहना है कि इन सभी को अलग-अलग काम सौंपे गए थे ताकि पूरा सिस्टम बिना शक के चलता रहे..
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नेपाल के रास्ते पाकिस्तान भेजने की योजना
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क का मकसद युवकों को पहले नेपाल तक पहुंचाना था. वहां पहले से मौजूद एजेंट उनकी मदद करते और फिर आगे उन्हें पाकिस्तान भेजने की योजना थी. इजहारुल पर आरोप है कि वह बिहार के कई जिलों में इस नेटवर्क को फैलाने का काम कर रहा था और लोगों को इसमें शामिल करने की कोशिश कर रहा था.
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टारगेट किलिंग की भी साजिश का दावा
जांच एजेंसियों के अनुसार यह मामला सिर्फ लोगों को बाहर भेजने तक सीमित नहीं था. पूछताछ में यह भी सामने आया है कि कुछ युवकों को आगे चलकर टारगेट किलिंग जैसे गंभीर अपराधों में इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी. बताया जा रहा है कि संभावित निशानों की जानकारी और तस्वीरें व्हाट्सऐप के जरिए भेजी जानी थीं. फराज ने पूछताछ में यह भी स्वीकार किया कि उसे पाकिस्तान से निर्देश मिलते थे और उसी के कहने पर उसने पासपोर्ट तैयार करवाया था.
डिजिटल नेटवर्क और ऑनलाइन संपर्क
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एटीएस की जांच में यह भी सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा था. गूगल मीट जैसे माध्यमों पर कथित रूप से युवकों को जोड़ा जाता था और उन्हें विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश की जाती थी.
जांच में यह भी कहा गया है कि कुछ प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े कथित एजेंडे और संदेशों का जिक्र कर युवाओं को प्रभावित किया जा रहा था, ताकि वे धीरे-धीरे इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाएं.
मोबाइल से मिले अहम डिजिटल सबूत
तीनों आरोपियों के मोबाइल फोन की जांच में कई तरह की संदिग्ध सामग्री मिलने की बात सामने आई है. इसमें कुछ विदेशी मौलवियों के भाषण, पुराने आतंकी नेटवर्क से जुड़े ऑडियो-वीडियो और अन्य आपत्तिजनक सामग्री शामिल बताई जा रही है. इन सभी डिजिटल सबूतों की फोरेंसिक जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क का असली विस्तार कितना बड़ा है.
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आगे की जांच जारी
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अधिकारियों का मानना है कि यह सिर्फ शुरुआत हो सकती है और पूछताछ के आधार पर इस पूरे नेटवर्क से जुड़े और भी लोगों की पहचान सामने आ सकती है. जांच एजेंसियां अब इस बात पर ध्यान दे रही हैं कि इस साजिश के पीछे असली मास्टरमाइंड कौन हैं और यह नेटवर्क कितनी दूर तक फैला हुआ है.