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भारतीय अधिकारी की मौत पर बॉर्डर पार के लोगों की भी आंखें हो गईं नम, अंतिम विदाई देने पहुंचे पड़ोसी देश
POK: उत्तर कश्मीर के एक छोटे से गांव , केरन में एक ऐसी ही घटना हुए , जिसने सबको हैरान कर दिया और दिल को छू लिया. इस घटना में न सिर्फ एक परिवार के दर्द को महसूस किया गया, बल्कि उस सरहद की क्रूरता को भी समझा गया , जो लोगों को एक दूसरे से दूर कर देती हैं.
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Kashmir: कश्मीर को हमेशा धरती का स्वर्ग कहा जाता हैं. उसकी खूबसूरत वादियों, बर्फीली पहाड़ियों और हरियाली से भरी घाटियों के लिए यह विशेष स्थान हासिल हैं. लेकिन यह वही कश्मीर हैं , जहाँ की सरहदें अब दो देशों, भारत और पाकिस्तान के कब्जे में हैं , जिसे POK (पाकिस्तान ओक्यूपाइड कश्मीर ) कहा जाता हैं. कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं , जब लगता हैं कि ये सरहदें मिट जानी चाहिए , ताकि लोग अपने रिश्तों को बिना किसी बाधा के महसूस कर सकें. हाल ही में उत्तर कश्मीर के एक छोटे से गांव , केरन में एक ऐसी ही घटना हुए , जिसने सबको हैरान कर दिया और दिल को छू लिया. इस घटना में न सिर्फ एक परिवार के दर्द को महसूस किया गया, बल्कि उस सरहद की क्रूरता को भी समझा गया , जो लोगों को एक दूसरे से दूर कर देती हैं.
तहसीलदार लियाकत अली खान की कहानी
उत्तर कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्थित केरन गांव में रहने वाले लियाकत अली खान, जिनका हाल ही में निधन हो गया, इस दर्दनाक घटना के केंद्र में थे. वे गांदरबल में नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे. शनिवार को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई. जब उनका शव गांव पहुंचा, तो यह खबर सोशल मीडिया पर फैल गई और उनके रिश्तेदार, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में रहते थे, अंतिम दर्शन के लिए पहुंचने की कोशिश करने लगे.
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सरहद से सिर्फ नदी का फासला
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केरन गांव के पास ही किशनगंगा नदी बहती है, जिसे पाकिस्तान में नीलम नदी कहा जाता है. यह नदी ही भारत और पाकिस्तान की सीमा बनाती है. जब लियाकत अली का शव घर पहुंचा, तो उनके रिश्तेदार, जो पीओके में रहते थे, नदी के उस पार खड़े हो गए. वे सिर्फ दूर से अपने रिश्तेदार का अंतिम संस्कार देख सकते थे, क्योंकि सरहदें, नदी और दोनों देशों की सीमाओं ने उन्हें एक कदम भी पास नहीं जाने दिया
लियाकत अली के शव को नदी के किनारे कुछ देर के लिए रखा गया, ताकि उनके रिश्तेदार दूर से ही सही, उन्हें देख सकें. इस दृश्य ने सबको गहरे दुख में डुबो दिया. एक ग्रामीण ने कहा, "यह घटना सबको झकझोर कर रख देती है. बंटवारा और अलगाव इतना कष्टकारी होता है कि जब अपने ही पास होते हुए भी उनसे कुछ नहीं कर सकते."
सरहदों की क्रूरता
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इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या सरहदें सिर्फ जमीन को बांटने का काम करती हैं, या यह इंसानियत को भी बांट देती हैं? लियाकत अली खान और उनके रिश्तेदार एक ही जगह से आते थे, एक ही संस्कृति, एक ही समाज का हिस्सा थे, लेकिन सीमा ने उन्हें एक दूसरे से इस कदर अलग कर दिया कि वे एक मुट्ठी मिट्टी तक साझा नहीं कर सकते थे. केरन गांव के एक शख्स ने कहा, "सरहदों ने रिश्तों को इस कदर मजबूर कर दिया है कि एक साथ पले-बढ़े लोग भी अपनी जड़ें, अपने रिश्तेदार, और यहां तक कि अपने प्रिय जनों को भी सिर्फ दूर से देख सकते हैं."
बंटवारे का दर्द
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जब कोई परिवार एक-दूसरे से दूर हो जाता है, तो वह दर्द और दुख सिर्फ उस परिवार तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उस इलाके, उस समाज, और पूरी मानवता को महसूस होता है. लियाकत अली खान के रिश्तेदार, जो नदी के उस पार खड़े होकर उन्हें अंतिम बार देख रहे थे, यह दृश्य उनकी आंखों से आंसू नहीं रोक पा रहे थे। वे जानते थे कि वे सिर्फ एक पुल से ही अपने प्रियजन के पास जा सकते थे, लेकिन सरहद ने इस अंतिम विदाई में भी दूरी बना दी.