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फ्लॉप शो साबित हुआ इस्लामाबाद टॉक्स, मध्यस्थ नहीं सिर्फ पोस्टमैन की थी पाकिस्तान की भूमिका...भारत से सीखे दुनिया

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की शर्तों पर बातचीत को लेकर पाकिस्तान में हुआ इस्लामाबाद टॉक्स ना सिर्फ फेल साबित हुआ बल्कि पाक फौज, सरकार और पूरे मुल्क के कद और भूमिका को लेकर अब बड़ा खुलासा हुआ है.

Islamabad Talks/ Image Source: IANS
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बीते दिनों पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच हुई वार्ता बुरी तरह फेल रही है. दोनों पक्षों की अपनी-अपनी मांगें थीं, जिस पर डेडलॉक बना रहा और आखिरकार कोई सहमति नहीं बन पाई. इस तरह इस्लामाबाद टॉक्स एक फ्लॉप शो साबित हुआ. इसके किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाने की एक बड़ी वजह पाकिस्तान खुद साबित हुए. रिपोर्ट के मुताबिक मेजबान पाकिस्तान जो खुद को मध्यस्थ बता रहा था, उसकी इतनी भी हैसियत नहीं थी कि डेलिगेशन में आए पक्षों के बीच सौहार्द स्थापित कर सके और टर्म्स सेट कर सके, जो किए आम तौर पर एक मध्यस्थ की भूमिका होती है. उसका प्रभाव और कद इतना होता है कि वो एक राय बनाने में कामयाब हो जाता है. इस लिहाज से देखें तो उसकी छवि ही संदिग्ध रही. इस लिहाज से देखें तो पूरी दुनिया को भारत से सीखनी चाहिए कि आखिर मध्यस्थता करते कैसे हैं और दो विरोधि पक्षों के बीच किसी मुद्दे पर आम सहमति बनाई कैसे जाती है. ये भारत ने G20 समिट 2023 कर के दिखा दिया, जब रूस-यूक्रेन जंग पर तनातनी के बावजूद नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर आम सहमति बना ली थी.

फ्लॉप शो साबित हुआ इस्लामाबाद टॉक्स!

खैर, फिलहाल बात इस्लामाबाद टॉक्स की. दरअसल ईरान पाकिस्तान पर विश्वास नहीं कर रहा था और अमेरिका तो उसे बखूबी जानता है कि कैसे पाकिस्तान दगा देने के लिए मशहूर है. वहीं ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे बघेर गलीबाफ, जो कि ईरानी संसद के स्पीकर हैं और IRGC के पूर्व कमांडर हैं, उनसे बेहतर पाक फौज के काले इतिहास को कौन जान सकता है. यानी कि पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका असल में किसी “मध्यस्थ” जैसी नहीं बल्कि एक “कुरियर” यानी संदेश पहुंचाने वाले की तरह थी. उसके पास न तो कोई खास दबदबा था, न ही कोई ठोस समाधान पेश करने की क्षमता, और न ही वह दोनों पक्षों को समझौते की ओर मजबूती से धकेल सकता था. 

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भारत ने बताया कि मध्यस्थता होती कैसे है?

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ऐसा इसलिए कि जो होस्ट होता है, मेजबानी करता है उसकी सब पक्ष इज्जत करते हैं, उसकी बात को स्वीकार करते हैं, जहां तक संभव हो. ऐसा कतर और नॉर्वे ने कर के दिखाया है. मेजबान का कद ही अपने आप में पूरे विवाद के हल और किसी भी आम सहमति के लिए बहुत जरूरी होता है. ऐसा हमने भारत की अध्यक्षता में हुए G-20 समिट में देखा, कि कैसे भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर तमाम पक्षों के बीच विवाद, तल्ख रिश्तों और जगजाहिर स्टैंड के बावजूद नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर आम सहमति बनाई और उस पर आम सहमति बनाकर, उसका ऐलान भी किया. ये इतनी जटिल प्रकिया होती है कि अगर एक भी पक्ष ना कह दे तो घोषणापत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं होगा और कोई ऐलान नहीं होगा, लेकिन भारत ने ऐसा कर दिखाया.

G-20 में भारत ने बताया कि मेजबान का दम क्या होता है!

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भारत ने अपनी कूटनीति और दमखम की बदलौत रूस-चीन को भी एकमत किया, अमेरिका और यूरोप को भी एकमत किया. इसके बाद जारी युद्ध के बीच एक ऐसा घोषणापत्र जारी हुआ जिस पर ना तो रूस को कोई आपत्ति हुई और ना ही अन्य पश्चिमी देश भारत पर सवाल उठा पाए. यानी कि भारत ने अपनी समझ और दमखम का अद्भुत नजारा पेश किया और दो विरोधी पक्षों को भी एक टेबल पर बैठाकर आम सहमति बना ली. ऐसा इसलिए कि जब रूस-यूक्रेन की जंग चल रही थी, तब रूस के आक्रमक रवैयों और पुतिन की निंदा को लेकर यूरोपीय देश अड़े थे. अगर भारत ऐसा कोई भी प्वाइंट उसमें शामिल करता तो चीन और रूस उस पर दस्तखत ही नहीं करते और समिट ही फेल हो जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारत ने दोनों पक्षों को मनाया, युद्ध की निंदा भी की और ऐसे की जिससे कि रूस को खराब भी ना लगे और यूरोप भारत पर पक्षपात का आरोप भी ना लगा पाए. ऐसा पहली बार हुआ जब इतने तल्ख रिश्ते के बावजूद G20 के देश नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर साइन करने पर सहमत हो गए. इसे भारत की कूटनीतिक कामयाबी मानी गई. पूरी दुनिया में मोदी सरकार की वाहवाही हुई. पीएम मोदी की सक्रियता, छवि और व्यक्तिगत रिश्ते से ये संभव हो पाया था. यूरोपीय मीडिया भी हैरान थी कि आखिर भारत ने ऐसा कैसे कर दिया कि रूस-चीन, अमेरिका-यूरोप सब एकमत हो गए.

यही पाकिस्तान करने में फेल रहा. क्योंकि ना तो उसका कद, ना ही उसका इतिहास, ट्रस्ट लेवल वैसा हो जो वो करा सके. इसलिए तो कूटनीतिक हल्के में पाकिस्तान को मध्यस्थ की जगह पोस्टमैन कह कर संबोधित किया जा रहा है.

जहां तक ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता की बात है तो पाकिस्तान सिर्फ एक ऐसा कूटनीतिक रास्ता बना, जिसके जरिए चीन जैसे बड़े देश अपने संदेश आगे पहुंचा सके, वह भी बिना सीधे तौर पर सामने आए.  एक रिपोर्ट के मुताबिक आठ अप्रैल को जब अमेरिका और ईरान दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमत हुए, तो दुनिया ने राहत और हैरानी के मिले-जुले भाव के साथ इस खबर को देखा. इस समझौते का श्रेय पाकिस्तान को “मध्यस्थ” के रूप में दिया गया, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि अचानक काफी बढ़ गई. फील्ड मार्शल असीम मुनीर को इसका बड़ा श्रेय मिला, और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव से बधाई संदेश भी मिले.

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पाकिस्तान, अमेरिका-ईरान के बीच बना पोस्टमैन

लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, दिखावे के पीछे कहानी थोड़ी ज्यादा जटिल है. असल में पाकिस्तान ने किसी फैसले को तय करने वाली भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वह सिर्फ एक ऐसा माध्यम बना जिसके जरिए अमेरिका और चीन जैसे बड़े देश एक-दूसरे तक बात पहुंचा सके.

चीन के कूटनीतिक हितों को नुकसान पहुंचान वाले मुद्दों को पाक ने नहीं किया बातचीत में शामिल

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रिपोर्ट में बताया गया कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के कुछ ही दिनों बाद पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर चीन-पाकिस्तान की संयुक्त शांति योजना के कुछ हिस्से उस सीजफायर में दिखने लगे, जिसे बाद में वॉशिंगटन और तेहरान दोनों ने स्वीकार किया. इस प्रस्ताव में उन मुद्दों से बचा गया जिनसे चीन को कूटनीतिक नुकसान हो सकता था, खासकर “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज” जैसे संवेदनशील क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि बाकी जटिल राजनीतिक मुद्दों को जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया.

चीन और अमेरिका, दोनों ने अपनी छवि को बचाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह खुलकर मानना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता कि चीन ने इस प्रक्रिया में मदद की है, क्योंकि इससे यह संदेश जा सकता था कि वह बीजिंग के प्रभाव पर निर्भर हैं. वहीं चीन के लिए भी खुलकर सामने आकर बड़ी भूमिका निभाना जोखिम भरा था, क्योंकि “बीजिंग आमतौर पर ऐसी हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक भूमिकाओं से बचता है जहां असफलता उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है.”

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पाकिस्तान का रोल सिर्फ 'FILL IN THE BLANKS'

रिपोर्ट में कहा गया, “पाकिस्तान ने इस खाली जगह को भरा. उसने अमेरिका को ऐसा साझेदार दिया जिसे वह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकता था, और चीन को ऐसा गुप्त चैनल दिया जिसके जरिए वह ईरान पर अपना प्रभाव बिना ज्यादा ध्यान खींचे इस्तेमाल कर सकता था.”

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चीन की हरी झंडी के बाद ही पाकिस्तान को बनाया गया संदेशवाहक

आगे कहा गया कि इशाक डार की बीजिंग यात्रा में संभवतः इस बात पर चर्चा हुई होगी कि किसी भी समझौते के लिए चीन को गारंटर के रूप में कैसे शामिल किया जाए. और पाकिस्तान ने यह बातचीत बिना अमेरिका और चीन दोनों की पहले से किसी न किसी स्तर की सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ाई होगी. व्यवहार में, ईरान किसी भी समझौते में अंतिम गारंटर के रूप में चीन को ही देखेगा. 

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बीजिंग में इशाक डार को वांग यी का सख्त संदेश!

हालांकि यहां ये भी जानना जरूरी है कि चीन, पाकिस्तान की इस मध्यस्थता की कोशिश से एक्टिवली खुश नहीं था. उसने उसे बस सैद्धांतिक समर्थन दिया था. खबर के मुताबिक जब इशाक डार बीजिंग गए तो चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने उनसे दो टूक कहा कि पहले अपना घर संभालो फिर कुछ और करना.

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जाहिर है उनका इशारा अफगानिस्तान से लगातार लड़ाई के कारण खटाई में पड़े CPEC निवेश और चीनी इंजीनियर्स की सुरक्षा की ओर था, जिन्हें BLA, TTP और अब द्विपक्षीय जंग के दौरान खतरा पैदा हो गया है.

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