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'पहले अपने घर की हालत देखो...', भारत को नसीहत देने निकले जरदारी, मिला करारा जवाब; आखिर क्या है पूरा मामला

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बयान पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है. विदेश मंत्रालय ने उनकी टिप्पणियों को बेबुनियाद और राजनीतिक मकसद से प्रेरित बताते हुए कहा कि पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है.

Image Source: Screengrab IANS & @PresOfPakistan
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जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते लेकिन पाकिस्तान एक बार फिर इसी राह पर चलता दिखाई दिया. पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर हमलों और हिंदू समुदाय के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन इन मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय वह भारत को नसीहत देने में जुटा है. दरअसल, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित गंज शहीदा मस्जिद समेत भारत के अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों को लेकर कथित चिंता जताई. हालांकि, भारत ने उनके बयान को सिरे से खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद, हास्यास्पद और राजनीतिक मकसद से प्रेरित बताया. भारत ने दो टूक कहा कि पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है और उसे पहले अपने देश के हालात पर ध्यान देना चाहिए.

भारत ने पाकिस्तान के आरोपों को बताया बेबुनियाद

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि भारत, पाकिस्तान की ओर से की गई इन अनावश्यक और निराधार टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करता है. जायसवाल के अनुसार, पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों पर बोलने या हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है और उसे ऐसे विषयों से दूर रहना चाहिए. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आगे कहा कि पाकिस्तान का मानवाधिकार रिकॉर्ड ख़ुद गंभीर सवालों के घेरे में रहा है. उन्होंने कहा कि दुनिया भर में पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है. ऐसे में भारत पर आरोप लगाने की कोशिश करना न केवल विरोधाभासी है, बल्कि पूरी तरह अविश्वसनीय भी लगता है. जायसवाल ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव तथा उन्हें निशाना बनाए जाने की घटनाओं का लंबा इतिहास रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर भारत ने उठाए सवाल

भारत ने कहा कि पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय संगठनों और विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चिंता व्यक्त की जाती रही है. विदेश मंत्रालय के अनुसार, वहां धार्मिक आधार पर होने वाले भेदभाव और हिंसा के मामलों पर कई बार सवाल उठ चुके हैं. मंत्रालय ने कहा कि विशेष रूप से हिंदू और अहमदिया समुदाय के लोगों को अक्सर उत्पीड़न और असमान व्यवहार का सामना करना पड़ता है. भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों से जुड़े मामलों को लेकर हिंसा और विवाद की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं, जिनमें कुछ नीतिगत और कानूनी व्यवस्थाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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बयान राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित

रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति की ओर से दिए गए बयान तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक राजनीतिक उद्देश्य से की गई टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसे बयान पाकिस्तान की पुरानी सोच और भारत विरोधी रवैये को दर्शाते हैं. जायसवाल के अनुसार, इन टिप्पणियों का मकसद वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना और राजनीतिक लाभ हासिल करना प्रतीत होता है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हालात और उसके रिकॉर्ड को देखते हुए इस तरह के आरोपों की विश्वसनीयता स्वतः ही सवालों के घेरे में आ जाती है.

पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने क्या कहा था?

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पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के अधिकारिक एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि 'राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने भारत में ऐतिहासिक मुस्लिम धार्मिक स्थलों, जिनमें वाराणसी की 1,000 साल पुरानी मस्जिद गंज शहीदा भी शामिल है, को गिराए जाने और उन्हें दी जा रही धमकियों पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने भारत से ऐसी कार्रवाइयां तुरंत रोकने को कहा और चेतावनी दी कि इससे भारत के टूटने और वहां हमेशा के लिए अराजकता फैलने का खतरा पैदा हो सकता है. उन्होंने ऐसी कार्रवाइयों को तुरंत रोकने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों व साझा सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा करने की अपील की. 

बताते चलें कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति के बयान और भारत की तीखी प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा दोनों देशों के बीच नई बहस का कारण बन गया है. भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी बाहरी टिप्पणी को स्वीकार नहीं करता. वहीं, इस घटनाक्रम ने एक बार फिर पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चल रही चर्चाओं को भी सुर्खियों में ला दिया है.

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