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कहां है चमत्कारी सिद्ध नरसिंह मंदिर, यहां दर्शन से सारी मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं, भक्तों के सभी कष्ट भी होते हैं दूर

भगवान नरसिंह की आराधना करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां भगवान विष्णु के उग्र अवतार नरसिंह जी की शक्ति आज भी जागृत रूप में मौजूद है, जो अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहती हैं.

Image Credits:@pushkardhami/X
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 देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों की धरा है, जहां हर मंदिर के पीछे एक अद्भुत कहानी और इतिहास विख्यात है. ऐसा ही एक रहस्यमयी और चमत्कारी सिद्धपीठ 'श्री सिद्ध नरसिंह मंदिर', जो प्राकृतिक सुंदरता और शांति का अनूठा संगम है.

 सच्ची श्रद्धा से प्रार्थना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं

स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां पर दर्शन और सच्ची श्रद्धा से प्रार्थना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है. मंदिर की भव्यता का बखान दूर दूर सुनने को मिलता है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक ने इस मंदिर की भव्यता पर कुछ शब्द कहे. साथ ही, सभी से मंदिर के दर्शन करने के लिए भी कहा.

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सीएम धामी ने मंदिर का वीडियो शेयर कर क्या कहा?

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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का खास वीडियो पोस्ट कर लिखा, "चंपावत जिले में मौजूद श्री सिद्ध नरसिंह मंदिर आस्था, प्रकृति और पहाड़ी संस्कृति का एक खूबसूरत संगम है. यह पवित्र जगह घने ओक के जंगलों से घिरी हुई है, जहां के शांत माहौल में हिमालय की शानदार चोटियों की झलक मिलती है. साल भर भक्त इस मंदिर में आते हैं, जबकि नवरात्रि के दौरान यहां खास धार्मिक कार्यक्रम होते हैं. चंपावत आने पर, इस भव्य मंदिर में जरूर दर्शन करें."

यहां भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं

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मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान नरसिंह की आराधना करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां भगवान विष्णु के उग्र अवतार नरसिंह जी की शक्ति आज भी जागृत रूप में मौजूद है, जो अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहती हैं.

इस प्राचीन स्थल का भव्य पुनर्निर्माण किया गया

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यह ऐतिहासिक मंदिर मूल रूप से कूर्मांचल (कुमाऊं) के चंद राजाओं के शासनकाल के दौरान बनवाया गया था. समय के साथ पुराने मंदिर का जीर्णशीर्ण हो चुका ढांचा भक्तों की श्रद्धा का केंद्र बना रहा. इसके बाद आसपास के 22 से अधिक गांवों के ग्रामीणों ने एकजुट होकर तन, मन और धन से श्रमदान किया. लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से इस प्राचीन स्थल का भव्य पुनर्निर्माण किया गया.

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