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‘आधी सदी पुराना मामला, किसकी जांच की जाएगी…’ सोनिया गांधी से जुड़े वोटर लिस्ट मामले में कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोनिया गांधी से जुड़े वोटर लिस्ट गड़बड़ी के मामले में सुनवाई की. इस दौरान उन्होंने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, आप जो जानकारी दे रहे हैं, वह सिर्फ नाम जोड़ने और हटाने की परिस्थितियों तक सीमित है.

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दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के खिलाफ दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई की. इस याचिका में सोनिया गांधी पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले ही धोखाधड़ी कर वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करवाया. 

सुनवाई के दौरान राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से कई सवाल पूछे. कोर्ट ने कहा कि यह मामला लगभग आधी सदी पुराना है और आप FIR दर्ज करने की मांग कर रहे हैं. जांच किस स्तर पर और कैसे होगी? कोर्ट ने यह भी पूछा कि आप मामले का दायरा बढ़ा रहे हैं. 

कब होगी मामले की अगली सुनवाई? 

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अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी से कहा कि आज आप जो जानकारी दे रहे हैं, वह सिर्फ नाम जोड़ने और हटाने की परिस्थितियों तक सीमित है. राउज एवेन्यू कोर्ट इस मामले में अब अगली सुनवाई 18 अप्रैल को करेगा. 

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दरअसल, सोनिया गांधी के खिलाफ बिना भारतीय नागरिकता और वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने की कथित जालसाजी की शिकायत की गई है. याचिकाकर्ता ने इसकी जांच कराने और मुकदमा दर्ज करने की मांग की है. याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी बहस पूरी कर दी, लेकिन सोनिया गांधी की तरफ से दलीलें पूरी नहीं हो सकीं. 

सोनिया गांधी के खिलाफ क्या है मामला? 

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याचिकाकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी ने कोर्ट में बताया कि यह एक विदेशी नागरिक की ओर से की गई गलत घोषणा का मामला है. उन्होंने अदालत को बताया कि वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की मतदाता सूची में केवल जाली दस्तावेजों या धोखाधड़ी के जरिए ही शामिल किया जा सकता था. 

वकील ने कहा कि उन्होंने मतदाता सूची की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं और उन्हें उपलब्ध भी कराई गई हैं. उन्होंने दावा किया कि प्रथम दृष्टया गलत घोषणा साबित होता है, इसलिए जाली दस्तावेजों और जालसाजी की जांच होनी चाहिए. 

याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी, लेकिन उनका नाम 1980 की नई दिल्ली की मतदाता सूची में पहले से शामिल था. 
याचिका के अनुसार 1982 में उनका नाम सूची से हटा दिया गया था. जब 1983 में नागरिकता मिली, तब यह सवाल उठाया गया कि 1980 में नाम शामिल कराने के लिए कौन से दस्तावेज पेश किए गए थे और क्या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ था. 

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याचिका में सोनिया गांधी की ओर से क्या कहा गया? 

कोर्ट ने सोनिया गांधी के वकील से पूछा कि आप इस मुद्दे को कैसे सही ठहराएंगे कि वह 1980 में मतदाता सूची में थीं, जबकि वह 1983 में नागरिक बनीं. यह फंडामेंटल मुद्दा है. इस पर सोनिया गांधी के वकील ने कहा कि क्या इस बात का कोई सबूत है कि आवेदन करने से पहले वह नागरिक थीं? क्या कोई व्यक्ति आवेदन दाखिल करने से पहले नागरिक नहीं हो सकता? कोर्ट ने वकील से साफ तौर पर कहा था कि आप जो मांग कर रहे हैं, वह चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ एक आवारा और मछली पकड़ने जैसी जांच है. 

पिछली सुनवाई में सोनिया गांधी की तरफ से जवाब दाखिल कर याचिका को तथ्यहीन, राजनीतिक रूप से प्रेरित और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया गया था. सितंबर 2025 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद विकास त्रिपाठी ने रिवीजन पिटीशन दायर की. 

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दरअसल, वकील विकास त्रिपाठी की ओर से दायर यह रिवीजन पिटीशन, अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया के आदेश को 11 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई है.

मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दी थी याचिका 

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मजिस्ट्रेट ने उस शिकायत को खारिज कर दिया था, जिसमें मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम कथित तौर पर गलत तरीके से शामिल किए जाने के मामले में पुलिस जांच और FIR की मांग की गई थी. आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम उनको भारत की नागरिकता मिलने से पहले ही 1980 में वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया गया था. इसके लिए फर्जीवाड़ा किया गया. हालांकि तत्कालीन विरोध के बाद 1982 में नाम हटा दिया गया. 

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