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कर्नल सोनम वांगचुक: भारतीय सेना की स्मृतियों में अमर रहेगा 'लद्दाख के शेर' का अदम्य साहस

महा वीर चक्र से सम्मानित कर्नल सोनम वांगचुक के निधन से न केवल लद्दाख स्काउट्स में, बल्कि पूरी सेना में भी गहरा खालीपन महसूस हो रहा है. वह साहस, समर्पण और आंतरिक शक्ति का साक्षात अवतार थे. सेना के एक आदर्श सैनिक के रूप में उनकी पहचान उनके सरल आचरण, अडिग कर्तव्यनिष्ठा और अपने जवानों व जमीन से गहरे जुड़ाव के कारण थी.

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भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास के एक सुनहरे अध्याय का अंत हो गया है. महा वीर चक्र (MVC) से सम्मानित कर्नल सोनम वांगचुक के निधन से न केवल लद्दाख स्काउट्स में, बल्कि पूरी सेना में भी गहरा खालीपन महसूस हो रहा है. कर्नल वांगचुक ने 10 अप्रैल 2026 को अंतिम सांस ली, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई विरासत और वीरता की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी.

पदक ही नहीं, चरित्र से मिली पहचान

कर्नल सोनम वांगचुक को केवल एक युद्ध नायक या डेकोरेटिड ऑफिसर के रूप में याद नहीं किया जाता. बल्कि वे साहस, समर्पण और आंतरिक शक्ति का साक्षात अवतार थे. सेना के एक आदर्श सैनिक के रूप में उनकी पहचान उनके सरल आचरण, अडिग कर्तव्यनिष्ठा और अपने जवानों व जमीन से गहरे जुड़ाव के कारण थी. उनके निधन के बाद उमड़ रहे श्रद्धांजलियों के सैलाब उनके शानदार व्यक्तित्व की गवाही दे रहे हैं.

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कारगिल युद्ध: जब बटालिक सेक्टर में दिखाया अदम्य साहस

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सैन्य स्मृतियों में उनका नाम दशकों पहले दर्ज हो चुका था. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, तत्कालीन मेजर सोनम वांगचुक ने बटालिक सेक्टर की बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अपने जवानों का नेतृत्व किया था. उनके इसी अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'महा वीर चक्र' से सम्मानित किया गया था. लेकिन, उनकी पहचान केवल पदकों तक सीमित नहीं थी; उन्होंने आग के बीच नेतृत्व करने, खतरे में शांत रहने और मिशन को खुद से ऊपर रखने का जो उदाहरण पेश किया, वही उन्हें सबसे अलग बनाता है.

जनरल उपेंद्र द्विवेदी के साथ अटूट रिश्ता

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कर्नल वांगचुक के प्रति सम्मान वरिष्ठ नेतृत्व के उनके साथ व्यवहार के तरीके में दिखाई देता था. वर्तमान सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी, स्वयं उत्तरी क्षेत्र में गहरे अनुभव वाले अधिकारी हैं और कर्नल वांगचुक के लिए उनके मन में बहुत सम्मान था. दरअसल, जनरल द्विवेदी जब भी लद्दाख जाते थे, तो कर्नल वांगचुक से मिलना ज़रूर सुनिश्चित करते थे.

इन दोनों सैन्य दिग्गजों के बीच का रिश्ता पेशेवर से कहीं अधिक व्यक्तिगत था. सेवानिवृत्ति के वर्षों बाद भी इस तरह का सम्मान मिलना यह दर्शाता है कि पद जिम्मेदारी तय कर सकते हैं, लेकिन सम्मान केवल चरित्र से अर्जित किया जाता है. वे कनिष्ठों द्वारा सराहे गए, साथियों द्वारा सम्मानित किए गए और वरिष्ठ कमांडरों द्वारा हमेशा याद किए गए.

सेना की यादों में 'लद्दाख का सपूत'

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कर्नल वांगचुक के निधन पर भारतीय सेना के शब्द सरल, लेकिन बहुत कुछ कहने वाले थे. सेना ने उन्हें एक बहादुर सैनिक, प्रतिबद्ध और समर्पित नेतृत्वकर्ता और लद्दाख का एक ऐसा सपूत बताया जिनका जीवन साहस, सेवा और एकता का प्रतीक था. ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति हैं जो उन्होंने अपने पीछे छोड़ा है.

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कर्नल सोनम वांगचुक अब यादों का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन एक सैनिक के रूप में उनका उदाहरण आज भी सेना की जीवित स्मृतियों में गूंज रहा है. लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर उनकी वीरता की कहानियां हमेशा अमर रहेंगी.

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