'अब या तो वे रहेंगे या हम...', जादवपुर यूनिवर्सिटी में 'आजादी' के नारों पर भड़के CM सुवेंदु अधिकारी; जानें पूरा मामला
पश्चिम बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी को लेकर सियासत गरमा गई है. सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'आजादी के नारों और लाल सलाम किशनजी’ भित्तिचित्र पर सवाल उठाते हुए कड़ा रुख अपनाया. उनके कार्यक्रम के चलते जादवपुर से सुलेखा तक यातायात भी प्रभावित रहा.
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में जादवपुर यूनिवर्सिटी को लेकर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है. रक्षाबंधन के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विश्वविद्यालय परिसर और कोलकाता की सड़कों पर लगाए जा रहे 'आजादी' के नारों को लेकर कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने ऐसे नारों पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत 1947 में आजाद हो चुका है, फिर इस तरह की आजादी की मांग क्यों की जा रही है. सीएम के इस बयान के बाद अब सूबे में सियासी बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई है.
दरअसल, सुवेंदु अधिकारी के कार्यक्रम के चलते जादवपुर पुलिस स्टेशन से सुलेखा तक सड़क पर काफी देर तक यातायात प्रभावित रहा. कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जादवपुर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे कुछ नारों का भी जिक्र किया. खास तौर पर माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में बनाए गए 'लाल सलाम किशनजी' भित्तिचित्र को लेकर उन्होंने सवाल खड़े किए.
एबीवीपी छात्रों से बोले- राष्ट्रवाद का सबक सिखाने की जरूरत
सुवेंदु अधिकारी का कार्यक्रम जादवपुर यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 2 के पास आयोजित किया गया था. उन्होंने पिछले दिनों विश्वविद्यालय परिसर में हुए विवाद और तोड़फोड़ का भी जिक्र किया. अधिकारी ने कहा कि इस घटना के लिए उनके समर्थकों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जा रही है, जबकि यह उन्हें बदनाम करने की साजिश है. उन्होंने एबीवीपी के छात्रों से कहा कि जिस तरह जेएनयू में राष्ट्रवाद को लेकर बहस और आंदोलन हुए, उसी तरह जादवपुर में भी राष्ट्रवाद का संदेश मजबूती से पहुंचाने की जरूरत है. इसी दौरान उन्होंने विरोधी विचार रखने वाले लोगों पर भी तीखी टिप्पणी की. अधिकारी ने कहा कि उन्हें यह तय करना होगा कि कैंपस में किस तरह की गतिविधियों और विचारों को जगह दी जानी चाहिए. उन्होंने कथित ‘आजादी’ के नारों को लेकर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर ऐसी आजादी किस चीज के लिए मांगी जा रही है.
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आजादी के नारों पर जताई नाराजगी
अपने संबोधन में सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि जब उन्हें कोलकाता की सड़कों पर ‘आजादी’ के नारे दिखाई देते हैं तो उन्हें पीड़ा होती है. उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं और सेनानियों के बलिदान को याद करने की अपील की. उन्होंने कहा कि भारत को 1947 में आजादी मिली थी और इसके लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किया. ऐसे में देश के भीतर अलगाव या किसी अन्य तरह की आजादी की मांग से जुड़े नारों पर सवाल उठना स्वाभाविक है. उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और मातंगिनी हाजरा जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का भी जिक्र किया. सुवेंदु अधिकारी ने यह भी कहा कि देश के बाहरी दुश्मनों से निपटने की जिम्मेदारी सशस्त्र बल निभा रहे हैं, लेकिन देश के भीतर राष्ट्रवाद और देशभक्ति के खिलाफ गतिविधियों को लेकर भी समाज को सतर्क रहना चाहिए.
लाल सलाम किशनजी पर भी उठाए सवाल
जादवपुर यूनिवर्सिटी की दीवार पर बने ‘लाल सलाम किशनजी’ भित्तिचित्र को लेकर भी सुवेंदु अधिकारी ने कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने सवाल किया कि नई पीढ़ी को ऐसे लोगों के बारे में क्या संदेश दिया जा रहा है. किशनजी के नाम से चर्चित कोटेश्वर राव प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़ा वरिष्ठ नेता था. नवंबर 2011 में पश्चिम बंगाल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में उसकी मौत हुई थी. अधिकारी ने इसी संदर्भ में विश्वविद्यालय की दीवारों पर उसके समर्थन में लिखे गए संदेश पर सवाल उठाया. उन्होंने कश्मीर से जुड़े कथित 'आजादी' के नारों का भी मुद्दा उठाया. उनका कहना था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर कई युद्ध और लंबे समय तक संघर्ष हुआ है. ऐसे में कोलकाता की सड़कों पर कश्मीर से जुड़ी आजादी के नारे लिखे जाना गंभीर विषय है.
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शिक्षकों को भी दी नजर रखने की चेतावनी
सुवेंदु अधिकारी ने अपने संबोधन में जादवपुर यूनिवर्सिटी के शिक्षकों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है. उनका आरोप था कि कुछ लोग देश की एकता और राष्ट्रवादी विचारों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने ऐसे तत्वों पर बेहद तीखी भाषा में निशाना साधा और कहा कि देश के भीतर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को किसी भी कीमत पर बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए. हालांकि उनके इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी देखने को मिल सकती है.
इंकलाब जिंदाबाद और आजादी के बीच फर्क पर जोर
सुवेंदु अधिकारी ने इससे पहले भी 'आजादी' से जुड़े नारों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी. उन्होंने कहा था कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए जा सकते हैं, लेकिन यदि कोई 'आजादी' या 'कश्मीर मांगे आजादी' जैसे नारे लगाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. उन्होंने 'वंदे मातरम' को लेकर भी सवाल उठाए. अधिकारी ने कहा कि यह किसी राजनीतिक नेता की रचना नहीं है, बल्कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था. उन्होंने सवाल किया कि इसके पूर्ण संस्करण पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए.
बंगाल की संस्कृति और NCC पर भी बात
अपने संबोधन में सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी जिक्र किया. उन्होंने श्री चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस और रानी रासमणि जैसे प्रमुख नामों का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य की उस सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की जरूरत है, जिसे समय के साथ नुकसान पहुंचा है. उन्होंने यह भी बताया कि पश्चिम बंगाल के स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी NCC शुरू करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं. उनका कहना है कि इससे युवाओं में अनुशासन, देशभक्ति और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
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बहरहाल, जादवपुर यूनिवर्सिटी में नारों और राजनीतिक विचारधारा को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है. सुवेंदु अधिकारी के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं.