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हो गया 800 साल तक के लिए बिजली का इंतजाम! भारत के परमाणु वैज्ञानिकों ने हासिल की PFBR क्रिटिकैलिटी, क्या है ये, जानें
भारत को उर्जा का अक्षयपात्र मिलता दिख रहा है. भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम के सेक्टर में बड़ी सफलता मिली है. जिसे रूस को छोड़ दुनिया के कोई देश नहीं कर पाए, उसे हमारे परमाणु वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है.
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भारत के पहले 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) के सफलतापूर्वक क्रिटिकैलिटी (सुरक्षित और सामान्य रूप से काम करना) हासिल करने पर, केंद्र सरकार ने मंगलवार को कहा कि पहला फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विश्वसनीय, कम कार्बन वाली उच्च तापीय दक्षता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
इसे भारत के न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है और इससे देश को ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी. पीएफबीआर ने सोमवार को ऑटोमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) द्वारा स्थापित की गई सभी सुरक्षा निर्देंशों को पूरा करने के बाद क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली थी.
पीएम मोदी ने दी थी PFBR क्रिटिकैलिटी की जानकारी!
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इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि यह उपलब्धि भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम की दिशा में एक निर्णायक कदम है. उन्होंने कहा, "भारत ने अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है और अपने परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण को आगे बढ़ाया है. स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने कलपक्कम में क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली है."
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प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि यह एडवांस रिएक्टर, जो खपत से अधिक ईंधन उत्पादन करने में सक्षम है, देश की वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाता है और कार्यक्रम का तीसरे चरण विशाल थोरियम भंडार का दोहन करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है. उन्होंने कहा,“भारत के लिए यह गौरवपूर्ण क्षण है. हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई.”
BHAVINI सहित करीब 200 कंपनियों का सहयोग रहा शामिल!
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इस रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन किया गया है और इसका निर्माण एवं संचालन भारतीय परमाणु विद्युत निगम लिमिटेड (बीएचएवीआईएनआई) द्वारा किया गया है, जो केंद्र सरकार का एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है.
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण घटक हैं. पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, पीएफआरबी यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (एमओएक्स) ईंधन का उपयोग करता है और यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित करके खपत से अधिक विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न कर सकता है.
इस रिएक्टर को अंततः थोरियम-232 का उपयोग करके यूरेनियम-233 का उत्पादन करने के लिए भी डिजाइन किया गया है, जो स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए भारत के विशाल थोरियम भंडार का दोहन करने के दीर्घकालिक लक्ष्य का समर्थन करता है. अधिकारियों ने कहा कि यह उपलब्धि मौजूदा परमाणु प्रौद्योगिकियों को भविष्य के थोरियम-आधारित रिएक्टरों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, साथ ही ईंधन दक्षता और स्थिरता को भी बढ़ाती है.
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6 अप्रैल 2026 को PFBR ने हासिल की पहली क्रिटिकैलिटी
भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में PFBR (प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) की सफलता एक युगांतरकारी घटना है. 6 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु के कलपक्कम में इस रिएक्टर ने अपनी पहली 'क्रिटिकैलिटी' (निरंतर परमाणु श्रृंखला प्रतिक्रिया) हासिल कर ली है.
PFBR की क्रिटिकलिटी हासिल करना भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है. यह 500 मेगावाट (MWe) की क्षमता वाला रिएक्टर है, जिसे 'भाविनी' (BHAVINI) द्वारा कलपक्कम परमाणु परिसर में बनाया गया है. इस लिहाज से देखें तो रूस के बाद भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा.
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क्या है भारत का तीन-चरणीय (थ्री फेज परमाणु कार्यक्रम)
आपको बताएं कि भारत के पास यूरेनियम कम है लेकिन थोरियम का विशाल भंडार है. डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने इसी को ध्यान में रखते हुए तीन चरणों वाली योजना बनाई थी, जिसके तहत तीन चरण में बहुत मुश्किल, लेकिन बहुच जरूरी न्यूक्लियर एनर्जी जेनरेट करने की भारत क्षमता हासिल कर लेगा. इससे आने वाले 800 साल तक भारत बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा, जो सस्ता होगा, आत्मनिर्भर होगा, सेफ और ग्रीन एनर्जी वाला होगा. कार्बन का उत्सर्जन भी नहीं करेगा.
आपको बताएं कि प्रथम चरण (PHWR): प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करके बिजली बनाना. इससे निकलने वाला कचरा (प्लूटोनियम) अगले चरण के लिए ईंधन बनता है.
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द्वितीय चरण (FBR - वर्तमान स्थिति): इसमें प्लूटोनियम का उपयोग ईंधन के रूप में होता है. PFBR इसी चरण की शुरुआत है. ये रिएक्टर जितना ईंधन जलाते हैं, उससे ज्यादा ईंधन पैदा (Breed) करते हैं. यही चरण थोरियम को ईंधन में बदलने का रास्ता खोलेगा.
तृतीय चरण (थोरियम आधारित): यह भविष्य का लक्ष्य है जहाँ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करके हजारों वर्षों तक ऊर्जा सुरक्षा हासिल करेगा.
PFBR क्या है और इसकी क्या खासियत है?
ईंधन: इसमें यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग होता है.
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ब्रीडिंग (Breeding): इस रिएक्टर के कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की एक परत (ब्लैंकेट) होती है. परमाणु प्रतिक्रिया के दौरान यह परत नए प्लूटोनियम ईंधन में बदल जाती है.
थोरियम का पुल: भविष्य में इसी तकनीक के माध्यम से थोरियम को यूरेनियम-233 में बदला जाएगा, जो तीसरे चरण का मुख्य ईंधन होगा.
भारत क्यों न्युक्लियर एनर्जी चाहता है?
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भारत ने परमाणु ऊर्जा को अपनी 'स्वच्छ ऊर्जा' (Clean Energy) रणनीति का आधार बनाया है: वर्तमान क्षमता: अभी भारत की परमाणु क्षमता 8.78 गीगावाट (GW) है. इसे 2031-32 तक इसे बढ़ाकर 22.38 GW करने का लक्ष्य है.
2047 का विजन (परमाणु ऊर्जा मिशन): भारत ने आजादी के 100 साल पूरे होने तक 100 GW परमाणु ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य रखा है.
नेट जीरो: यह 2070 तक 'नेट जीरो' (शून्य कार्बन उत्सर्जन) के लक्ष्य को पाने में मदद करेगा.
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सरकार के बड़े कदम (2025-26)
बजट और निवेश: सरकार ने 'परमाणु ऊर्जा मिशन' के तहत 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. SMR (स्मॉल मॉडुलर रिएक्टर्स): छोटे और सुरक्षित रिएक्टरों के विकास पर जोर दिया जा रहा है. लक्ष्य है कि 2033 तक कम से कम 5 स्वदेशी SMR चालू हो जाएं.
शांति (SHANTI) एक्ट, 2025: सरकार ने परमाणु कानूनों को आधुनिक बनाने के लिए यह कानून लागू किया है. यह परमाणु क्षेत्र में कड़े सरकारी नियंत्रण के साथ-साथ सीमित निजी भागीदारी की अनुमति भी देता है.
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कुल मिलाकर देखें तो भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में PFBR एक ऐतिहासिक उपलब्धि है. 2026 में इसके क्रिटिकलिटी हासिल करने के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिनके पास यह एडवांस तकनीक है. इतना ही नहीं भारत ने जो PFBR क्रिटिकैलिटी हासिल किया है, उसकी लागत दुनियाभर के कई देशों को मिलाकर भी कम है. इसके अलावा कई देशों ने इसके लिए बिलियंस ऑफ डॉलर हासिल किए.
भारत के PFBR की कुल लागत!
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प्रारंभिक बजट 2004: 3492 करोड़ लगभग 420 मिलियन डॉलर.
वर्तमान लागत 2026: लगभग 7700 करोड़ से 8000 करोड़ लगभग 900 मिलियन से 1 बिलियन डॉलर.
इस लिहाज से देखें तो इस स्टेज तक आने में ना सिर्फ 20 साल से ज्यादा लग गए बल्कि लागत भी बढ़ गई. हालांकि लागत दोगुनी होने के बावजूद यह वैश्विक मानकों के हिसाब से अभी भी काफी सस्ता माना जाता है. इस लिहाज से देखें तो पश्चिमी देशों ने ब्रीडर तकनीक पर अरबों डॉलर खर्च किए लेकिन उनमें से अधिकांश विफल रहे या बंद कर दिए गए.
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अमेरिका: क्लिंच रिवर प्रोग्राम,1983 में बंद
लगभग 15 बिलियन डॉलर खर्च करने के बाद प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया.
फ्रांस: सुपरफिनिक्स 1998 में बंद: इसे बनाने में अरबों डॉलर लगे लेकिन तकनीकी खराबी और विरोध के कारण बंद करना पड़ा.
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जापान: मोंजू, 2016 में बंद, लगभग 9 बिलियन डॉलर खर्च हुए लेकिन सोडियम लीक के कारण इसे कभी ठीक से नहीं चलाया जा सका.
रूस: BN 800 सफल रूस फिलहाल दुनिया का एकमात्र देश है जो व्यावसायिक स्तर पर इसे चला रहा है. इसकी लागत भारत से कहीं अधिक रही है.
चीन: CFR 600 सक्रिय चीन ने भारत की तुलना में बहुत तेजी से मात्र 6 से 7 साल में इसे बनाया है लेकिन उनका बजट गुप्त और बहुत विशाल है.
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भारत का किफायती PFBR प्रोग्राम!
एक ओर जहां अमेरिका और जापान जैसे देशों ने 10 से 15 बिलियन डॉलर खर्च करके भी हाथ खींच लिए भारत ने मात्र 1 बिलियन डॉलर के आसपास के खर्च में इसे सफलतापूर्वक चालू कर दिखाया.
निवेश विशेषज्ञों का कहना है कि PFBR से पैदा होने वाली बिजली शुरुआती दौर में सामान्य कोयला या सौर ऊर्जा से 80 प्रतिशत महंगी हो सकती है. लेकिन यह खर्च बिजली के लिए नहीं बल्कि थोरियम तकनीक हासिल करने के लिए एक निवेश है. स्वदेशी भारत ने यह सब तब किया जब उस पर कई तरह के अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध थे जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है.
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इस लिहाज से देखें तो उर्जा जरूरतों के लिहाज से आयात पर निर्भर भारत के लिए ये एक मील का पत्थर है. दुनिया के अमीर देशों ने बहुत महंगा और जटिल मानकर ब्रीडर तकनीक को छोड़ दिया लेकिन भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस पर टिका रहा. आज भारत रूस के बाद दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है जिसके पास चालू हालत में कमर्शियल स्तर का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है.