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जयपुर में यूडी टैक्स बकाया पर कार्रवाई, रमाडा और मैरियट होटल सील, भुगतान के बाद 2 घंटे में खुले

होटल रमाडा के मामले में अधिकारियों ने बताया कि टैक्स के वर्गीकरण को लेकर विवाद के चलते यहां भी 2007 से ही बकाया पेंडिंग था. होटल मैनेजमेंट का तर्क था कि उन पर औद्योगिक श्रेणी के तहत टैक्स लगाया जाना चाहिए, जबकि निगम ने व्यावसायिक श्रेणी के तहत शुल्क लगाया था.

Image credits: IANS
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जयपुर नगर निगम (जेएमसी) ने सोमवार को दो बड़े होटल समूह, रमाडा और मैरियट, से जुड़ी संपत्तियों को लंबे समय से बकाया शहरी विकास (यूडी) टैक्स के चलते सील कर दिया. हालांकि, यह कार्रवाई ज्यादा देर तक नहीं चली, क्योंकि बकाया राशि का भुगतान होने के दो घंटे के भीतर ही दोनों प्रतिष्ठानों की सील हटा दी गई.

जयपुर में टैक्स बकाया के चलते रमाडा और मैरियट सील

मालवीय नगर जोन की एक रेवेन्यू टीम ने जवाहर सर्किल के पास स्थित होटल मैरियट के खिलाफ 5.97 करोड़ रुपए के बकाया यूडी टैक्स को लेकर कार्रवाई शुरू की. इस होटल में एक लग्जरी कार ब्रांड का शोरूम भी है.

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इस कार्रवाई के तहत अधिकारियों ने लग्जरी कार शोरूम और होटल परिसर के बाहर चल रहे एक रेस्टोरेंट को सील कर दिया. इसी तरह की एक और कार्रवाई में राजा पार्क स्थित होटल रमाडा के खिलाफ भी एक्शन लिया गया, जिस पर 1.36 करोड़ रुपए का बकाया था. इस अभियान के दौरान, होटल ग्रुप से जुड़ी कुछ प्रॉपर्टीज को सील कर दिया गया.

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भुगतान होते ही दो घंटे में हटाई गई सील

मालवीय नगर जोन के डिप्टी कमिश्नर मुकुट सिंह के अनुसार, कार्रवाई शुरू होने के कुछ ही देर बाद दोनों होटल ग्रुप के प्रतिनिधि नगर निगम कार्यालय पहुंचे और चेक जमा करके अपना बकाया चुका दिया. पेमेंट होने के बाद सील की गई सभी प्रॉपर्टीज को तुरंत डी-सील कर दिया गया.

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रेवेन्यू ऑफिसर पवन मीणा ने बताया कि होटल मैरियट से जुड़े शोरूम और रेस्टोरेंट ने बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद 2007 से यूडी टैक्स का भुगतान नहीं किया था. सील करने की कार्रवाई होने के बाद ही बकाया चुकाया गया.

होटल रमाडा के मामले में अधिकारियों ने बताया कि टैक्स के वर्गीकरण को लेकर विवाद के चलते यहां भी 2007 से ही बकाया पेंडिंग था. होटल मैनेजमेंट का तर्क था कि उन पर औद्योगिक श्रेणी के तहत टैक्स लगाया जाना चाहिए, जबकि निगम ने व्यावसायिक श्रेणी के तहत शुल्क लगाया था.

क्या है यूडी टैक्स?

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शहरी विकास (यूडी) टैक्स एक सालाना शुल्क है, जो शहरी स्थानीय निकायों की सीमा के भीतर आने वाली अचल संपत्तियों पर लगाया जाता है. यह नगर निगमों के लिए राजस्व का एक मुख्य स्रोत है और इसका उपयोग सड़कों के रखरखाव, सीवरेज सिस्टम और शहरी बुनियादी ढांचे के विकास जैसी जरूरी नागरिक सेवाओं के लिए फंड जुटाने में किया जाता है.

यह टैक्स 300 वर्ग मीटर से बड़े आवासीय प्लॉटों पर लागू होता है, जबकि सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, जिनमें होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर और अन्य संस्थान शामिल हैं, पर उनकी श्रेणी के आधार पर निर्धारित दरों से टैक्स लगाया जाता है.

 

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