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भारत बनाने जा रहा अपना पहला न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर INS विशाल, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ाएगा ताकत

भारत अपनी नौसेना को और ताकतवर बनाने जा रहा है. भारतीय नौसेना अपना पहला परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत (Nuclear Powered Aircraft Carrier) विकसित करने जा रहा है. इसका नाम INS विशाल है.

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09 Sep 2025
( Updated: 11 Dec 2025
08:27 AM )
भारत बनाने जा रहा अपना पहला न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर INS विशाल, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ाएगा ताकत
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6 अगस्त 2025 को रक्षा मंत्रालय ने 15 साल की योजना टेक्नोलॉजी पर्सपेक्टिव एंड कैपेबिलिटी रोडमैप 2025 (TPCR-2025) जारी की. यह योजना भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला करने के लिए तैयार करेगी. 

INS विशाल भारत का तीसरा विमानवाहक पोत होगा

INS विशाल स्वदेशी विमानवाहक-3 (IAC-3) भी कहा जाता है. भारत का तीसरा विमानवाहक पोत होगा. यह कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में बनेगा और परमाणु ऊर्जा से चलेगा. इसका वजन 65 से 75 हजार टन होगा, लंबाई 300 मीटर और गति लगभग 55 किमी/घंटा होगी. यह 55 विमानों को ले जा सकेगा, जिसमें 40 फिक्स्ड-विंग (लड़ाकू विमान) और 15 रोटरी-विंग (हेलीकॉप्टर) होंगे. इसका नाम ‘विशाल’ संस्कृत में ‘विशालकाय’ का प्रतीक है. यह भारत को अमेरिका और फ्रांस के बाद तीसरा देश बनाएगा, जो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत संचालित करता है.

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हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ाएगा ताकत 

INS विशाल, यह बिना ईंधन भरे महीनों तक समुद्र में रह सकता है, जिससे आपूर्ति की जरूरत कम होती है. परमाणु रिएक्टर 500-550 मेगावाट बिजली बनाएंगे, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS), लेजर हथियार और सेंसर जैसे आधुनिक उपकरणों को चलाएंगे. यह भारी लड़ाकू विमान, ड्रोन और हवाई चेतावनी विमान (AEW&C) को लॉन्च कर सकता है. परमाणु ऊर्जा से ज्यादा उड़ानें और लंबे समय तक हवाई कवरेज संभव है. ये फायदे INS विशाल को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की ताकत बढ़ाने में मदद करेंगे, खासकर चीन और पाकिस्तान के खिलाफ.

INS विशाल की खासियतें 

TPCR-2025 के अनुसार, INS विशाल में ये आधुनिक तकनीकें होंगी- 

EMALS - यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम भारी विमानों को आसानी से उड़ाने में मदद करेगा. DRDO इसे स्वदेशी रूप से विकसित कर रहा है. 400 किलो तक के प्रोटोटाइप का परीक्षण हो चुका है. भविष्य में यह 40 टन तक के विमानों को लॉन्च करेगा. 

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ऑटोमैटिक लैंडिंग सिस्टम: यह विमानों को सुरक्षित उतारने में मदद करेगा. 

फ्रेनेल ऑप्टिकल लैंडिंग सिस्टम: पायलटों को लैंडिंग में सहायता देगा. 

कॉम्बैट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर: विमानों को नियंत्रित करने और युद्ध में दिशा देने के लिए

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INS विशाल का हवाई दस्ता विविध और आधुनिक होगा... 

राफेल-मरीन: अप्रैल 2025 में भारत ने फ्रांस से 26 राफेल-मरीन विमान खरीदने का सौदा किया, जिसकी कीमत 63,000 करोड़ रुपये है. ये 2030 तक INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत पर तैनात होंगे. 

TEDBF: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा बनाया जा रहा ट्विन इंजन डेक-बेस्ड फाइटर, जो 2030 के दशक में सेवा में आएगा. 

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LCA नेवी: तेजस का नौसैनिक संस्करण, जो प्रशिक्षण के लिए उपयोगी हो सकता है. 

ड्रोन: मानवरहित कॉम्बैट ड्रोन (UCAV) जो जोखिम भरे मिशनों के लिए होंगे.

भारत के पास अभी दो विमानवाहक पोत हैं 

INS विक्रमादित्य: रूस से खरीदा गया. 2013 में सेवा में आया. इसे 2020-22 और 2024 में अपग्रेड किया गया. 

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INS विक्रांत: भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक. 2022 में सेवा में आया. यह 40000 टन का है. 30 विमान ले जा सकता है. ये दोनों 2023 में डबल-कैरियर ड्रिल, मालाबार (अमेरिका के साथ) और वरुणा (फ्रांस के साथ) जैसे अभ्यासों में हिस्सा ले चुके हैं. लेकिन ये पारंपरिक ईंधन से चलते हैं, जिससे उनकी सीमा और शक्ति सीमित है.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती ताकत ने भारत को INS विशाल जैसा पोत बनाने के लिए प्रेरित किया है... 

चीन की चुनौती: चीन के पास दो विमानवाहक लियाओनिंग और शांडोंग हैं. तीसरा फुजियान, EMALS के साथ तैयार हो रहा है. चीन परमाणु-संचालित पोत भी विकसित कर रहा है. 

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पाकिस्तान की पनडुब्बियां: पाकिस्तान चीन से 8 हंगोर-क्लास पनडुब्बियां खरीद रहा है, जो भारत के समुद्री क्षेत्र में खतरा बढ़ाएंगी. तीन पोत की जरूरत: भारत चाहता है कि तीन विमानवाहक हों ताकि दो हमेशा सक्रिय रहें. एक पोत रखरखाव में हो तो बाकी दो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तैनात रह सकें.

INS विशाल का निर्माण आसान नहीं होगा

परमाणु रिएक्टर: भारत के पास अरिहंत पनडुब्बी के लिए 83 MW का रिएक्टर है, लेकिन INS विशाल को 500-550 MW की जरूरत है. इसे विकसित करने में 15-20 साल और भारी खर्च लगेगा. 

लागत: इसकी लागत 10-12 बिलियन डॉलर (लगभग 80,000-1,00,000 करोड़ रुपये) हो सकती है, जो भारत के रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा है. 

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समय: निर्माण और परीक्षण में 12-15 साल लग सकते हैं, यानी यह 2030 के दशक के अंत तक तैयार होगा. 

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वैकल्पिक योजना: अगर परमाणु रिएक्टर में देरी हुई, तो भारत गैस टरबाइन और इलेक्ट्रिक प्रणोदन प्रणाली का उपयोग कर सकता है, जैसा कि ब्रिटेन और अमेरिका के साथ सहयोग से हो रहा है.

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