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174 एकड़ में विकसित होगा ग्रेटर नोएडा का नया मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक पार्क, बड़े निवेश वाली कंपनियों को होगा फायदा

CM Yogi: राज्य सरकार की नीति के तहत न्यूनतम 1000 करोड़ रुपये के निवेश वाली मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जाएगा. ऐसी परियोजनाओं को 30% फ्रंट-एंड लैंड सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो केवल सरकारी या औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा लीज पर आवंटित भूमि पर ही अनुमन्य होगी.

Image Source: Social Media
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UP New Multimodal logistics Park: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “उत्तर प्रदेश मल्टी मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क नीति-2024” के तहत ग्रेटर नोएडा में 174.12 एकड़ भूमि पर मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क (एमएमएलपी) की स्थापना के लिए नियम, शर्तें और ब्रोशर को मंजूरी दे दी गई है. राज्य सरकार की नीति के तहत न्यूनतम 1000 करोड़ रुपये के निवेश वाली मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जाएगा. ऐसी परियोजनाओं को 30% फ्रंट-एंड लैंड सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो केवल सरकारी या औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा लीज पर आवंटित भूमि पर ही अनुमन्य होगी. उच्च स्तरीय प्राधिकृत समिति (एचएलईसी) ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) बोर्ड, मूल्यांकन समिति और औद्योगिक विकास विभाग की संस्तुति के आधार पर चयनित बिडर को 30% लैंड सब्सिडी देने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी. इसी के अनुरूप कैबिनेट ने अंतिम अनुमोदन प्रदान किया.

ग्रेटर नोएडा में 174.12 एकड़ भूमि पर विकसित होगा पार्क

ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा सेक्टर कप्पा-02 (पूर्व में कप्पा-11) में स्थित लगभग 174.12 एकड़ (7,04,664 वर्ग मीटर) भूखंड पर इस मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क की स्थापना की जाएगी. इसके लिए तैयार योजना के नियम और शर्तों को उच्च स्तरीय प्राधिकृत समिति द्वारा भी अनुमोदित किया जा चुका है. भूखंड के आवंटन के लिए ई-नीलामी मॉडल अपनाया जाएगा. भारत में पंजीकृत साझेदारी फर्म, एलएलपी, निजी या सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियां इसमें भाग ले सकेंगी, जबकि कंसोर्टियम या ज्वाइंट वेंचर को निविदा में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी.

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11,000 रुपये प्रति वर्गमीटर तय हुआ रिजर्व प्राइस

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भूखंड का आरक्षित मूल्य 11,000 रुपये प्रति वर्गमीटर निर्धारित किया गया है. 30% फ्रंट-एंड लैंड सब्सिडी की गणना इसी रिजर्व प्राइस के आधार पर की जाएगी, जैसा कि नीति में प्रावधानित है. सफल बोलीदाता को परियोजना 7 वर्षों में पूर्ण करनी होगी, जिसमें पहले 3 वर्षों में कम से कम 40% कार्य पूरा करना अनिवार्य होगा. विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 2 वर्षों का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है. परियोजना के पूर्ण संचालन और निर्धारित निवेश प्रतिबद्धताओं की पूर्ति से पहले आवंटी को परियोजना से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिससे परियोजना की गंभीरता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी.

प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक शेड्स योजना-2026 को कैबिनेट की मंजूरी

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योगी कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत डिजाइन-बिल्ड-फाइनेंस-ऑपरेट-ट्रांसफर (DBFOT) मॉडल पर आधारित “प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक शेड्स योजना-2026” को मंजूरी दे दी है, जिसका उद्देश्य 1 ट्रिलियन डॉलर जीएसडीपी लक्ष्य के अनुरूप औद्योगीकरण को गति देना, विनिर्माण क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की शीघ्र स्थापना सुनिश्चित करना है. वर्तमान लीज-एंड-बिल्ड मॉडल में उद्यमियों को भूमि लेने के बाद भवन, आंतरिक सड़क, ड्रेनेज, एसटीपी/ईटीपी और अग्निशमन जैसी सुविधाओं पर भारी निवेश करना पड़ता है, जिससे उत्पादन शुरू होने में 18-36 माह लग जाते हैं, जबकि इस योजना के तहत पूर्व-निर्मित, उपयोगिताओं से युक्त औद्योगिक शेड्स उपलब्ध कराकर एमएसएमई सहित उद्योगों को तुरंत संचालन योग्य इंफ्रास्ट्रक्चर मिलेगा, जिससे लागत घटेगी, उत्पादन तेजी से शुरू होगा और रोजगार सृजन बढ़ेगा.

 योजना में माइल्ड इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल-इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी कंपोनेंट्स, ऑटो सहायक उद्योग, टेक्सटाइल-गारमेंट, फूड प्रोसेसिंग, प्लास्टिक पैकेजिंग, डिफेंस-एयरोस्पेस और ईएसडीएम जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि औद्योगिक विकास प्राधिकरण आवश्यकता अनुसार क्षेत्र-विशिष्ट सुविधाएं भी प्रदान करेंगे. इसके तहत भूमि का स्वामित्व प्राधिकरण के पास रहेगा और निजी डेवलपर (कन्सेशनायर) 45 वर्ष (अधिकतम 15 वर्ष विस्तार योग्य) के लिए डिजाइन, वित्तपोषण, निर्माण, संचालन और अनुरक्षण करेगा तथा उद्योगों को सब-लीज पर शेड्स उपलब्ध कराएगा. न्यूनतम 10 एकड़ भूमि (पायलट हेतु 15-20 एकड़ वरीयता) निर्धारित की गई है और न्यूनतम विकास दायित्व (MDO) तय कर भूमि के अनावश्यक संचयन को रोका जाएगा.

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योजना पूरी तरह वित्तीय अनुशासन पर आधारित है, जिसमें कोई बजटीय सहायता, वीजीएफ या सरकारी गारंटी नहीं होगी, जबकि प्राधिकरण को प्रीमियम, वार्षिक शुल्क और रेवेन्यू शेयर के माध्यम से आय प्राप्त होगी तथा परियोजना अवधि पूर्ण होने पर सभी परिसंपत्तियां उपयोग योग्य स्थिति में वापस प्राधिकरण को हस्तांतरित कर दी जाएंगी.

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