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Raksha Bandhan 2026: शिवभक्तों की आस्था का केंद्र मणिमहेश कैलाश, रक्षाबंधन पर दिव्य रोशनी से जगमगाता है पर्वत, भोलेनाथ को ऐसे करें प्रसन्न

मणिमहेश कैलाश पर्वत को लेकर मान्यता है कि यहां भोलेनाथ स्वयं निवास करते हैं और उनके मस्तक पर स्थित 'मणि' रूपी किरण आज भी भक्तों को अलौकिक अनुभूति करवाती है. मणिमहेश को भगवान शिव के पांच प्रमुख कैलाश स्थलों में से एक माना जाता है.

Raksha Bandhan 2026: शिवभक्तों की आस्था का केंद्र मणिमहेश कैलाश, रक्षाबंधन पर दिव्य रोशनी से जगमगाता है पर्वत, भोलेनाथ को ऐसे करें प्रसन्न
Image Credits: AI/Canva/IANS
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हिमाचल प्रदेश कीअलौकिक वादियों में भगवान शिव का अलौकिक स्थान देखने को मिलता है. हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच समुद्र तल से लगभग 13, 000 फीट ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत तमाम भक्तों की आस्था का प्रतीक है. मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन साधु-संतों का पहला जत्था मणिमहेश में अपनी पूजा संपन्न करते हैं.

इस समय पर्वत से दिव्य प्रकाश की झलक देखने को मिलती

पौराणिक परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन के पवित्र दिन पर साधु-संतों का पहला जत्था मणिमहेश यात्रा के लिए रवाना होता है और पवित्र स्नान व पूजन करता है. इसी दिन से औपचारिक तौर पर मणिमहेश यात्रा और वहां पर आयोजित मेले की शुरुआत होती है, जो आगे चलकर जन्माष्टमी और राधा अष्टमी तक चलती है.

लोकमान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के सुबह के समय जब सूर्य देव की पहली किरण मणिमहेश कैलाश चोटी पर पड़ती है, तो उस पर एक अद्भुत प्रकाश दिखाई देता है. श्रद्धालुओं का मानना है कि इस समय पर्वत से दिव्य प्रकाश (मणि) की झलक देखने को मिलती है.

 मणिमहेश यात्रा में छोटा स्नान और बड़ा स्नान दो मुख्य पवित्र तिथियां हैं

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मणिमहेश झील के क्रिस्टल-क्लियर पानी में विशाल और बर्फ से ढके कैलाश पर्वत का प्रतिबिंब साफ झलकता है, जो किसी अनूठी दुनिया जैसा प्रतीत होता है. मणिमहेश यात्रा में छोटा स्नान और बड़ा स्नान दो मुख्य पवित्र तिथियां हैं जिन पर श्रद्धालु मणिमहेश झील में डुबकी लगाते हैं.

कड़ाके की ठंड के बावजूद पवित्र डुबकी लगाते हैं

छोटा स्नान हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी) के दिन होता है. इस पवित्र स्नान के साथ ही आधिकारिक मणिमहेश यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है. इस दिन भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के साथ-साथ भक्त मणिमहेश झील पहुंचकर अपनी यात्रा का पहला प्रमुख चरण पूरा करते हैं और कड़ाके की ठंड के बावजूद पवित्र डुबकी लगाते हैं.

वहीं, बड़ा स्नान भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधा अष्टमी) के दिन होता है. यह मणिमहेश यात्रा का सबसे बड़ा और अंतिम मुख्य आकर्षण होता है, जिसके साथ ही आधिकारिक यात्रा का समापन होता है. हर साल इसकी तारीखें अलग-अलग होती हैं.

इस यात्रा में रंगबिरंगी छड़ी यात्रा निकलती है 

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इस यात्रा को लेकर एक परंपरा प्रचलित है, जिसे 'छड़ी' कहा जाता है. यह गूर चरपतनाथ जी की पवित्र छड़ी होती है जिसे श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं. इसी छड़ी यात्रा से मणिमहेश यात्रा की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है. यह यात्रा चंबा शहर के लक्ष्मी नारायण मंदिर और दशनामी अखाड़े से शुरू होती है. इस यात्रा में रंगबिरंगी छड़ी यात्रा निकलती है और पूरे रास्ते भगवान शिव के भजन-कीर्तन गाए जाते हैं.

शिव का आशीर्वाद पाने के लिए क्या करते हैं लोग

जब यह यात्रा मणिमहेश झील पर पहुंचती है, तो भरमौर के ब्राह्मण परिवार के राज पुरोहितों द्वारा पूरी रात पूजा-पाठ और अनुष्ठान किए जाते हैं. अगले दिन श्रद्धालु मणिमहेश झील में पवित्र स्नान (नौण) करते हैं और बाद में भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए पवित्र झील के तीन बार चक्कर लगाते हैं. मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने गौरी कुंड में स्नान किया था जबकि भगवान शिव ने शिव कलोत्री में स्नान किया था. इसलिए मणिमहेश झील में अंतिम डुबकी लगाने से पहले महिला श्रद्धालु गौरी कुंड में स्नान करती हैं, वहीं पुरुष श्रद्धालु शिव कलोत्री में स्नान करते हैं.

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मणिमहेश कैलाश पर्वत को लेकर क्या मान्यता है

मणिमहेश कैलाश पर्वत को लेकर मान्यता है कि यहां भोलेनाथ स्वयं निवास करते हैं और उनके मस्तक पर स्थित 'मणि' रूपी किरण आज भी भक्तों को अलौकिक अनुभूति करवाती है. मणिमहेश को भगवान शिव के पांच प्रमुख कैलाश स्थलों में से एक माना जाता है.

कहा जाता है कि शिवशंकर ने पार्वती जी के साथ रहने के लिए मणिमहेश पर्वत की रचना की थी. इस स्थान पर शिव आज भी शिवलिंग के रूप में मौजूद है. जबकि माता पार्वती को यहां देवी गिरजा के रूप में जाना जाता है.

मणिमहेश पर्वत पर शिव शाम और रात्रि के मध्यकाल में दर्शन देते हैं

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मणिमहेश पर्वत पर शिव शाम व रात्रि के मध्यकाल में दर्शन देते हैं. सूर्यास्त के समय जब सूर्य की किरणें पर्वत के शिखर पर पड़ती हैं, तब पूरा दृश्य स्वर्णिम हो जाता है. यदि मौसम साफ रहे तो भक्त पर्वत की चोटी व उस पर विराजमान शिव को देख सकते हैं.

मणिमहेश पर्वत का शिखर अदृश्य है

कई लोगों का मानना है कि मणिमहेश पर्वत का शिखर अदृश्य है. ये हमेशा बादलों व बर्फ से ढका रहता है. ये चोटी महज उसी को दिख सकती है जो पूर्ण रूप से पाप मुक्त हो व सच्ची श्रद्धा से भोले भंडारी को याद कर रहा हो. मणिमहेश पर्वत की कुल ऊंचाई कितनी है इस बात का ठोस प्रमाण नहीं है. हालांकि, अभी तक इसको लेकर कोई सटीक जानकारी नहीं आई है.

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कैलाश की तरह मणिमहेश पर्वत पर भी चढ़ना नामुमकिन है. जो कोई भी यहां चढ़ने की कोशिश करता उसे कोई अदृश्य शक्ति रोक देती है. वर्ष 1968 में इंडो-जापान की एक टीम ने जिसका नेतृत्व नंदिनी पटेल कर रहीं थी इस पर्वत पर चढ़ाई की कोशिश की थी लेकिन वे असफल रहे.

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