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'चुप्पी कायरता नहीं सोची-समझी रणनीति...', ईरान पर मोदी सरकार के स्टैंड को शशि थरूर का समर्थन, कांग्रेस परेशान!

Iran-Israel War के बीच मोदी सरकार की मल्टी अलाइनमेंट और खामोशी वाली नीति का शशि थरूर ने समर्थन किया है. उन्होंने जो स्टैंड और दलीलें दी हैं, वो भी केरल चुनाव से पहले वो कांग्रेस को परेशान और चिंता बढ़ाने के लिए काफी है.

PM Modi And Shashi Tharoor (File Photo)
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खाड़ी के देशों में ईरान के हमलों के बीच पैदा हुए हालात के बीच भारत में भी सियासत गर्म है. कांग्रेस और विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है कि वो खुलकर ईरानी सरकार का साथ क्यों नहीं दे रही है और अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा क्यों नहीं कर रही है. बीते दिनों कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी ने आर्टिकल लिखकर खामेनेई की मौत पर चुप्पी को लेकर सरकार की आलोचना की थी और कथित तौर पर अपनी संप्रभु विदेश नीति से पीछे हटने की निंदा की थी. हालांकि कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस पूरे मामले पर केंद्र द्वारा अपनाई जा रही रणनीति पर अपनी पार्टी से अलग रुख अख्तियार किया है. 

आपको बता दें कि इजरायल के ईरान पर हमले से पहले पीएम मोदी का तेल अवीव दौरा भी विवादों में था. कांग्रेस ने खामेनेई की मौत के बाद सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और देश की खामोशी 'भारत के पुराने सिद्धांतों और राष्ट्रीय हितों के साथ धोखा' है. वहीं थरूर ने अपनी पार्टी की आधिकारिक राय से इतर भारत की मौजूदा नीति का बचाव किया है. उन्होंने अपने लेख में कहा कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में चुप्पी साधना 'नैतिक हार' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदार स्ट्रैटेजी' है.

मोदी सरकार की नीति का थरूर ने किया समर्थन!

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अंग्रेजी अखबार इंडियन एकसप्रेस में लिखे लेख में शशि थरूर ने भारत की एहतियात, चुप्पी और धैर्य वाली नीति का बचाव करते हुए कहा कि जिन्हें सरकार की चुप्पी कायरता लग रही है, वो कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की चुनौतियों और मुश्किलों को नहीं समझते. उन्होंने मौजूदा दौर में सरकार द्वारा अपनाई जा रही मल्टी-अलाइनमेंट की नीति का समर्थन किया और कहा कि मौजूदा दौर में सभी वैश्विक शक्तियों, ग्लोबल स्टेक होल्डर्स के साथ संतुलन बनाकर रखना ही भारत के दूरगामी हित में है.

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'चुप्पी कायरता नहीं रणनीति'

थरूर ने आगे कहा कि, 'बिना किसी बड़े प्रभाव के चुप्पी साधना भी एक रणनीति हो सकती है.' हालांकि शशि थरूर ने ये भी माना कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इस युद्ध को सही नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने ये भी कहा कि हमेशा से संप्रभुता और शांति से समाधान निकालने के सिद्धांतों के पक्ष में रहा है, जिसका कि ये युद्ध सरासर खिलाफ है.

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'विदेश नीति किताबी सिद्धांतों से नहीं चलती'

थरूर ने अपने लेख में ये भी कहा कि विदेश नीति एक टेक्स्ट बुक फॉर्मेट की तरह नहीं चलती और ना ही ये किसी 'अकादमिक सेमिनार' की तरह होती है, जहां सिर्फ विदेश नीति-ग्लोबल ऑर्डर के सिद्धांतों पर बात हो. उन्होंने आगे कहा कि इसमें सरकार का लिया फैसला देश और करोड़ों लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डाल सकता है. उन्होंने ये भी कहा कि मोदी सरकार को टकराव पैदा करने, संबंध खराब करने की बजाय चुप्पी के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. उन्होंने भारत के मौजूदा हालात में फूंक-फूंककर कदम रखने के पीछे की वजहों को जायज ठहराया और कहा कि कैसे ये नीति अपने हित को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है.

खाड़ी में अपने लोगों की सुरक्षा का ध्यान दे रहा भारत

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उन्होंने आगे कहा कि खाड़ी के देशों से भारत के हित जुड़े हैं. प्रधानमंत्री मोदी की इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बात हुई है. उन्होंने आगे कहा कि करीब 90 लाख भारतीय रोजगार और काम के सिलसिले में इन देशों में रहते हैं. उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है. और इन देशों से रेमिटेंस के रूप में आने वाला पैसा भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.

'खाड़ी देशों पर भारत की निर्भरता, टकराव पैदा नहीं कर सकते'

इतना ही नहीं भारत की अपनी ऊर्जा जरूरतें हैं. LPG, तेल, PNG सहित अन्य उर्जा जरूरतों के लिए भारत खाड़ी देशों निर्भर है. ऐसे में उनके साथ संबंध खराब करना वो किसी भी तरीके से बुद्धिमानी नहीं. इतना ही नहीं इस क्षेत्र में अस्थिरता भारत के आर्थिक विकास को पटरी से उतार सकती है. ऐसा इसलिए कि इस क्षेत्र से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है.

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शशि थरूर ने इशारों ही इशारों में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांंधी को याद दिलाया कि कैसे भारत के राष्ट्रहित विदेश नीति के सिद्धांतों से ऊपर रहे हैं. और ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने ऐसा पहली बार किया है. थरूर की मानें तो जिन्हें भारक की विदेश नीति का फाउंडिंग फादर माना जाता था उन्होंने भी देश के हित को प्राथमिकता दी थी. मसलन नेहरू-इंदिरा के दौर में भी भारत ने कई बार राष्ट्रीय हितों को विदेश नीति के कथित सिद्धांतों के ऊपर प्राथमिकता दी है. 

'भारत ने पहले भी सिद्धांतों पर अपने राष्ट्रहित को दी है प्राथमिकता'

बकौल थरूर 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमलों के समय भी भारत ने खुलकर इसकी निंदा नहीं की थी. इसकी साफ-साफ वजह ये थी कि उस समय सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्ति करने वाला और रणनीतिक साझेदार था. कुल मिलाकर थरूर ने ये बात कही कि आज भी वही तर्क यूक्रेन युद्ध और ईरान पर हो रहे हमलों पर लागू होता है, जो पहले लागू होते थे.

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