13 साल से कोमा में बेटे का दर्द झेल रहा परिवार, CM योगी के निर्देश पर मिली बड़ी आर्थिक मदद
गाजियाबाद में अशोक राणा का परिवार पिछले 13 साल से अपने बेटे हरीश राणा की कोमा की स्थिति से जूझ रहा है. मामले की जानकारी मिलने के बाद सीएम योगी के निर्देश पर जिला प्रशासन परिवार के घर पहुंचा और उन्हें 2.5 लाख रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता दी.
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उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई एक मार्मिक कहानी ने पूरे देश को भावुक कर दिया है. राजनगर एक्सटेंशन की राज एम्पायर सोसाइटी में रहने वाला राणा परिवार पिछले 13 वर्षों से ऐसे दर्द से गुजर रहा है जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है. परिवार का 32 वर्षीय बेटा हरीश राणा साल 2013 से कोमा में है और तब से उसकी जिंदगी मशीनों के सहारे चल रही है.
इस बीच जब परिवार आर्थिक और मानसिक दोनों तरह के संकट से जूझ रहा था, तब राज्य सरकार ने आगे बढ़कर मदद का हाथ बढ़ाया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ के निर्देश के बाद जिला प्रशासन की टीम पीड़ित परिवार के घर पहुंची और उन्हें हर संभव सहायता देने का भरोसा दिलाया. इस कदम ने राणा परिवार के लिए कठिन समय में एक नई उम्मीद जगाई है.
प्रशासनिक टीम पहुंची घर
मुख्यमंत्री के निर्देश मिलते ही गाजियाबाद प्रशासन हरकत में आ गया. जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड़, जीडीए के उपाध्यक्ष नंदकिशोर कलाल और नगर आयुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक खुद अशोक राणा के घर पहुंचे. अधिकारियों ने परिवार से विस्तार से बातचीत की और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना. मौके पर ही प्रशासन की ओर से जनसहयोग के माध्यम से करीब 2.5 लाख रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई. अधिकारियों ने यह भी भरोसा दिलाया कि परिवार की आजीविका को स्थिर बनाने के लिए उन्हें एक दुकान आवंटित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. इससे बुजुर्ग माता-पिता को भविष्य में नियमित आय का साधन मिल सकेगा. इसके अलावा मुख्यमंत्री विवेक राहत कोष से भी बड़ी आर्थिक सहायता दिलाने के लिए प्रस्ताव आगे भेज दिया गया है. प्रशासन का कहना है कि परिवार को हर संभव सरकारी सहायता दिलाने की कोशिश की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था ऐतिहासिक फैसला
यह मामला केवल मानवीय पीड़ा का नहीं बल्कि भारत के न्यायिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है. इस केस में पहली बार देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने किसी नागरिक को ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ यानी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की बेंच ने मानवीय गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया. अदालत ने निर्देश दिया है कि हरीश राणा को एम्स में भर्ती किया जाए और वहां उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए. एम्स दिल्ली की मीडिया सेल प्रभारी प्रोफेसर रीमा दादा ने भी पुष्टि की है कि अस्पताल अदालत के आदेशों का पूरी तरह पालन करेगा.
एक हादसे ने बदल दी जिंदगी
हरीश राणा की जिंदगी एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी. साल 2013 में वह पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे. उसी दौरान चंडीगढ़ में एक पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लग गई. इस दुर्घटना के बाद से हरीश स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में हैं. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह शत-प्रतिशत विकलांगता और क्वाड्रिप्लेजिया से जूझ रहे हैं. इसका मतलब है कि उनके चारों अंग पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके हैं. वे न तो खुद सांस ले सकते हैं और न ही सामान्य रूप से भोजन कर सकते हैं. पिछले 13 वर्षों से उनकी सांसें ट्रेकियोस्टॉमी और गैस्ट्रोजेजुनोस्टॉमी ट्यूब के सहारे चल रही हैं. परिवार लगातार उनकी देखभाल कर रहा है, लेकिन यह लंबी लड़ाई उनके लिए बेहद कठिन साबित हुई है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का तर्क?
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जीवन केवल शरीर के अस्तित्व का नाम नहीं है, बल्कि उसमें गरिमा भी उतनी ही जरूरी है. यदि किसी व्यक्ति के ठीक होने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी हो और वह केवल मशीनों के सहारे जीवित हो, तो उसे इस कष्टदायक स्थिति से मुक्ति पाने का अधिकार मिलना चाहिए. पैसिव यूथेनेशिया में मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट बंद कर दिया जाता है ताकि उसकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके. हालांकि भारत में एक्टिव यूथेनेशिया यानी इंजेक्शन या दवा देकर किसी की जान लेना अभी भी कानूनन प्रतिबंधित है.
सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएगा परिवार
इस घटना ने राणा परिवार को भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद कमजोर कर दिया है. बेटे के लंबे इलाज ने परिवार की सारी जमा पूंजी लगभग खत्म कर दी. इसी को देखते हुए गाजियाबाद प्रशासन ने परिवार को सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने का फैसला लिया है. जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड़ ने कहा कि प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि परिवार को भविष्य में जीवनयापन के लिए स्थिर सहारा मिल सके.
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बताते चलें कि इस पूरी घटना ने समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि गंभीर बीमारी और लंबे इलाज से जूझ रहे परिवारों को किस तरह सहारा दिया जाए. फिलहाल राणा परिवार के लिए प्रशासन और सरकार की यह मदद कठिन समय में उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आई है.
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