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फैशन नहीं, बहादुरी की निशानी! नागालैंड की इस जनजाति की अनोखी परंपरा के बारे में जानिए
नागालैंड अपनी अनूठी संस्कृति के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का ऐतिहासिक जिला 'मोन' जिसे 'आंगो की भूमि' भी कहा जाता है, वहां कोन्याक जनजाति रहती है। अंघो का मतलब गांव का मुखिया या राजा जिसके घर के दरवाजे पर दुश्मनों के कटे हुए सिर टंगे रहते थे।
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आजकल ज़्यादातर लोग टैटू बनवाने को स्टाइल स्टेटमेंट मानते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब टैटू सिर्फ फैशन नहीं बल्कि इज़्ज़त और साहस का प्रतीक था। जी हां, भारत में एक ऐसी प्राचीन जनजाति है, जहां शरीर पर टैटू बनवाना किसी उपलब्धि से कम नहीं माना जाता था। इस उपलब्धि के लिए लोग खूब मेहनत करते थे। ये टैटू उनके लिए किसी 'डिग्री' से कम नहीं था जो समाज में उनकी हैसियत तय करता था।
हम बात कर रहे हैं भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में रहने वाली कोन्याक जनजाति की। आइए जानते हैं टैटू से जुड़ा इनका दिलचस्प इतिहास।
कोन्याक जनजाति
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नागालैंड अपनी अनूठी संस्कृति के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का ऐतिहासिक जिला 'मोन' जिसे 'आंगो की भूमि' भी कहा जाता है, वहां कोन्याक जनजाति रहती है। अंघो का मतलब गांव का मुखिया या राजा जिसके घर के दरवाजे पर दुश्मनों के कटे हुए सिर टंगे रहते थे।
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नागालैंड में रहने वाली कुल 17 जनजातियों में से एक है कोन्याक। इस जनजाति की एक ख़ास पहचान है, इसे हेडहंटर यानी सिर काटने और चेहरे पर टैटू गुदवाने के लिए जाना जाता है।
सबसे हैरान करने वाली बात ये है की इनकी अपनी कोई लिखित भाषा नहीं है या अपनी कोई परंपरा नहीं है। इनका इतिहास पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ता रहा।
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चेहरे और शरीर पर टैटू बनवाना था सर्वोच्च सम्मान
जहाँ इस जनजाति में दुश्मनों का सिर काटकर लाना एक बड़ी जीत थी, वहीं सिर काटने वाले के चेहरे और शरीर पर टैटू बनवाना भी गौरव की बात थी। ये अधिकार प्राप्त होना कोई फैशन नहीं था बल्कि इसे सर्वोच्च सम्मान माना जाता था। इससे उस व्यक्ति का सोशल सटेटस तय होता था।
महिलाओं के शरीर पर टैटू के थे अलग मायने
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जैसे पुरुषों में टैटू बनवाना बहादुरी का प्रतीक होता था वैसे ही महिलाएं अपने जीवन के अलग-अलग पड़ावों को बताने के लिए टैटू बनवाती थीं। प्युबर्टी से लेकर शादी और फिर मां बनने के पड़ाव को पार करने पर महिलाओं के शरीर के अलग अलग हिस्सों पर खास तरह का टैटू बनाया जाता था।