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धर्मांतरण, विदेशी चंदे पर भारत ने कसी नकेल तो निकली अमेरिकी सांसद की चीख, विरोध से साबित हुआ, क्यों जरूरी है FCRA कानून

भारत के प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक पर अमेरिकी सांसदों की चीफ निकल गई है. जैसे ही सरकार ने अवैध धर्मांतरण और डेमोग्राफी चेंज की नकेल कसी पूरी दुनिया विरोध पर उतर आई.  रिपब्लिक सांसद ने इसे ईसाई धर्म से जोड़ दिया. उनके विरोध ने साबित किया कि क्यों ये कानून जरूरी है.

Image Source: IANS
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वैश्विक स्तर पर बढ़ती भूमिका के बीच दुनियाभर के धार्मिक, सामाजिक सहित कई संगठनों की भारत पर नज़र है. इसमें सोशल एक्टिविटी से लेकर धर्मार्थ कार्य भी शामिल है. भारत में दशकों से धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के नाम पर आने वाला पैसा धर्मांतरण और सरकार-विकास परियोजना विरोधी प्रदर्शनों और आंदोलनों में इस्तेमाल होता है. इस लिहाज से देखें तो चर्च की ओर से कथित तौर पर आदिवासी इलाकों, गरीब-पिछड़ी जातियों, नॉर्थ ईस्ट सहित कई राज्यों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया जा रहा है. इतना ही नहीं NGOs को आने वाला पैसा कुडनकुलम परमाणु रिएक्टर, नर्मदा, साबरमती, सहित कई विकास योजनाओं के विरोध के लिए मूवमेंट खड़ा करने में इस्तेमाल होता रहा है. और अब तक की सरकारें इस पर चुप्पी साधे रहीं. 

भारत ने कसी धर्मांतरण, विदेशी चंदे के सोर्स और इस्तेमाल की नकेल

अभ जब सरकार ने FCRA यानी कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक-2026 लाकर ऐसे ही पैसे और अनाधिकृत फंडिंग पर नकेल कसी, नट-बोल्ट टाइट किया तो दुनियाभर के देशों की चीखें निकल गई. खासकर वैसे रूढ़िवादी-एवेंजिलिकल नेताओं की जिनका हित इन पैसे की आवाजाही, इस्तेमाल, फंडिंग से सधती रही है. वहीं भारत में भी वैसे दल जिनपर ऐसे संगठनों पर प्रभाव है, जहां चर्च पावरफुल है, कन्वर्जन रैकेट एक्टिव है वहां इसका विरोध शुरू हो गया है.

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भारत के FCRA कानून पर भड़के अमेरिकी सांसद

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इसी बीच अमेरिका के एक रिपब्लिकन सांसद ने इस कानून का विरोध किया है भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इतना ही इस अमेरिकी प्रतिनिधि ने विरोध करके बता दिया कि क्यों इस कानून की सख्त जरूरत है. आपको बताएं कि रिपब्लिकन प्रतिनिधि राइली एम. मूर ने भारतीय संसद में पेश होने वाले विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक-2026 पर आपत्ति जताई है. मूर ने कहा कि यह विधेयक ईसाई समुदाय पर सीधा हमला है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इसे पारित किया गया तो यह मुद्दा भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी चिंता का विषय बन सकता है. 

राइली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट किया, "भारत में ईसाई तब से हैं, जब हमारे ईसा मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद सेंट थॉमस द एपोसल मालाबार तट पर आए थे. लेकिन ईसाइयों के इतने लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद 'विदेशी अंशदान (विनियमन)' (एफसीआरए) नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रही है, ताकि सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं का नियंत्रण अपने हाथ में ले सके."

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उन्होंने आगे लिखा कि यह ईसाई समुदाय पर सीधा हमला है. अगर यह विधेयक इसी रूप में पारित होता है, तो यह भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में चिंता का बड़ा कारण बन सकता है.

अमेरिकी सांसदों ने FCRA को ईसाई धर्म से जोड़ा

इसके अलावा 'कैथोलिक एरीना' ने भी भारत सरकार के प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक पर प्रतिक्रिया दी. कैथोलिक एरीना ने इस मुद्दे पर राइली मूर को धन्यवाद देते हुए पोस्ट किया, "इस मुद्दे पर 'कम्युनिटी नोट' जोड़ने की कोशिश और लोगों को गुमराह करने वाले कमेंट्स पर ध्यान दें. भारत में ईसाई दुनिया में सबसे अधिक वंचित समुदायों में से एक हैं. ईयू और अन्य लोगों को ट्रेड डील करने के बजाय इस मुद्दे पर आवाज उठानी चाहिए."

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बता दें कि भारत सरकार मानसून सत्र के दौरान एफसीआरए संशोधन विधेयक-2026 संसद से पारित कराने की तैयारी में है. इस संशोधन विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या उसके निरस्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाए.

अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 के अनुसार अब विदेशी चंदे के लिए पंजीकरण को तय उद्देश्यों और अनुमोदित राज्यों से जोड़ा गया है. साथ ही अनुमत धार्मिक गतिविधियों में से धर्म परिवर्तन के मकसद से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार को बाहर रखा गया है.

इस कानून की शुरुआत वर्ष 1976 में हुई थी और समय-समय पर इसमें संशोधन कर इसे और मजबूत बनाया गया. वर्ष 2010 में नया कानून लागू किया गया, जिसमें बाद में 2016, 2018, 2020 और अब 2026 में संशोधन किए गए. विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) किसी 'विदेशी स्रोत' से प्राप्त विदेशी अंशदान को स्वीकार करने और उसके उपयोग को विनियमित करता है. विदेशी अंशदान वस्तु, मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति के रूप में हो सकता है और इसमें ऐसे योगदान से होने वाली निर्दिष्ट आय भी शामिल है.

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भारत में अवैध धर्मांतरण, डेमोग्राफी चेंज को रोकेगा FCRA कानून: प्रियंक कानूनगो

इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियंक कानूनगो की मानें तो एफसीआरए कानून भारत में आने वाले विदेशी चंदे और उसकी प्रक्रिया, उसके होने वाले खर्च को पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया है. संशोधन ये तय करेगा कि विदेशी चंदे से भारत में अवैध धर्मांतरण न किया जाए, भारत के डेमोग्राफी को अवैध तरीके से न बदला जाए.

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कानूनगो की मानें तो भारत के जनसांख्यिकी अनुपात को बदलने से देश के भूगोल को बदलने का संकट पैदा होता है. देश की जनता के हित में ये कानून आवश्यक है. प्रियंक कानूनगो ने कहा कि जो भी लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे लोग भारत की डेमोग्राफी को बदल देना चाहते हैं, वे लोग भारत की संप्रभुता को विदेशी चंदे के माध्यम से नुकसान पहुंचाना चाहते हैं.

प्रियंक कानूनगो ने आगे कहा कि सरकार के इस प्रयास का सभी को प्रशंसा करनी चाहिए. मानव अधिकारों के संरक्षण के दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है. पैसे की ताकत से धर्मांतरण करना, धर्मांतरण करवाना मानवों के मूल अधिकार का उल्लंघन है. हम सरकार के इस कदम का समर्थन करते हैं.

उन्होंने कहा कि अप्रैल माह में इस कानून का विरोध कर रही कांग्रेस को लेकर कहा था कि एफसीआरए कानून में पारदर्शिता आने के बाद हमें ये पता चला कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी का जो राजीव गांधी फाउंडेशन एनजीओ था, वो चाइना का पैसा भारत में लाकर किस प्रकार विघटनकारी काम करवा रहा था. उन्होंने कहा कि 140 करोड़ के देश में अगर आप समाज सेवा का काम कर रहे हो तो आपकी विश्वसनीयता होनी चाहिए.

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प्रियंक कानूनगो ने कहा कि भारत में दानदाताओं की कमी नहीं है. उन्होंने विपक्ष पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि आपको विश्वास दिलाना होगा कि आप सही में देश के प्रति काम कर रहे हो. अगर देश के प्रति काम करोगे तो विदेशी चंदे पर डिपेंडेंसी नहीं रहेगी, और अगर विदेशी चंदा चाहिए, तो स्पष्ट रूप से बताओ कि क्या काम करोगे?

PIB ने भी प्रस्तावित कानून पर विस्तृत लेखा जोखा पेश किया है. पीआईबी ने कहा कि वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं के पार लोगों, विचारों, प्रौद्योगिकी और वित्तीय संसाधनों के आवागमन को बदल दिया है. आज अंतर्राष्ट्रीय परोपकार और विकास साझेदारियाँ विश्व भर में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास को समर्थन प्रदान करती हैं. भारत को भी ऐसे सहयोगों से लाभ हुआ है, जहाँ हजारों संगठनों को देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में योगदान देने वाली गतिविधियों के लिए विदेशी अनुदान प्राप्त हुए हैं.

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इन अवसरों के साथ-साथ, विश्व भर की सरकारें सीमा पार वित्तीय प्रवाह की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता के प्रति अधिक जागरूक हो गई हैं. वैश्विक वित्तीय नेटवर्क, डिजिटल लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण तंत्रों के तीव्र विस्तार ने वित्तीय पारदर्शिता, विदेशी प्रभाव और लोकतांत्रिक संस्थानों के संरक्षण से संबंधित नई शासन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं. परिणामस्वरूप, विदेशी वित्तीय प्रवाह का विनियमन कई लोकतंत्रों में आधुनिक शासन की एक स्वीकृत विशेषता के रूप में उभरा है.

अतः विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) को व्यापक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में समझा जाना चाहिए. वैध धर्मार्थ गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के बजाय, यह अधिनियम एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है जो वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सक्षम बनाता है, साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि विदेशी अंशदान भारतीय कानून के अनुसार प्राप्त, उपयोग और लेखा-जोखा किया जाए.

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम

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विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) वह कानून है जो यह नियंत्रित करता है कि भारतीय व्यक्ति, संगठन, गैर-सरकारी संगठन, ट्रस्ट और कंपनियां भारत के बाहर से प्राप्त धन, प्रतिभूतियों या वस्तुओं को कैसे प्राप्त और उपयोग कर सकती हैं. इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा किया जाता है.

सरल शब्दों में कहें तो, एफसीआरए तीन तरह से काम करता है:

इसमें यह बताया गया है कि कौन विदेशी योगदान स्वीकार कर सकता है और किन शर्तों पर.

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इसमें यह निर्दिष्ट किया गया है कि उस धन को कैसे प्राप्त किया जाना चाहिए, उसका हिसाब कैसे रखा जाना चाहिए और उसकी रिपोर्ट कैसे दी जानी चाहिए.

यह विदेशी वित्त पोषित गतिविधियों के एक सीमित, परिभाषित समूह को प्रतिबंधित करता है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं.

एफसीआरए भारतीयों को विदेशी दान प्राप्त करने से नहीं रोकता है और न ही कानून का पालन करने वाले नागरिक समाज को बंद करता है. हजारों संगठन वैध रूप से पंजीकृत हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी धन प्राप्त करते हैं. इस कानून को उसी तरह समझना सबसे अच्छा है जिस तरह संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा अपने समकक्ष कानूनों का वर्णन करते हैं: विदेशी गतिविधियों के लिए एक पंजीकरण और प्रकटीकरण व्यवस्था - न कि नागरिक समाज के लिए अस्तित्व की अनुमति देने वाली व्यवस्था.

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मुख्य उद्देश्य

एफसीआरए स्पष्ट और सुसंगत सिद्धांतों के एक समूह पर आधारित है जो 1976 से लेकर अब तक के हर संशोधन में अपरिवर्तित रहे हैं. ये सिद्धांत किसी भी जवाबदेह सरकार की अपने नागरिकों, संस्थानों और राष्ट्रीय हित के प्रति जिम्मेदारियों को दर्शाते हैं.

पारदर्शिता

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विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले प्रत्येक संगठन को सरकार के साथ पंजीकरण कराना होगा, निर्दिष्ट और सत्यापन योग्य बैंकिंग चैनल के माध्यम से धन प्राप्त करना होगा और प्राप्त राशि, दाताओं और उन उद्देश्यों का खुलासा करना होगा जिनके लिए धन का उपयोग किया गया था.

जवाबदेही

लाभार्थियों को वार्षिक लेखापरीक्षित रिपोर्ट दाखिल करनी होगी. ये रिपोर्ट ऑनलाइन दाखिल की जानी हैं. दानदाताओं, राशि और उपयोग का रिकॉर्ड रखा जाता है, जिससे विदेशी स्रोत से लेकर जमीनी स्तर पर गतिविधि तक पूरी तरह से पता लगाने योग्य श्रृंखला बनती है.

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संप्रभुता

विदेशों से प्राप्त होने वाले वे दान जो भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रियाओं, सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं, नियमन के अधीन हैं. यह वैध दान पर कोई प्रतिबंध नहीं है. यह संप्रभु शासन का ही एक हिस्सा है.

वास्तविक कार्य को सक्षम बनाना

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इस अधिनियम का उद्देश्य वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुगम बनाना है, न कि उसमें बाधा डालना. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, गरीबी उन्मूलन, आपदा राहत, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संबंधी कार्य सभी इस ढांचे के अंतर्गत निर्बाध रूप से जारी हैं.

लोगों का भरोसा

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जब नागरिकों को यह पता होता है कि संगठनों को मिलने वाली विदेशी धनराशि पंजीकृत, सार्वजनिक और लेखापरीक्षित है, तो इससे स्वयंसेवी क्षेत्र और स्वयं संगठनों में विश्वास बढ़ता है. पारदर्शिता लाभार्थियों और दानदाताओं दोनों के उद्देश्य की रक्षा करती है.

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