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सबरीमाला केस: 'अछूत नहीं हो सकतीं महिलाएं', SC जज की टिप्पणी, पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सरकार बोली- परिभाषा ही गलत है

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की जज बी.वी. नागरत्ना ने एक महिला होने के नाते अपनी बात कही. उन्होंने कहा, माहवारी के तीन दिनों के दौरान हर महीने महिला को अछूत नहीं बनाया जा सकता.

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Sabarimala Case: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की. इस दौरान धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव, उनके प्रवेश पर रोक और धार्मिक स्वंतत्रता से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई. 9 जजों की बेंच ने सबरीमाला केस में सुनवाई की.  

सुनवाई के दौरान बेंच के सामने पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भी सवाल उठा. जिस पर सीनियर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने महिलाओं को पीरियड्स में कैसे अछूत समझा जाता है. इसका जिक्र करते हुए लैंगिक भेदभाव का मुद्दा उठाया. 

सबरीमाला पर सुनवाई में पितृसत्तात्मक सोच का मुद्दा कैसे उठा? 

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9 जजों की बेंच ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं. 

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शीर्ष अदालत में पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सवाल उठा तो केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत में इसकी परिभाषा पर बात की. उन्होंने कहा, यह पश्चिमी देशों की अवधारणा है और इसे भारत के संदर्भ में बिल्कुल वैसा ही नहीं लागू नहीं किया जा सकता. तुषार मेहता ने कहा, 

‘भारत में तो महिलाओं का दर्जा काफी ऊंचा और अलग है. यहां महिलाओं को समान अधिकार हैं. इसके अलावा उन्हें और ऊंचा ही स्थान मिला है. भारत में महिलाएं बराबर ही नहीं ऊंचे दर्जे पर हैं.’

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‘पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर परिभाषा ही गलत’

सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा, भारत में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का दर्जा नहीं है बल्कि उन्हें और ऊंचा स्थान मिलता है. कई ऐसे अदालत के फैसले हैं, जिनमें पितृसत्तात्मक समाज की बात की गई है और एक तरह के जेंडर स्टीरियोटाइप उनमें दिखता है. लेकिन भारत का मामला अलग है. भारत के समाज में हम महिलाओं की पूजा करते हैं. भारत के राष्ट्रपति हों, प्रधानमंत्री हों या फिर सुप्रीम कोर्ट के जज हों, सभी देवियों के आगे सिर झुकाते हैं. उनकी पूजा करते हैं. इसलिए भारत में पितृसत्ता की परिभाषा उस तरह से लागू नहीं होती, जैसी पश्चिमी देशों में है. 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता आगे कहा, पहले के फैसलों में मंदिरों के प्रवेश में भेदभाव की जब बात होती थी तो जातिगत आधार पर किसी को एंट्री ना मिलने को गलत माना जाता था. कभी भी लैंगिक आधार पर इस विषय को लेकर बात नहीं हुई. उन्होंने कहा, 'दुर्भाग्य से इतिहास के एक दौर में ऐसा हुआ कि हिंदू समाज के ही एक हिस्से को पूजा का अधिकार नहीं था. किंतु लैंगिक भेदभाव नहीं था, लेकिन बीते कुछ दशकों में ऐसी स्थिति बनी है कि हर मामले को लैंगिक नजरिए से देखा जाने लगा है. संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है. आर्टिकल 15 कहता है कि लैंगिक पहचान से इतर सभी के मूल अधिकार बराबर हैं.’

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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सबरीमाला केस में 2018 के एक फैसले को लेकर भी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा, उस फैसले में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न मिलने की तुलना छुआछूत जैसी है. भारत में पितृसत्तात्मक समाज की जो परिभाषा दी जाती है, वह पश्चिम से आई है. भारत में ऐसा नहीं है. इसलिए पश्चिम के नजरिए से देखना भी एक समस्या है. 

जस्टिस नागरत्ना ने क्यों याद दिलाया आर्टिकल 17? 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने जस्टिस के साथ एक महिला होने के नाते अपनी बात कही. उन्होंने कहा कि मैं महिला के नाते अपनी बात रखना चाहूंगी. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा, 'मैं एक महिला के तौर पर कहूं तो माहवारी के तीन दिनों के दौरान हर महीने महिला को अछूत नहीं बनाया जा सकता. फिर चौथे दिन यह खत्म हो जाता है. यह कड़वी हकीकत है. उन्होंगे कहा, 

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‘एक महिला के तौर पर कहूं तो ‘आर्टिकल 17’ तीन दिन के लिए अप्लाई नहीं होता और फिर चौथे दिन कहा जाए कि अछूत वाली कोई बात ही नहीं है.’

इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सबरीमाला मंदिर का मामला लैंगिक भेदभाव वाला नहीं है. यह मान्यता का विषय है और इसे उसी नजरिए से देखना चाहिए. 

सबरीमाला केस की सुनवाई में क्या-क्या हुआ? 

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सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली सुनवाई से पहले दाखिल विस्तृत लिखित दलीलों में केंद्र ने साफ कहा कि यह मामला केवल लैंगिक समानता का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा का है. केन्द्र सरकार ने कहा है कि धार्मिक प्रथाओं को आधुनिकता या तर्क के पैमाने पर न परखा जाए. 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए दाखिल हलफनामे में कहा गया कि धार्मिक प्रथाओं को तर्कसंगतता, आधुनिकता या वैज्ञानिकता जैसे मानकों पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा.

केंद्र के अनुसार, ऐसा करने से अदालतें अपने दार्शनिक विचारों को धर्म के आंतरिक सिद्धांतों पर थोप देंगी, जो संविधान के अनुरूप नहीं है. सरकार ने कहा कि यह जांच करना कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं, संवैधानिक समीक्षा का हिस्सा नहीं हो सकता। दलील में कहा गया कि न्यायाधीश न तो धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित हैं और न ही वे धार्मिक-थियोलॉजिकल प्रश्नों का निर्णय लेने के लिए संस्थागत रूप से सक्षम हैं. 

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केंद्र ने 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' के सिद्धांत पर भी सवाल उठाए हैं. केंद्र सरकार का कहना है कि किसी प्रथा की अनिवार्यता तय करने का अधिकार अदालतों के बजाय संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए. यह निर्णय उनकी परंपरा, शास्त्र और आस्था के आधार पर होना चाहिए. अदालत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर. 

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर सरकार ने क्या तर्क दिया? 

केंद्र ने दाखिल अपने जवाब में कहा कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा की पूजा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ (शाश्वत ब्रह्मचारी) के रूप में होती है. महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इस स्वरूप से जुड़ा है. यह प्रतिबंध किसी भेदभाव का नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा है. देवता के गुणों और स्वरूप की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती है. 

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केंद्र सरकार ने कहा कि अदालतें किसी देवता के स्वरूप या उसकी विशेषताओं को ‘गैर-जरूरी’ या ‘अतार्किक’ घोषित नहीं कर सकतीं. 

केंद्र सरकार के जवाब में कहा गया है कि देवता के 'न्यायिक व्यक्तित्व' को कानूनी मान्यता प्राप्त है. ऐसी स्थिति में, अदालतों को किसी संप्रदाय की व्याख्या को ही अंतिम मानना चाहिए. अगर अदालत धार्मिक परंपराओं को 'अनिवार्य' और 'गैर-अनिवार्य' श्रेणियों में विभाजित करती है, तो यह श्रद्धालुओं की आस्था को त्रुटिपूर्ण ठहराने जैसा होगा. 

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केंद्र सरकार ने 2018 के पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताते हुए कहा कि उस निर्णय में भगवान अयप्पा के 'ब्रह्मचर्य स्वरूप' की आवश्यकता का परीक्षण किया गया था. सरकार का तर्क है कि ऐसा दृष्टिकोण अदालत को धार्मिक विवादों में ‘थियोलॉजिकल आर्बिटर’ की भूमिका में खड़ा कर देता है, जबकि संविधान अदालतों को ऐसी कोई भूमिका प्रदान नहीं करता. 

 

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